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दूर क्यों नहीं होता गणित का भूत: बचपन से बुनियादी गणित को लेकर खौफ... चर्चा कब होगी?

Sat, 23 Aug 2025 06:34 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Sat, 23 Aug 2025 06:34 AM IST
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सार
शैक्षिक सुधार की बहस भाषा और इतिहास पर क्यों सिमट जाती है? बचपन से बुनियादी गणित को लेकर जो खौफ बैठाया जाता है, उस पर चर्चा कब होगी?
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ghost of mathematics not going away fear of basic mathematics since childhood when will we discuss this issue
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Freepik

विस्तार

विद्यालयी शिक्षा में जब सुधार की बात होती है, तो भाषा या फिर इतिहास पर आकर विवाद खड़े हो जाते हैं और बच्चे की न्यूनतम अधिगम क्षमता वहीं की वहीं खड़ी रह जाती है। राजनेता इस बात पर लड़ते हैं कि अकबर को वीर कहें या राणा सांगा को अधिक बड़ा लड़ैया या फिर मद्रास का बच्चा हिंदी क्यों पढ़े और स्कूल से निराश 12.3 प्रतिशत लड़कियां माध्यमिक विद्यालय तक आते-आते स्कूल छोड़ देती हैं, तो लड़कों में यह 13 प्रतिशत है।



भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के ‘परख सर्वेक्षण 2025’ और वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट 2024 से उजागर होता है कि कक्षा तीन से पांच के लगभग 38 फीसदी और कक्षा 6 से 8 के लगभग 46 फीसदी बच्चे गणित के बुनियादी सवालों को हल करने में असमर्थ हैं तथा दस तक के पहाड़े तक नहीं जानते। यह बात सरकार स्वीकार करती है कि कक्षा छह के 71 फीसदी छात्र गणित में भिन्न को पहचानने और तुलना करने में असमर्थ हैं। कक्षा नौ में 63 फीसदी छात्र बुनियादी गणित में असफल रहे। विज्ञान के विषयों जैसे रासायनिक परिवर्तन, विद्युत प्रवाह, और जटिल जैविक प्रक्रियाओं में भी काफी बच्चों को परेशानी होती है। रिपोर्ट में राज्य-स्तर पर भी अंतर दिखा है, जैसे  केरल, हिमाचल प्रदेश, पंजाब जैसे राज्य बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि झारखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़, लक्षद्वीप, पुदुचेरी, गोवा, त्रिपुरा जैसे राज्यों के बच्चे गणित और विज्ञान में सबसे कमजोर हैं। सरकारी स्कूलों के बच्चों का प्रदर्शन निजी स्कूलों के विद्यार्थियों की तुलना में कमजोर है।


यह सच है कि शिक्षा मंत्रालय के ‘निपुण भारत मिशन’ के तहत आधारभूत साक्षरता और संख्यात्मकता (एफएलएन) में सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन अब भी बड़ी संख्या में बच्चे बुनियादी गणित व विज्ञान के कौशल में पिछड़े हैं। गणित को ‘तर्क की भाषा’ और ‘विज्ञान की रीढ़’ कहा जाता है। लेकिन भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहां हर पांचवां बच्चा सीखने की मूलभूत चुनौतियों से जूझ रहा है, वहां गणित प्राथमिक शिक्षा की सबसे कठिन और डरावनी इकाई बनकर उभरा है। बचपन से ही बच्चों में विज्ञान और गणित के प्रति डर पैदा हो जाता है। स्कूल हो या ट्यूशन, सब जगह बच्चों को विज्ञान और गणित को पढ़ाते समय समझने के बजाय सवालों को रटने पर जोर दिया जाता है। इससे बच्चों में अवधारणात्मक समझ विकसित नहीं हो पाती है और वे केवल यांत्रिक तरीके से सवालों को हल करते हैं। बच्चों को खेल-खेल में या दैनिक जीवन से जोड़कर विज्ञान-गणित सिखाने के बजाय सीधे फॉर्मूले और नियम बताए जाते हैं। वैसे भी हमारे यहां दूरस्थ अंचलों में प्राथमिक शिक्षा भवन, शिक्षक और मूलभूत सुविधा के अभाव से आहत हैं। विद्यालय में शिक्षण के अलावा मध्याह्न भोजन और ऐसी ही गतिविधियों पर अधिक चिंता रहती है, तिस पर बच्चे को उत्तीर्ण करना अनिवार्य है।

एक बात समझनी होगी कि बच्चे को विज्ञान और गणित में सहज बनाने का काम प्राथमिक कक्षा में ही करना होगा। इसके लिए अनिवार्य है कि विज्ञान और गणित की प्राथमिक कक्षाएं बच्चों की मातृभाषा या स्थानीय भाषा में होनी चाहिए। यह न केवल समझ को आसान बनाती है, बल्कि बच्चों का आत्मविश्वास भी बढ़ाती है। गणित कोई कठिन पहेली नहीं, बल्कि दुनिया को समझने का तरीका है। यह शिक्षा व्यवस्था के लिए गहरी चिंता का विषय है और सुधार के लिए बड़े पैमाने पर नीति व क्रियान्वयन की आवश्यकता बनी हुई है।

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