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नजरिया: 'डबल इंजन सरकार' की विफलता का सबब है मणिपुर की हिंसा
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Manipur Violence (File Photo)
- फोटो :
PTI
विस्तार
बीते पखवाड़े दो खबरें सुर्खियों में थीं : विश्व कप क्रिकेट के मैच और गाजा में इस्राइल की निरंकुश बमबारी। इनमें से पहली या दूसरी खबर के प्रति हमारे आकर्षण का ही नतीजा रहा कि एक दुखद घटनाक्रम से जुड़ी तिथि हमारे अनजाने ही निकल गई : मणिपुर हिंसा के छह महीने बीत गए। मणिुपर में हिंसा शुरू होने के कुछ महीने बाद मैंने द टेलीग्राफ में लिखा था, और एक वेबसाइट को इंटरव्यू देते हुए भी कहा था कि हमें इस हिंसा की गंभीरता समझनी चाहिए। अपने इस कॉलम में मैं मणिपुर संकट पर, शायद व्यर्थ ही, ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करूंगा, जो सातवें महीने में प्रवेश कर चुका है।मणिपुर के प्रति मेरी उत्सुकता शुरुआत में एक इतिहासकार की उत्सुकता थी कि 1949 में स्वतंत्र भारत का हिस्सा बनने के बाद से उसकी अब तक की यात्रा कैसी रही है। मणिपुर के प्रति मेरी रुचि कुछ साल पहले उस राज्य की यात्रा करने पर बढ़ी, जब मैं उसके प्राकृतिक सौंदर्य, संगीत और नृत्य की उसकी समृद्ध परंपरा, वहां की स्त्रियों की स्वतंत्रता और तीन मुख्य नस्लीय समूहों- मैतेई, नगा कुकी और कुकी के एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धी संबंधों के बारे में देख-जानकर दंग रह गया। इतिहासकार और पर्यटक, दोनों ही भूमिकाओं में मैं मणिपुर में व्याप्त तनावों को देख पाया था, लेकिन वहां का मौजूदा संकट न सिर्फ अभूतपूर्व है, बल्कि सोचा भी नहीं गया था कि संकट यह रूप लेगा। पिछले कुछ महीनों से मैतेई और कुकी उग्रवादी एक दूसरे से दुश्मनों की तरह पेश आ रहे हैं। वहां जो हिंसा हुई, उसे ऑनलाइन और भी भीषण रूप दिया गया।
जैसा कि हम जानते हैं, गोदी मीडिया ने मणिपुर हिंसा के ब्योरों को छिपाया और उनकी अनदेखी की। सौभाग्य से कुछ स्वतंत्र वेबसाइटों ने हमें बताया कि वहां वास्तव में हो क्या रहा है। मैंने भी वहां रहने वाले अपने सहयोगियों के संपर्क में रहते हुए उनसे लगातार बातचीत की। मेरा यह विश्लेषण इन्हीं सबूतों के आधार पर है। ऐसा नहीं है कि मई, 2023 से पहले राज्य में मैतेई और कुकी सौहार्दपूर्ण तरीके से रहते थे। उनका धर्म अलग है, ज्यादातर कुकी ईसाई हैं, जबकि अधिसंख्य मैतेई हिंदू हैं। कुकी पहाड़ों में रहते हैं, जबकि मैतेई का इंफाल घाटी में वर्चस्व है। मैतेई राजनेता जिस वर्चस्ववादी रवैये का प्रदर्शन करते थे, वह कुकियों को क्षुब्ध करता था। जबकि मैतेई शिकायत करते थे कि कुकियों को अनुसूचित जनजाति का जो दर्जा मिला हुआ है, उससे उन्हें नौकरी मिलने में आसानी होती है।
नस्लीय और धार्मिक हिंसा हमारे यहां आम है। इसके बावजूद हिंसा के स्तर और ध्रुवीकरण के कारण मणिपुर की हिंसा बेहद गंभीर है। स्वतंत्र विश्लेषकों द्वारा इकट्ठा किए गए सबूत बताते हैं कि इस हिंसा में कुकी को अपेक्षाकृत ज्यादा नुकसान हुआ, क्योंकि मैतेई समुदाय के पास सत्ता की ताकत है, पुलिस और नौकरशाही मैतेई राजनेताओं को ही रिपोर्ट करती है। इस विषमता से जुड़ा एक तथ्य यह है कि राज्य में, एक आंकड़े के मुताबिक, दो सौ से भी गिरजाघरों को ध्वस्त कर दिया गया है।
राज्य की इस बदहाली के लिए तीन लोगों को अपनी जवाबदेही स्वीकारनी ही चाहिए। इनमें से पहले हैं राज्य के मुख्यमंत्री बीरेन सिंह, जो स्पष्ट रूप से मैतेई समुदाय के पक्ष में दिखे। बीरेन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार का वैचारिक पक्षपात इसकी प्रशासनिक अक्षमता से पूरी तरह मेल खाता दिखा है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा शुरू होते ही राज्य सरकार ने उग्रवादियों को बड़ी मात्रा में हथियार लूटने की अनुमति ही नहीं दी, बल्कि प्रोत्साहित भी किया। हिंसा के छह महीने से अधिक हो चुके हैं, लेकिन लूटे गए हथियारों का मामूली हिस्से की ही बरामदगी हुई है।
मणिपुर की इस त्रासदी के लिए जो दूसरे व्यक्ति जिम्मेदार हैं, वह हैं केंद्रीय गृह मंत्री, जिन्होंने राज्य के एक छोटे-से दौरे के अलावा हिंसा रोकने के लिए शायद ही कोई प्रभावी कदम उठाया। इसके बजाय उन्होंने उन राज्यों में मतदाताओं को ध्रवीकृत करने के लिए अपनी ऊर्जा खर्च की, जहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। तीसरे व्यक्ति हैं खुद प्रधानमंत्री, जिन्होंने राज्य का दौरा ही नहीं किया, इसके बजाय उन्होंने मुख्यमंत्री और अपने गृह मंत्री को अपनी मनमर्जी का करने दिया। चाहे यह संवेदनहीनता हो या फिर दंभ, लेकिन मणिपुर के लोगों के प्रति कोई रुचि न दिखाना देश के प्रधानमंत्री के लिए शोभनीय नहीं है। नरेंद्र मोदी अगर मणिपुर का दौरा करते और पहाड़ तथा घाटी, दोनों जगह जाते, तो इससे यह संदेश जाता कि उन्हें मणिपुर की फिक्र है। इससे संभवत: दोनों हिंसक समुदायों के नेताओं के बीच बातचीत और मेलजोल की शुरुआत भी हो सकती थी।
मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के पक्षपाती आचरण का कारण शायद यह है कि मैतेई समुदाय के वर्चस्ववाद का संदेश देकर वह राज्य की सत्ता में बने रह सकते हैं। लेकिन अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने मणिपुर और वहां के लोगों के प्रति उपेक्षा का परिचय क्यों दिया? क्या इसलिए कि बीरेन सिंह को बर्खास्त करने से, जो उनका पहला फैसला होना चाहिए था, उनकी कमजोरी प्रमाणित होती? क्या इसलिए कि कुकियों को निशाना बनाने से लोकसभा चुनाव में उन्हें बड़ी संख्या में हिंदुओं के वोट मिलेंगे? या हिंसा न रोक पाना उनकी अयोग्यता का सबूत है? अपने नायक सरदार वल्लभभाई पटेल के स्वभाव के विपरीत, मोदी और शाह प्रोपोगैंडा फैलाने और अपनी छवि चमकाने में माहिर हैं, इन दोनों में ही पटेल की तरह ज्ञान के साथ शासन करने या समझ-बूझ व लोगों की परवाह करते हुए प्रशासन चलाने की योग्यता का अभाव है।
पिछले कुछ महीनों में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने मणिपुर पर चुप्पी साध रखी है, जबकि राजस्थान, तेलंगाना और दूसरी जगहों में चुनाव प्रचार करते हुए वे कई मुद्दों पर बोल रहे हैं। दिलचस्प यह है कि आरएसएस के सरसंघचालक ने विजयदशमी के अपने संबोधन में कहा, 'लंबे समय से साथ रह रहे मैतेई और कुकी आपस में क्यों लड़ रहे हैं?...इससे किसको लाभ मिलता है? क्या इसमें बाहरी हाथ है? देश में मजबूत सरकार है। गृह मंत्री ने राज्य का दौरा किया है। इसके बावजूद जब शांति रहती है, तब कुछ त्रासदियां घटित होती हैं।' मोहन भागवत के भाषण के पहले और बाद में भी सोशल मीडिया पर हिंदुत्ववादियों ने मणिपुर हिंसा के लिए बाहरी तत्वों को जिम्मेदार ठहराया है। मणिपुर हिंसा का इतने लंबे समय तक जारी रहना और अब भी इसका हल न निकल पाना ‘डबल इंजन सरकार’ की विफलता है।