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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   From tariffs to Operation Sindoor: Words that resonate in 2025- Former Union Minister P Chidambaram

टैरिफ से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक: वे शब्द, जो वर्ष 2025 में गूंजते रहे, 'नफरत' भी देता रहा सुनाई

Sun, 04 Jan 2026 06:26 AM IST
पवन पांडेय पी. चिदंबरम, पूर्व केंद्रीय मंत्री
पी. चिदंबरम, पूर्व केंद्रीय मंत्री Published by: पवन पांडेय Updated Sun, 04 Jan 2026 06:26 AM IST
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सार
पिछले साल 2025 में कई ऐसे शब्द रहे, जिन्होंने देशों में हलचल पैदा की। टैरिफ शब्द ने कई देशों की अर्थव्यवस्था को हिला दिया। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘जीएसटी’ जैसे शब्द बार-बार प्रयोग हुए। नफरत शब्द भी बार-बार सुनने में आया।
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From tariffs to Operation Sindoor: Words that resonate in 2025- Former Union Minister P Chidambaram
ऑपरेशन सिंदूर - फोटो : रक्षा मंत्रालय

विस्तार

वह कौन सा शब्द है, जो साल 2025 में आपकी याददाश्त में सबसे अधिक रहा? वह कौन सा शब्द है, जिसने आपकी स्मृति को पकड़े रखा? वह कौन सा शब्द है, जिसने देश के सबसे ज्यादा लोगों को प्रभावित किया?


इस क्रम में सबसे पहला दावेदार है- सिंदूर
राष्ट्रीय जांच एजेंसी के अनुसार, पहलगाम में आतंकी हमला तीन पाकिस्तानी घुसपैठियों ने दो भारतीयों के सहयोग से किया था। भारतीयों ने उन्हें पनाह दी थी। जवाबी कार्रवाई में भारत सरकार ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ लॉन्च किया, जो कि एक चयनित युद्ध था। युद्ध में भारतीय वायु सेना ने मिसाइलों और ड्रोन हमलों से पाकिस्तान की सेना के ढांचे को बर्बाद कर दिया था। बदले में भारत को भी कुछ नुकसान हुआ, जो कि किसी भी युद्ध जैसी कार्रवाई में अमूमन होता है। तीनों पाकिस्तानी आतंकवादी मुठभेड़ में मारे गए। जांच के दौरान गिरफ्तार किए गए दो भारतीयों के बारे में अभी तक कुछ भी जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई है। अभियान के परिणामों को लेकर पारदर्शिता का अभाव अब भी एक सवाल है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चार दिनों तक चला। इस शब्द की अवधि इतनी कम रही कि यह लोगों के मस्तिष्क में स्थायी छाप नहीं छोड़ सका।


दूसरा शब्द है- टैरिफ
दो अप्रैल, 2025 से यह शब्द बातचीत का अंग बन गया। इसका एकमात्र विरोधी था ट्रंप। ट्रंप और टैरिफ की जुगलबंदी ने कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को हिलाकर रख दिया और यह सिलसिला अभी रुका नहीं है। उदाहरण के लिए, भारत पर लगाए गए पारस्परिक शुल्क और रूसी तेल खरीदने पर लगाई पेनल्टी अब भी लागू है। इसका असर यह है कि अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात- स्टील, एल्युमिनियम, तांबा, वस्त्र, रत्न-आभूषण, समुद्री उत्पाद और रसायन प्रभावित हुआ है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल द्वारा अमेरिका से व्यापारिक समझौते के संदर्भ में यह कहा जाना कि यह निकट भविष्य में होगा, अभी दूर की कौड़ी है।

तीसरा मजबूत दावेदार शब्द है- जीएसटी
आठ साल लागू करने के बाद आखिरकार केंद्र सरकार ने समझदारी भरी सलाहों पर ध्यान दिया और कर ढांचे को सरल बनाया तथा कई वस्तुओं और सेवाओं पर कर दरें घटाईं। लेकिन प्रशासनिक उत्पीड़न अभी बना हुआ है। व्यापारियों के संगठन जीएसटी के विरोध में हैं। कर में राहत देने के बावजूद मांग में उतनी वृद्धि नहीं हुई, जितनी की उम्मीद की जा रही थी। समाज के उच्च वर्ग के उपभोग में बढ़ोतरी हुई।

जो शब्द टिक नहीं पाए
अर्थव्यवस्था के लिए एक नया मुहावरा चर्चा में आया- ‘गोल्डी लॉक्स वर्ष’। लेकिन यह शब्द जल्द ही गुम हो गया। पढ़े-लिखे भी इसे समझ नहीं पाए। इस बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत के राष्ट्रीय लेखा आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार से लेकर विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों और शोधकर्ताओं ने अर्थव्यवस्था की कमजोरियों की ओर ध्यान दिलाया। आखिरकार रोजगार की मांग मुखर हुई।
विकास दर के मौजूदा हाल पर नजर डालें तो 2025 में अमेरिका, चीन और भारत ने अपनी जीडीपी में निम्नलिखित अतिरिक्त उत्पादन जोड़ा है-

देश              विकास दर        2025 में जोड़ा गया उत्पादन
चीन           4.8 प्रतिशत         931 अरब डॉलर
अमेरिका     1.8 प्रतिशत         551 अरब डॉलर
भारत          6.6 प्रतिशत         276 अरब डॉलर


ये आंकड़े बताते हैं कि कम विकास दर के बावजूद चीन और अमेरिका की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कई कमजोरियां हैं, जिन्हें सरकार स्वीकार करने से इनकार कर रही है या उन्हें समझ नहीं पा रही। ‘द हिंदू’ समाचार पत्र ने अपने संपादकीय में लिखा, “अमेरिका द्वारा लगाया गया 50 प्रतिशत टैरिफ अब भी लागू है, निजी निवेश सुस्त बना हुआ है, विदेशी पूंजी देश से बाहर जा रही है, रुपये की कमजोरी आयात को महंगा बना रही है। वास्तविक मजदूरी में आवश्यक बढ़ोतरी नहीं हो रही और उपभोक्ता मांग बढ़ नहीं रही है।”

एक शब्द धर्मनिरपेक्ष, जो कभी खूब प्रयोग में आता था, अब लगभग लुप्त हो चुका है। बहुत कम लोग आज गर्व से खुद को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं। यह शब्द संपादकीय लेखों में भी नजर नहीं आता। मूल रूप से ‘सेक्युलर’ का अर्थ था- राज्य और धर्म के बीच स्पष्ट विभाजन। बाद में इसमें यह भाव भी जुड़ गया कि एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के मूल्य तर्क, विवेक और मानवतावाद पर आधारित होते हैं, न कि किसी धार्मिक सिद्धांत पर। अब यह अर्थ धुंधला पड़ गया है। धर्मनिरपेक्षता के हाशिए पर जाने से जिस शब्द का उदय हुआ है, वह है नफरत। विडंबना यह है कि हर धर्म नफरत की निंदा करता है, फिर भी यह भाषणों में पाया जाता है और कभी-कभी लेखन में भी इसे हवा दी जाती है।

नफरत को उकसाने वाले अन्य कारणों में नस्ल, भाषा और जाति हैं। इस खेल के मुख्य जिम्मेदार हैं, राज्यों में ऊंचे पदों पर विराजमान नेता और वे कुछ संगठन, जिन्हें राज्य की खुली छत्रछाया ने और बेखौफ बना दिया है। उनकी जुबान, उनके कदम या उनकी खामोशी, ये सब नफरत के पैरोकारों को लूटमार और तबाही मचाने की खुली छूट दे रहे हैं। इतिहास गवाह है कि घरेलू विवाद और भेदभाव, बंटवारे की वजह बने हैं। उक्त सभी कारणों को देखकर मैं नफरत को 2025 का शब्द चुनता हूं।
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