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घेरे से निकलें, जाल को तोड़ें

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Get out of the circle, break the trap
Happy New Year - फोटो : Amar Ujala

नई सदी के शुरुआती दो दशकों को देखता हूं, तो पाता हूं कि खास तौर पर हिंदी पट्टी के युवा डांवाडोल हैं। इसे दयनीय स्थिति भी कह सकते हैं। मेरी जड़ें इसी पट्टी में हैं। वहां से निकल कर जब मैं शहरी और महानगरीय युवाओं को देखता हूं, तो उन्हें बहुत प्रोग्रेसिव पाता हूं। वहीं अपने गांव के बीस-पच्चीस साल के युवाओं में ऊर्जा तो बहुत दिखती है, मगर उन्हें सही दिशा देने वाला कोई नजर नहीं आता। वे पीछे छूट रहे हैं। उन्हें स्तरीय सोच, श्रेष्ठ साहित्य और अच्छे सिनेमा का पता नहीं, क्योंकि कोई उन तक पहुंचाने वाला नहीं। ऐसे में हिंदी पट्टी का युवा भ्रम की स्थिति में है। कभी-कभी मुझे लगता है कि पूरा तंत्र मिलकर चाहता है कि हिंदी का युवा पीछे रहे, क्योंकि सस्ता श्रम यहीं से आता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड पूरे देश क्या, विश्व में सस्ती दर पर मजदूरों की आपूर्ति करते हैं। अतः यहां के युवा को पढ़ा-लिखा देंगे, विकसित सोच से लैस कर देंगे, तो सस्ते मजदूर कहां मिलेंगे! राजनीतिक रूप से भी सबसे ज्यादा उन्माद यहीं के युवा में है। ऐसा नहीं कि उनमें राजनीतिक चेतना नहीं है, परंतु वह वर्ग बहुत छोटा है।


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मैं यह बात निराशा में नहीं कह रहा। इस सदी के बच्चे अद्भुत हैं। मुझे लगता है कि सिर्फ सही राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत है। समस्या यह भी है कि आज युवा किताब नहीं पढ़ रहे। वे मोबाइल में जो वाट्सऐप मैसेज आ रहे हैं, वही पढ़ रहे हैं। जबकि वहां इन मैसेजों की मार्केटिंग है। कोई अपने फायदे के विचार बेच रहा है, तो कोई विचारधारा बेच रहा है। जब युवा इंटरनेट की दुनिया से निकलेंगे, मर्जी का पढ़ेंगे-लिखेंगे, तभी तार्किक बनेंगे। इंटरनेट संचालित करने वालों की नजर में मनुष्य सिर्फ डाटा और यंत्र है। वे आपको तर्क और संवेदना से दूर करते हैं। मनुष्य बनने से दूर रखते हैं। हमें इंटरनेट की घेराबंदी से निकलना होगा। जरूरत और इच्छा का फर्क समझना होगा। मुद्दा यही है कि डिजिटल माध्यम, बाजार और राजनेता युवाओं का सिर्फ उपयोग कर रहे हैं। इस माहौल में माता-पिता की भूमिका बहुत अहम है। उन्हें न केवल बच्चों पर नजर रखनी है, बल्कि उन्हें वक्त भी देना है। सही-गलत समझाना है। मैं जानता हूं कि बच्चे सारी बात नहीं मानेंगे, परंतु हम उन्हें घर में सकारात्मक, संवेदनशील और तार्किक माहौल तो दे ही सकते हैं। हम बच्चों को अच्छा आदमी बना सकें, तो वे हमारी अच्छी बात जरूर सुनेंगे। नई पीढ़ी के बच्चे पुरानी पीढ़ी से कई मामलों में आगे हैं।

अपनी पीढ़ी की बात करूं, तो बीते बीस बरस में कई बदलाव देखे, जिनमें तकनीकी बदलाव सबसे बड़े हैं। हमारे गांव में टीवी और लैंडलाइन फोन नहीं थे। तब कोई कहता कि एक दिन फोन जेब में रहेगा तो हम कहते, क्या पागल हो? तकनीक के साथ देश आर्थिक और स्वास्य सुविधाओं की दिशा में बहुत आगे बढ़ा है। चुनाव का तरीका बदला है। बूथ कैप्चरिंग अब संभव नहीं, अब ब्रेन कैप्चरिंग होती है। इन सबके बीच सबसे ज्यादा लोग बदले हैं। पहले लोग घंटों खाली बैठे बतियाते थे, उत्सव मनाते थे। अब उत्सवधर्मिता खत्म हो गई। मानव संपर्क कम हुआ, डिजिटली हम जरूर जुड़ गए हैं, मगर संवेदना की जगह नहीं बची है। हम डिजिटल मंच पर किसी को भी ट्रोल कर देते हैं, गाली देते हैं। हमें पता ही नहीं चलता कि उसे कितना बुरा लगा। सामने गाली देते थे, तो पता चलता था कि कौन रोया, कौन नाराज हुआ। डिजिटल विश्व में हमें पता नहीं चलता कि हमने सही किया या गलत। हमारी बातें गंभीर हो गई हैं पर हंसना कम हो गया है। अब बाजार हमसे कहता है कि खुशियां चाहिए, तो फलां उत्पाद खरीद लो। क्या सचमुच खुशियां बाजार में बिक रही हैंॽ ईश्वर ने हंसी सिर्फ इंसान को दी। अब यह हंसी लाफ्टर थैरेपी में बदल गई है।

मनुष्य विकसित हुआ, तो उसकी पूंछ गायब हो गई। अब विकास की दौड़ में हमारा शारीरिक श्रम खत्म हो रहा है। गाड़ियों की वजह से पैदल चलना बहुत कम हो गया। गांव में मोपेड पहुंच गए और साइकिल बंद हो गई। जबकि हम पैदल चलने के लिए बने हैं। हम प्रकृति का अथाह दोहन कर रहे हैं। हमें लग रहा है कि ऑक्सीजन और पानी खत्म ही नहीं होंगे। हम समझ ही नहीं रहे कि जंगल नहीं लगाएंगे, तो ऑक्सीजन कहां से आएगी, बारिश कहां से होगी। प्रकृति के चक्र की चिंता ही नहीं है किसी को। हवा-पानी रहेंगे, तभी तो हिंदू-मुसलमान-सिख-ईसाई रहेंगे। मुझे लगता है कि आज की पीढ़ी को प्राकृतिक रूप से ज्यादा जागरूक होने की जरूरत है। समाज को डिजिटल संपर्क के बजाय सीधे एक-दूसरे से जुड़ने, बातें करने की आवश्यकता है।

-राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता।

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