फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   G-7 and saving world illusion rich countries together decide fate of 200 countries Is this not rigid mentality

जी-7 और दुनिया बचाने का भ्रम: सात अमीर देश मिलकर करें 200 देशों का भाग्य निर्धारण! क्या यह जड़ मानसिकता नहीं?

Wed, 21 May 2025 08:05 AM IST
Deepak Vohra दीपक वोहरा
Updated Wed, 21 May 2025 08:05 AM IST
विज्ञापन
सार
अगले महीने कनाडा में होने वाले जी-७ सम्मेलन की तैयारियां जोरों पर हैं, लेकिन सवाल यह है कि सात अमीर देश मिलकर अगर बाकी 200 देशों के भाग्य का निर्धारण करने और दुनिया को बचा लेने की डींगें हांकेंगे, तो क्या यह जड़ मानसिकता का परिचायक नहीं होगा।
loader
G-7 and saving world illusion rich countries together decide fate of 200 countries Is this not rigid mentality
जी-7 देशों के झंडे - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

दुनिया की सात सबसे बड़ी तथाकथित ‘उन्नत’ अर्थव्यवस्थाओं का समूह जी-7, जो वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली पर हावी है, वैश्विक नीति समन्वय के लिए एक मंच के रूप में कार्य करता है, लेकिन लोग आंतरिक मतभेदों और जी 20 जैसे वैकल्पिक अधिक प्रतिनिधि संस्थानों के उदय के कारण इस समूह की प्रासंगिकता पर तेजी से सवाल उठा रहे हैं।



जी-7 का अब भी अस्तित्व में बने रहना एक निश्चित जड़ मानसिकता को दर्शाता है कि सात अमीर देश बाकी 200 देशों के भाग्य का निर्धारण कर सकते हैं। इसकी घड़ी 1960 के दशक में ही अटकी हुई है। इसके आंतरिक विभाजन के अलावा, बाहरी गतिशीलता ने जी-7 के वैश्विक प्रभाव को कम कर दिया है। मौजूदा स्वरूप में जी-7 के अस्तित्व में बने रहने का कोई कारण नहीं रह गया है। हाल ही में, दुनिया के उन्नीस सबसे बड़े देशों और यूरोपीय संघ के समूह (जी-20) की शक्ति और प्रतिष्ठा, जी-7 से आगे निकल गई है। जी-20 के सदस्य देश वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 80 फीसदी और दुनिया की करीब 60 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। 


चीन, भारत और ब्राजील जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं ने भारी लाभ कमाया है, जिससे जी-7 की प्रासंगिकता और विश्व अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने में इसकी भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, जो कम अमीर देशों के विकास पर तेजी से निर्भर हो रही है। ब्राजील, चीन, भारत, मेक्सिको और दक्षिण अफ्रीका सहित उभरती शक्तियां, जिनकी जी-7 में अनुपस्थिति अक्सर देखी जाती थी, वे सभी जी-20 में शामिल हैं। इसके अलावा ब्रिक्स नए सदस्यों को शामिल कर रहा है, जबकि जी-7 एक बंद क्लब है। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में कोई भी उच्च स्तरीय शिखर सम्मेलन नहीं हुआ, जो इस बात का संकेत है कि संयुक्त राष्ट्र का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। 

वर्ष 2025 पागलपन का साल है। यूक्रेन और उसका विनाश, इस साल का प्रमुख मुद्दा है, जैसा कि इस्राइल और गाजा का है। कश्मीर में हुए भीषण आतंकवादी हमले से उपजे भारत-पाकिस्तान तनाव ने कुछ समय के लिए अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरीं। फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हास्यास्पद दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान, दोनों को पीछे हटने या व्यापार प्रतिबंधों का सामना करने के लिए धमकाकर तृतीय विश्वयुद्ध को रोका है। पाकिस्तान और उसके द्वारा अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद को जन्म देने को आसानी से भुला दिया गया। मई 2025 के मध्य में राष्ट्रपति ट्रंप सऊदी अरब गए, जो उनके दूसरे कार्यकाल में उनकी पहली विदेश यात्रा थी, और सऊदी क्राउन प्रिंस की मौजूदगी में उन्होंने सीरिया के स्वयंभू आतंकवादी राष्ट्रपति को गले लगाया, जिसके सिर पर एक करोड़ अमेरिकी डॉलर का इनाम था। वह ट्रंप का सबसे नया ‘सुंदर’ पसंदीदा बन गया। वह यूएई और कतर भी गए और उनके साथ अरबों डॉलर के रक्षा सौदे किए। उन्होंने ईरान से कहा कि वह उनसे प्यार करते हैं, जबकि कुछ समय पहले ही उन्होंने उसे खत्म करने की धमकी दी थी। यहां तक कि ट्रंप ने अमेरिका के कट्टर दुश्मन चीन के साथ समझौता करने का फैसला किया, जो अपने मूल हितों की रक्षा करने में आक्रामक है। इससे अमेरिका के वफादार सहयोगी यूरोप का क्या होगा, जिसके चार सदस्य जी-7 में भी हैं?

अंतरराष्ट्रीय खबरों में जी-7 और यूरोपीय संघ लगभग भुला दिए गए हैं। दक्षिण की स्वीकार्य आवाज के रूप में भारत चाहता है कि जी-7 और विश्व उन वैश्विक मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित करे, जो वर्तमान संकट से पहले के हैं और बाद में भी रहेंगे। लेकिन हो क्या रहा है? वैश्विक उथल-पुथल में जी-7 कहां फिट बैठता है? कहीं नहीं। यह शीत युद्ध का अवशेष है, अहंकार का डायनासोर है, जिसका अंत आ गया है। अमेरिका, फ्रांस, इटली, जापान, ब्रिटेन और पश्चिम जर्मनी ने 1975 में छह देशों का समूह बनाया था, ताकि गैर-साम्यवादी शक्तियों को आर्थिक चिंताओं से निपटने के लिए एक मंच प्रदान किया जा सके, जिसमें तेल का झटका, मुद्रास्फीति और पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) के तेल प्रतिबंध से उत्पन्न मंदी शामिल थी। कनाडा ने गुहार लगाई, तो अगले वर्ष उसे भी इसमें शामिल होने की अनुमति दे दी गई, और शीत युद्ध की राजनीति हमेशा समूह के एजेंडे में शामिल रही। उस समय इसका सकल घरेलू उत्पाद दुनिया के तीन चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता था। अब यह एक तिहाई से भी कम है।

रूस को 1991 में गैर-सदस्य के रूप में आमंत्रित किया गया था (वह इसमें शामिल हुआ, लेकिन बाद में उसे बाहर निकाल दिया गया), भारत और चीन 2003 में मेहमान सदस्य थे, जब चीन के साथ रोमांस पूरे जोरों पर था। चीन के मामले में जी-7 का रुख सख्त है और वह पूर्वी तथा दक्षिणी चीन सागर की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त करता है तथा बल या दबाव के जरिये यथास्थिति को बदलने के किसी भी एकतरफा प्रयास का विरोध करता है। उसने तिब्बत, शिनजियांग व हांगकांग में मानवाधिकारों की बात करके बीजिंग को परेशान करने की कोशिश की। चीन ने इसका मजाक उड़ाया। वर्ष 2014 में रूस को निलंबित और चीन को बाहर कर दिया गया, लेकिन भारत अतिथि सूची में बना रहा। चूंकि इसकी वैश्विक आर्थिक ताकत कम हो गई है, इसलिए जी-7 अपने लिए एक कारण की तलाश में है। 

वैश्विक आर्थिक प्रशासन, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा नीति जैसे मुद्दों पर चर्चा करने के लिए प्रतिवर्ष जी-7 की बैठक होती है। इसके छोटे और अपेक्षाकृत समरूप सदस्य सामूहिक निर्णय लेने को बढ़ावा देते हैं, लेकिन अनुपालन की कमी होती है और महत्वपूर्ण उभरती शक्तियां इससे बाहर रह जाती हैं। इसने यूक्रेन पर रूसी हमले के जवाब में रूस पर समन्वित प्रतिबंध लगाए, जिनमें रूसी तेल की कीमत पर सीमा लगाना और चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का मुकाबला करने के लिए एक प्रमुख वैश्विक बुनियादी ढांचा कार्यक्रम शुरू करना शामिल है। लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। रूस और धीरे-धीरे चीन से बढ़ते तनाव के साथ व्यापार और जलवायु नीतियों पर आंतरिक असहमति के कारण जी-7 का भविष्य चुनौतीपूर्ण हो गया है। डोनाल्ड ट्रंप अपने पहले कार्यकाल के दौरान भारत, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया को शामिल करके जी-7 का विस्तार करना चाहते थे। फिर उनकी दिलचस्पी खत्म हो गई। जहां तक जी-7 के बारे में भारत के नजरिये की बात है, तो भारत इसके प्रति उदासीन है। अगले महीने जी-7 के नेता मिलेंगे, बढ़िया भोजन का आनंद लेंगे, बातचीत करेंगे, शांति और संवाद पर हल्के-फुल्के बयान जारी करेंगे और फिर यह कल्पना करते हुए घर लौट जाएंगे कि उन्होंने दुनिया को बचा लिया है।    

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed