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गांधी जैसा भारत चाहते थे
अमरनाथ भाई
Updated Mon, 14 Aug 2017 07:23 PM IST
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लाल किला
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आज जब हम अपनी स्वाधीनता का जश्न मना रहे हैं, तो मुझे लगता है कि यह आजादी के सात दशकों के सफर की समीक्षा का भी अवसर है कि इस दौरान हमने क्या-क्या उपलब्धियां हासिल की हैं और हमारे कौन से सपने अब भी अधूरे हैं। इस दौरान हमने जीवन के लगभग हर क्षेत्र में प्रगति की है और अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं।
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निश्चित रूप से रोटी, कपड़ा, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य की दिशा में प्रगति हुई है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हमारी उपलब्धियां एक मिसाल है। बैलगाड़ियों का देश कहा जाने वाला भारत आज अंतरिक्ष में एक साथ सौ से ज्यादा उपग्रहों का प्रक्षेपण करता है। जिस समय हमें आजादी मिली थी, हम पेट भरने के लिए बाहर से अन्न मंगाते थे, लेकिन आज हम न केवल खाद्य पदार्थों के मामले में आत्मनिर्भर हो गए हैं, बल्कि दूसरे देशों को अनाज निर्यात भी करते हैं। इसी तरह देश भर में कल-कारखानों का जाल बिछ गया है। शिक्षा के बड़े-बड़े संस्थान एवं विश्वविद्यालय खुल गए हैं और स्वास्थ्य सुविधा के लिए बड़े-बड़े अस्पताल खुले हैं, जहां कई अन्य देशों के मुकाबले सस्ते इलाज उपलब्ध हैं। हमारे देश के शिक्षित युवा दुनिया भर में अपने ज्ञान एवं हुनर का परचम लहरा रहे हैं। खेल के क्षेत्र में भी हमारी उपलब्धियां कम उल्लेखनीय नहीं हैं।
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जाहिर है, इन सात दशकों में विकास तो हुआ है, लेकिन सवाल विकास की दिशा का है। इस दौरान हम भौतिकता की दिशा में ज्यादा बढ़ते गए, केंद्रीकरण की दिशा में बढ़ते गए। हमने विकास का जो मॉडल अपनाया, उसमें बाजार और सरकार व्यापक होकर हमारे चूल्हे-चौके तक पहुंच गई। एक स्वतंत्र देश के नागरिक की जो हैसियत बननी चाहिए थी, वह नहीं बन पाई। विज्ञान की सुविधाएं और लोकतंत्र का अवसर मुट्ठी भर लोगों के हाथों में सिमटकर रह गया, आम जनों तक नहीं पहुंच सका। यदि विकास से समृद्धि बढ़ी है, तो आर्थिक विषमता भी बढ़ती चली गई है। शिक्षा बढ़ी है, तो बेरोजगारी भी बढ़ती चली गई है। समाज में नैतिकता, सामाजिक समरसता, सांप्रदायिक सौहार्द का क्षरण हुआ है।
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गांधी ने दो मोर्चे पर काम किया, एक मोर्चा अंग्रेजों को देश से भगाने का था और दूसरा मोर्चा था कि अंग्रेजों के जाने के बाद कैसा भारत बनेगा। नए भारत के निर्माण के लिए उन्होंने देसज विकास की कल्पना की थी। उन्होंने देखा था कि विज्ञान, जो मनुष्य के लिए वरदान था, वह अभिशाप में तब्दील हो रहा है। इसलिए उन्होंने परिकल्पना की थी कि भारत का विकास लोकशक्ति के आधार पर देसज तरीके से होगा और उसे उन्होंने अपने आश्रमों में लागू भी किया था। शिक्षा कैसी हो, उद्योग-धंधे कैसे होने चाहिए, ग्राम एवं नगरों का विकास कैसे होना चाहिए, लोगों के बीच आपस के संबंध कैसे हों, मूल्यों का संरक्षण कैसे हो और आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक ढांचा कैसे तैयार हो- उन्होंने इन सबकी रूपरेखा तैयार की थी। पर लगता है कि उनके साथियों को उनकी बात समझ में नहीं आई या उन रास्तों पर चलना रास नहीं आया।
यह भटकाव आजादी के बाद से ही शुरू हो गया था, लेकिन नई अर्थनीति लागू होने के बाद से बर्बादी ज्यादा बढ़ी। हाल ही में हमारे प्रधानमंत्री ने कहा था कि आतंकवाद और पर्यावरण की चुनौतियों से दुनिया त्रस्त है। मुझे लग रहा है कि आतंकवाद और पर्यावरण विनाश, दोनों विकास के मौजूदा मॉडल का परिणाम है। हमारे यहां नक्सलवाद की जो समस्या एक बड़े खतरे के रूप में उभरी है, वह आर्थिक विषमता बढ़ने का परिणाम है। लोकतंत्र, समानता, स्वतंत्रता, समाजवाद आदि के सपनों ने वंचित लोगों की आकांक्षाएं जगा दी हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में उन्हें यह सब हासिल नहीं हो रहा है, तो वह भला कब तक चुप बैठा रहेगा! असीमित भोगवादी संस्कृति के चलते प्राकृतिक संसाधनों की लूट हो रही है। नतीजा हम देख रहे हैं कि ओजोन परत में छेद हो गया है, पहाड़ों को खोखला कर दिया गया है, पेड़ों को काटकर कंकरीट के जंगल उगा दिए गए हैं, नदियों को गटर बना दिया गया है। दुनिया की अच्छाइयों का जरूर स्वागत करना चाहिए, लेकिन विकास हमारी अपनी परंपराओं, संस्कृति, जलवायु एवं पर्यावरणीय स्थितियों के अनुरूप होना चाहिए। हमारी सांस्कृतिक जड़ें बहुत गहरी हैं, यहां धरती, जंगल, पहाड़, नदियों की पूजा होती रही है। इकबाल ने यों ही नहीं कहा था कि यूनानो मिस्र रोमां सब मिट गए जहां से, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।
गांधी जी ने जो कल्पना की थी उसमें यह भाव था कि समाज का कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी महसूस करे कि स्वराज में हमारा भी हिस्सा है और अगर सत्ता का दुरुपयोग हो, तो अदना-सा व्यक्ति भी खड़ा होकर उसका विरोध कर सके। न्याय और समता सहित सभी सुविधाएं अंतिम आदमी तक पहुंचे और लोकतंत्र में मनुष्य की प्रतिष्ठा सिर्फ मनुष्य होने के नाते हो, न कि धन, विद्या, धर्म, जाति या पद के कारण। लेकिन आज तो जब भी कोई सवाल उठाया जाता है, तो सत्ता पक्ष की तरफ से सबसे पहले यही कहा जाता है कि ऐसा तो पहले भी हुआ था। और फिर पीड़ित पक्ष को ही कठघरे में खड़ा किया जाता है। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई है, लेकिन अब तो विपक्ष मुक्त भारत की बातें हो रही हैं।
लेकिन मुझे इस देश की जनता से काफी उम्मीदें हैं। जनता ने पिछले सत्तर वर्षों में विभिन्न राजनीतिक दलों को शासन चलाने का अधिकार दिया। उसे जब भी परिवर्तन की जरूरत महसूस हुई, उसने सत्ता में परिवर्तन किया। दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र की स्थापना के कुछ ही वर्षों बाद तानाशाही आ गई, लेकिन हमारे यहां लोकतंत्र जिंदा है और अब भी बहुत से मूल्य बचे हुए हैं। इंदिरा गांधी की इमर्जेंसी को भी जनता ने खत्म किया और मोरारजी देसाई सरकार की अराजकता को भी। इसलिए मुझे लगता है कि इस देश की जनता जरूर एक नए भारत के निर्माण के लिए नया रास्ता तलाशेगी। वह दिन जरूर आएगा, जब लोकतंत्र का लोक जागेगा।