फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   garbage at river banks in uttarakhand tourist crowd poses threat to environment climate change

पर्यावरण: नदियों के किनारे कूड़े के ढेर मत बनाइए, कम से कम अब तो चेत जाइए

Wed, 28 Jun 2023 06:42 AM IST
Kshama Sharma क्षमा शर्मा
Updated Wed, 28 Jun 2023 06:42 AM IST
विज्ञापन
सार
आखिर पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील पर्यटन और तीर्थ स्थलों पर यात्रियों के जाने की संख्या निर्धारित क्यों नहीं कर दी जाती।
loader
garbage at river banks in uttarakhand tourist crowd poses threat to environment climate change
garbage at river banks - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

खबर पढ़ी कि यमुनोत्री में भागीरथी के किनारे यात्रियों ने सात क्विंटल के करीब कपड़े, जिनमें साड़ियां अधिक हैं, छोड़ दी हैं। हालांकि प्रशासन ने चेतावनी भी जारी की थी कि जो लोग कपड़े या कूड़ा फैलाएंगे, उन पर एक हजार रुपये का जुर्माना लगेगा, मगर इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। आखिर प्रशासन ने ऐसा जुर्माना कितने लोगों पर लगाया? हो सकता है कि इस बात का डर लगा हो कि कहीं कोई अनावश्यक तनाव न पैदा हो जाए। लगभग सारे पर्यटन


स्थलों और उनके रास्तों का यही हाल है।

पिछले दिनों तीन दिन की उत्तराखंड यात्रा में ये दृश्य मैंने अपनी आंखों से देखा था। लोग खाते हैं और रैपर सड़कों पर फेंकते जाते हैं। गंगा के किनारे पॉलिथीन और अन्य कूड़े के ढेर पड़े हैं। एक तरफ हम गंगा को पूजते हैं, इस विशाल नदी को देवी का स्थान देते हैं, लेकिन इसे गंदा करने में पीछे भी नहीं रहते। ऐसे में बनाते रहिए इसे साफ करने के लिए अरबों रुपये की योजनाएं। न जाने क्यों अपने यहां कूड़ा फैलाने वाला वर्ग यह सोचता है कि सफाई की जिम्मेदारी उसकी नहीं, किसी और की या सरकार की है। यदि किसी चीज को खाकर कूड़ा अपने पास ही रख लिया जाए और किसी कूड़ेदान में फेंका जाए, तो किसी का कोई नुकसान नहीं होता, कूड़ा फैलता भी नहीं है, मगर किसी को इस बारे में सोचने की जरूरत ही महसूस नहीं होती।


इस यात्रा में भीड़ का आलम दिल्ली से बाहर निकलते ही शुरू हो गया था। हरिद्वार के घाटों पर नहाने और नहाने की प्रतीक्षा करने वालों की लंबी-लंबी लाइनें लगी थीं। ऐसा हर साल ही होता होगा। भीड़ इतनी है कि जहां दिल्ली से पांच घंटों में पहुंचा जा सकता है, वहां ग्यारह से लेकर चौदह घंटे लगते हैं। इससे यात्रियों की परेशानी तो बढ़ती ही है, वाहनों के पेट्रोल एवं डीजल आदि से, जो लगातार कार्बन उत्सर्जन होता है, उसका क्या इलाज है। कार्बन उत्सर्जन प्रदूषण का बड़ा कारण है, जिससे अब पहाड़ और उनके आसपास बसे शहर भी कराह रहे हैं।

आखिर किसी भी स्थान पर यात्रियों के जाने की संख्या निर्धारित क्यों नहीं कर दी जाती। कौन से रास्ते बंद हैं, कौन से खुले, इस बारे में भी यात्रियों को सूचित करने की भी शायद ही कोई व्यवस्था है। अगर सरकार की आय बढ़ रही है, तो उसे यात्रियों की सुविधाओं के लिए भी खर्च किया जाए, ताकि न भीड़ बढ़े, न जाम लगे, न प्रदूषण फैले। कुछ साल पहले नैनीताल प्रशासन ने अपने यहां एक संख्या के बाद पर्यटकों के आने पर रोक लगा दी थी।

ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण दो अरब लोगों को पानी देने वाले हिमालय के ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं। 2011 से 2020 तक ग्लेशियर 65 प्रतिशत तेजी से पिघले। एक अनुमान के अनुसार, इस सदी के अंत तक ग्लेशियर अपनी ताजा स्थिति के मुकाबले अस्सी प्रतिशत तक खत्म हो सकते हैं। गोमुख के सिकुड़ने की खबरें तो दशकों से आ ही रही हैं। यही गंगा का उद्गम स्थल है। कहते हैं कि तुलसीदास ने कहा था कि कलयुग में गंगा सूख जाएगी।

गोमुख पिघल गया, तो हमारी यह महान नदी कैसे बचेगी, यह सोचने की बात है। अमरनाथ के बारे में भी कहा जाता है कि वहां बर्फ से बनने वाला शिवलिंग भी पिघल जाता है। इसका बड़ा कारण है पेट्रोल, डीजल वाहनों से मनुष्यों की बढ़ती आवाजाही। कश्मीर के आम लोग कह रहे हैं कि अब और अधिक पर्यटक नहीं चाहिए। एक तरफ आर्थिकी को बढ़ाने के लिए पर्यटन जरूरी माना जाता है, दूसरी तरफ जरूरत से ज्यादा मनुष्यों की उपस्थिति पर्यावरण का विनाश करती है। हमारे देश में तो पर्यटक कूड़े का ढेर भी लगाते हैं। और कूड़े के निपटान का कोई स्थायी प्रबंध भी नहीं है। यात्राओं के दिनों में पहाड़ों पर भीषण ट्रैफिक जाम भी देखने में आता है। इससे स्थानीय लोगों को भी समस्याएं होती हैं। कई स्थानीय लोगों ने कहा भी कि हमारा तो जीना ही दूभर हो गया है। थोड़े दिनों में कांवड़ की यात्राएं शुरू हो जाएंगी। तब भी हरिद्वार, ऋषिकेश आदि शहरों में जनसमूह उमड़ पड़ेगा। कैसे बचेंगे ग्लेशियर और हमारे जल के स्रोत?

पानी नहीं तो जीवन भी नहीं, लेकिन जब तक आपदा सिर पर न आन पड़े, कोई सोचता भी नहीं है। यह लेखिका वहां पर्यटन के लिए नहीं, किसी काम से गई थी, लेकिन वहां जाकर लगा कि जिस भीड़ के लिए चिंतित हो रही है, उसमें खुद भी शामिल है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed