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गांधी जी के वारिस: आखिर असली कौन हैं?
Mon, 07 Oct 2019 05:23 AM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह
Published by: तवलीन सिंह
Updated Mon, 07 Oct 2019 05:23 AM IST
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महात्मा गांधी
- फोटो : फाइल फोटो
गांधी जी को अपनाने की जितनी कोशिश इस बार उनकी जयंती पर हमारे राजनेताओं ने की है, उतनी कोशिश कभी पहले देखने को नहीं मिली। साबरमती आश्रम से प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि देते हुए स्वच्छ भारत अभियान द्वारा देश के हर जिले में खुले में शौच समाप्त होने की सूचना दी। इस जन आंदोलन को उन्होंने गांधी जी के नाम समर्पित किया। दिल्ली में सोनिया गांधी ने अपने भाषण में स्पष्ट किया कि गांधी जी के मार्ग पर चलने का श्रेय सिर्फ कांग्रेस को मिल सकता है। भारतीय जनता पार्टी का नाम लिए बिना कांग्रेस अध्यक्ष ने संकेत दिया कि वह किस तरफ इशारा कर रही थीं, जब उन्होंने कहा कि सत्ता के भूखे लोगों को महात्मा गांधी का नाम लेने का कोई अधिकार नहीं है।
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उनके दोनों बच्चों ने गांधी जयंती पर पदयात्राएं कीं। लखनऊ में पदयात्रा करते समय प्रियंका गांधी ने कहा कि गांधी जी जीवन भर सत्य के मार्ग पर चले थे, सो उनका नाम लेनेवालों को पहले सत्य के मार्ग पर चलकर दिखाना होगा। उनके भाई ने दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय से राजघाट तक एक झांकी के पीछे चलते हुए, जिसमें चरखा रखा हुआ था, पदयात्रा की। गांधी जी के नाम पर यह नाटक घर बैठे टीवी पर मैंने देखे और यह सोचने पर मजबूर हुई कि वास्तव में गांधी जी के असली वारिस कौन हैं। खूब सोचने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंची हूं कि इस विरासत की हकदार न कांग्रेस पार्टी है और न भारतीय जनता पार्टी। गांधी जी ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अमन-शांति लाने के प्रयास में अपनी जान गंवाई। हमारे राजनेता यह बात जैसे भूल चुके हैं।
कांग्रेस के ‘सेक्युलर’ दौर में कई बार मुसलमानों को और एक बार सिखों को निशाना बनाया गया। उस समय देश की इस सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को गांधी जी याद नहीं आए। अब भाजपा के दौर में नफरत का माहौल इतना बन गया है कि आम मुसलमान, दलित और ईसाई अपने आपको दूसरे दर्जे के नागरिक समझने लगे हैं। ऐसा उनको क्यों न लगे, जब गृह मंत्री कई बार कह चुके हैं कि हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और ईसाई शरणार्थियों के लिए भारत के दरवाजे हमेशा खुले रहेंगे। यह क्यों नहीं कह देते कि सिर्फ मुसलमानों के लिए दरवाजे बंद होंगे? गांधी जी के सिद्धांत याद रहते, तो इस तरह की बात नहीं की जाती।
सद्भावना और अहिंसा गांधी जी की विरासत हैं। यह कहते हुए दुख होता है कि इस विरासत का सम्मान आज विश्व के हर उस देश में होता है, जहां लोग जुल्म और अत्याचार के खिलाफ लड़ रहे हैं, लेकिन भारत में नहीं। मार्टिन लूथर किंग ने गांधी जी से प्रेरणा लेकर अमेरिका में अश्वेत लोगों के लिए बराबरी का अधिकार हासिल करने के लिए संघर्ष किया। अहिंसा को आधार मानकर विश्व के अन्य राजनेताओं ने भी इस तरह के संघर्ष किए हैं। सो आज भी गांधी जी के विचार विश्व में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन भारत में हमारे राजनेता उनको भूल से गए थे, जब तक नरेंद्र मोदी ने उनके नाम पर पांच वर्ष पहले स्वच्छ भारत अभियान शुरू नहीं किया था। भारत में असली श्रद्धांजलि अगर दी गई है, तो इस अभियान के रूप में।
लेकिन जहां तक हिंदुओं और मुसलमानों में भाईचारा और सद्भावना लाने की बात है, तो यहां नरेंद्र मोदी भी नाकाम रहे हैं। उनके समर्थक सोशल मीडिया पर बापू का मजाक उड़ाते हैं। कई ऐसे भी हैं, जो बंटवारे का दोष खुलकर गांधी जी पर डालते हैं। उनको वे खलनायक मानते हैं, महात्मा नहीं।