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गांधी, शराब और वैचारिक उलझन

Fri, 09 Jan 2015 07:37 PM IST
कुमार प्रशांत
कुमार प्रशांत Updated Fri, 09 Jan 2015 07:37 PM IST
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Gandhi, alcohol and Conceptual confusion

अपनी आत्मकथा में महात्मा गांधी ने सत्य से अपने प्रयोग के जितने कारनामों का जिक्र किया है, उनमें शराब नहीं है। अब तक हम मानते आए हैं कि उन्होंने जिनका जिक्र नहीं किया है, उनका उनके जीवन में स्थान नहीं रहा। किसी भी आजाद मनुष्य और आजाद समाज की अपनी परिकल्पना में उन्होंने जिन निषेधों की बात की है, उसमें नशे के निषेध का खास स्थान है। यह सब मैं आज इसलिए लिख रहा हूं कि एक खबर ने मुझे बेचैन कर रखा है। शराब बनाने वाली अमेरिकी कंपनी द न्यू इंग्लैंड ब्रूइंग ने अपनी बीयर की जो नई कैन बनाई, उसे नाम दिया है, गांधी-बोट लेबल! कंपनी बहुत बड़ी नहीं है। इस कंपनी ने पिछले वर्ष 8,000 बैरल बीयर बनाई व बेची थी; नए वर्ष में उसका लक्ष्यांक 14,000 बैरल का धंधा करने का है। यह गांधी-बोट उसी दिशा में उठाया गया कदम है।

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एक सज्जन हैं, भास्कर सुरेजा। वह अमेरिका में शराब बेचने का छोटा-सा धंधा करते हैं। इस गांधी-बोट ने आते ही भास्कर जी की दूकान का धंधा बढ़ा दिया। लेकिन भास्कर जी की एक बड़ी दिक्कत है कि वह उसी पोरबंदर के हैं, जहां के महात्मा गांधी थे। इसलिए मन में कहीं यह सवाल था कि महात्मा गांधी के नाम और चित्र का ऐसा धंधा कितना उपयुक्त है? तभी हैदराबाद की अदालत में किन्हीं जनार्दन गौड़ ने मुकदमा दायर कर गांधी-बोट पर रोक लगाने की बात कही। खबर बनी, तो फैली और अमेरिका तक जा पहुंची। खलबली मचनी ही थी! शराब का धंधा करने वाले अधिकांश भारतीयों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि गांधी के नाम पर शराब बेचना कितना नैतिक है? भास्कर सुरेजा ने इसे अलग नजरिये से देखा। उन्होंने द न्यू इंग्लैंड ब्रूइंग कंपनी से अपील की कि वह इसका नाम कुछ और रखे। मगर कंपनी ने इस सारे विवाद को एक अलग ही धरातल पर पहुंचा दिया।
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असल में, कंपनी ने कहा कि यह बीयर, उसकी तरफ से महात्मा गांधी की महानता को नमन है! उसका यह भी कहना था कि बीयर शाकाहारी है। आत्मशुद्धि का और सत्य एवं प्यार का प्रसार करने का यह अपूर्व साधन है। हम भारत के उन सभी लोगों से क्षमा मांगते हैं, जिन्हें हमारी बीयर से दुख हुआ है। मगर कंपनी को यह भरोसा है कि इस बीयर से लोगों में महात्मा गांधी को जानने की और अहिंसक संघर्ष की उनकी विचारधारा को समझने की प्रेरणा मिलेगी। कंपनी अंत में कहती है, हम आशा करते हैं कि महात्मा गाधी के प्रति श्रद्धा निवेदित करने के हमारे इरादे को लोग समझेंगे और हमारे इस अधिकार का सम्मान करेंगे।
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मेरी उलझन यहीं से शुरू होती है। क्या द न्यू इंग्लैंड ब्रूइंग कंपनी जो कह रही है, उसमें कुछ भी सच नहीं है? शराब पीना जहां अनैतिक नहीं माना जाता, क्या वहां महात्मा गांधी या किसी दूसरे को भी, सम्मानित करने का एक तरीका यह नहीं है कि उसके नाम पर अपने उत्पाद का नाम रखा जाए? अपने यहां भी हम सड़कों, पार्कों, परियोजनाओं, अस्पतालों, भवनों, संस्थानों से लेकर बीड़ी, साबुन आदि-आदि का नाम महात्मा गांधी से जोड़ कर रखते ही हैं। महात्मा गांधी के नाम व चित्र के साथ शराब बेची जाए, यह मुझे भी पसंद नहीं है। पर मेरे लिए यह मेरी निजी नापसंदगी है, किसी की नैतिकता से जुड़ा सवाल नहीं है। नैतिक लक्ष्मण रेखाएं तभी व्यक्ति और समाज के लिए कल्याणकारी होती हैं, जब आपके मन में लक्ष्मणत्व का मान हो। 'गांधी' के नशे में सारी दुनिया सराबोर हो, यही वह लक्ष्मणत्व है, जिसकी दुनिया को जरूरत है। मैं द न्यू इंग्लैंड ब्रूइंग कंपनी की महात्मा गांधी के प्रति श्रद्धा पर सवाल नहीं उठाऊंगा। क्या आप इस उलझन को सुलझाने में मेरी मदद कर सकते हैं?

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