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सच कहने के लिए प्रतिबद्ध थी गौरी

Mon, 11 Sep 2017 09:44 AM IST
नुपूर बासु
नुपूर बासु Updated Mon, 11 Sep 2017 09:44 AM IST
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Gauri was committed to telling the truth
गौरी लंकेश

वह काला मंगलवार था। जिस लड़की को मैं पिछले पैंतीस वर्ष से उसकी खूबसूरत मुस्कराहट और उसकी आंखों की शरारती जगमगाहट के लिए जानती थी, वह हमारे जीवन से चली गई। यह बात मुझे फोन पर रोते हुए एक महिला पत्रकार मित्र ने बताई। मुझे लगा, जैसे किसी ने मेरी जान निकाल ली हो।

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उससे जुड़ी यादें जेहन में तैरने लगीं। मैं गौरी लंकेश को बीती सदी के अस्सी के दशक से जानती थी, जब हमारा पत्रकारिता का करियर एक साथ गार्डन सिटी में शुरू हुआ था। हम युवा, बेपरवाह थे और सोचते थे कि हम दुनिया को जीत सकते हैं। हमारे कामकाजी माहौल ने हमें इसी तरह सोचने का अवसर दिया था। उस समय की राजनीति भी हमें सवाल पूछने का मौका देती थी। वह युवा पत्रकारों के करियर के लिए एक अच्छा समय था और हमने खुद को उस स्वतंत्र माहौल में तैयार किया था। एक प्रतिबद्ध और मेहनती पत्रकार होने के साथ एक मजेदार व्यक्ति के रूप में गौरी मेरी स्मृतियों में है। अपने घर-परिवार की तरह वह हमेशा उदार थी। कई शाम हममें से बहुत से लोग उसके घर जाते थे और उसके पिता पी लंकेश को अन्य लोगों के साथ थियेटर, फिल्म, राजनीति पर बातें करते सुनते थे। गौरी के पास अपने दोस्तों के लिए हमेशा समय होता था। आम के मौसम में हम उसके फार्म हाउस पर जाकर आम का मजा लेते थे।
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मौज-मस्ती और बेपरवाही के वे दिन तब खत्म हो गए, जब उसके पिता का देहांत हो गया और उसने अपने पिता की विरासत लंकेश पत्रिके का दायित्व संभाला। यह लगभग वही समय था, जब बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भारतीय राजनीति में बदलाव आने लगा था। गौरी ने स्पष्ट रूप से खुद को हिंदुत्व-विरोधी मंच की तरफ खड़ा किया था। पहला संकट तब आया, जब उसने कर्नाटक के चिकमंगलूर में हिंदुत्ववादियों के खिलाफ अपने कुछ दोस्तों के साथ मार्च निकाला और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। मुझे याद है, उस समय एक अन्य पत्रकार मित्र ने फोन पर बताया था कि गौरी जेल में अस्वस्थ थी। मैंने तत्काल तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री एस एम कृष्णा के मुख्य सचिव को फोन करके कहा था कि अगर आप गौरी को रिहा नहीं करेंगे, तो हम पत्रकार मुख्यमंत्री आवास के बाहर धरने पर पूरी रात बैठ जाएंगे। मात्र पांच मिनट के बाद मुझे फोन पर बताया गया कि आपकी दोस्त जेल से रिहा हो गई हैं। वह ऐसा दौर था, जब प्रशासन पत्रकारों के प्रति उत्तरदायी था। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, हालात बदतर होते चले गए। जब उसने भ्रष्टाचार के मामले उजागर करने की कोशिश की, तो भाजपा विधायकों ने उसके खिलाफ मानहानि का केस दर्ज कर दिया। जैसा कि महिला पत्रकारों के साथ होता है, उसे भी बर्बर तरीके से ट्रोल किया गया।
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उस मनहूस मंगलवार के दिन वह लंकेश पत्रिके, जिसके प्रति वह प्रतिबद्ध थी, के दफ्तर से घर लौट रही थी। वह कायरतापूर्ण घटना, जो उस रात उसके घर के बाहर दिखाई गई, केवल उस विद्रोही, मुक्त उत्साही पत्रकार को चुप करा सकती थी, जो अपनी बात खुलकर बोलती थी। जब तक उसके हत्यारों को कानून के दायरे में नहीं लाया जाता, पत्रकारों और नागरिक समाज को गौरी के लिए एकजुटता प्रदर्शित करना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अपराधी सजा से बच नहीं सकते।


अलविदा मेरी दोस्त गौरी, हम तुम्हारी आंखों की जगमगाहट और सत्ता के समक्ष सच बोलने की तुम्हारी क्षमता को नहीं भूल पाएंगे। जीवन की लंबी योजना में तुम जीतीं, वे हार गए।

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