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फुलप्रूफ है नई कोल आवंटन नीति

Fri, 04 Jan 2013 10:27 PM IST
Updated Fri, 04 Jan 2013 10:27 PM IST
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fulpruf new coal allocation policy
कोलगेट पर कैग के आकलन को लेकर उठ रहे सवालों के बाद अब कोल ब्लॉक आवंटन के लिए नई प्रक्रिया बनाई गई है। इस नई प्रक्रिया को लेकर कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल से धीरज कनोजिया ने बातचीत की-
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- करीब चार साल के बाद सरकार ने कोल ब्लॉक आवंटन की प्रक्रिया शुरू की है। क्या नई आवंटन नीति फुलप्रूफ है? 
जब यह विवाद सामने आया था, तभी मंत्रालय ने ऐलान किया था कि आवंटन में नीलामी की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। इसीलिए एमएमडीआर ऐक्ट भी पास हुआ था कि सारे कोल ब्लॉक नीलाम करेंगे या राज्य सरकार और पीएसयू रूट के जरिये आवंटन होगा। राज्य और पीएसयू से ऑफर मांगे गए है। आवंटन का दूसरा रूट नीलामी प्रक्रिया है। उसके लिए कोल ब्लॉक की पहचान हो गई है और प्रक्रिया भी जल्दी शुरू होगी।

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- नीलामी प्रक्रिया में क्या सरकारी क्षेत्र की कंपनियां भी शामिल हो सकती हैं?
बीडिंग निजी कंपनी के लिए है। इसके लिए दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। सार्वजनिक क्षेत्र और राज्यों के लिए अलग आवंटन रूट है, जिसकी शुरुआत हमने कर दी है।

- दागी या शर्तें पूरी नहीं करने वाली कंपनियों को क्या नीलामी प्रक्रिया में शामिल होने से रोका जाएगा?

कोयला मंत्रालय ने शर्तों का उल्लंघन करने वाली कुछ कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई जरूर की है। अगर उनमें से कोई कंपनी गारंटी जमाकर आना चाहती है, तो हम देखेंगे। उन पर किसी तरह की रोक नहीं लगाई गई है। हालांकि यह प्रक्रिया लंबी जरूर चल सकती है, पर पारदर्शी होगी।
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- इस विवाद के कारण बिजली उत्पादन पर जो नकारात्मक असर पड़ा है, क्या उसका कोई आकलन किया गया है?  
उत्पादन पर असर आवंटन विवाद के कारण नहीं, बल्कि पर्यावरण से जुड़े मुद्दे और भूमि अधिग्रहण के चलते पड़ा है। कुछ कोल ब्लॉक के मामलों में कानून व्यवस्था का मुद्दा रहा है। एमएमडीआर ऐक्ट पास होने से रास्ता साफ हुआ है।

- पर्यावरण मंत्रालय के रुख पर आपको ऐतराज था और मुद्दा प्रधानमंत्री के पास पहुंचा था, क्या मामला सुलझा? 
 
पूरी तरह नहीं, मगर कुछ रास्ता निकला है। हम भी नहीं चाहते कि पर्यावरण संतुलन बिगड़े। इसके लिए सख्त नियम बनाए गए हैं। यानी घने जंगलों में माइनिंग नहीं होगी। कई जगह बिना जंगल काटे अंडरग्राउंड माइनिंग भी चल रही है। देश के विकास लिए माइनिंग जरूरी है।  

- वर्ष 2009 तक के आवंटन पर कैग ने एक अनुमानित नुकसान का आकलन  किया था? क्या नई प्रक्रिया में ऐसे नुकसान और कैग की ओर से उठाए सवालों का समाधान है?

अब उम्मीद नहीं कि फिर सवाल उठेंगे। हम कैग के नुकसान संबंधी आकलन पर असहमति पहले ही जता चुके है। कैग का काम आकलन करना है। मगर समय बता देता है कि वास्तव में वह आकलन सही था या नहीं। अगर देश का विकास बढ़ता है। तो बिजली उत्पादन भी बढ़ेगा। कोल उत्पादन बढ़ता है, तो देश विकसित होगा। मगर जो बाधाएं बताई गई हैं, वे भी असल समस्याए हैं। कमियों को अब दूर करने की कोशिश की गई है।


- उत्तर प्रदेश सरीखे नॉन कोल बियरिंग राज्य ने अपने बिजली संकट से निपटने के लिए डेडीकेटेड लिंकेज का प्रस्ताव भेजा है। इस पर आपका क्या रुख है?
हमारे पास जितना कोयला उपलब्ध है, हमने अब तक दिया है। उत्तर प्रदेश से गुजारिश आई है। कुछ पावर स्टेशन की अर्जी है। कोयले की उपलब्धता देखकर हम प्रस्ताव बनाएंगे। हम राज्य में पावर स्टेशन बनाने के लिए सकारात्मक हैं। उत्तर प्रदेश के साथ बिहार के अनुरोध को भी हमने प्राथमिकता में रखा है।

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