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गंगा से येरूशलम तक
तरुण विजय
Updated Thu, 18 Jan 2018 08:20 AM IST
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तरुण विजय
कुछ संबंध राजनीतिक लाभालाभ, व्यापार, उद्योग और आयात-निर्यात से परे होते हैं। इस्राइल के साथ भारत के संबंध इसी वर्ग में आते हैं। तमाम इस्लामी विश्व के विरोध तथा अरब आक्रमकता के बावजूद इस्राइल 1948 में स्वतंत्र हुआ। भारत दुनिया के उन प्रथम देशों में था, जिसने इस्राइल को 1950 में मान्यता दी, लेकिन 1992 तक राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए। कारण था- मुस्लिम देशों की नाराजगी का भय। लेकिन इस्राइल ने लगातार भारत की सामरिक सहायता की।
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क्या ऐसा संबंध किसी और देश के साथ हो सकता है, जो उस देश की सदा बिना शर्त मदद करता हो, जिस देश के पासपोर्ट इस मुहर के साथ जारी होते हों- 'यह पासपोर्ट सिवाय इस्राइल जाने के अन्य सभी देशों के लिए वैध है।'
इस्त्राइल से भारत के इन असामान्य, अभूतपूर्व रिश्तों की वजह दो हजार वर्षों पुराना साझा इतिहास तथा हिंदू और यहूदी स्मृतियों में लगातार भेदभाव और धर्म एवं जाति के आधार पर झेले गए अत्याचारों, आक्रमणों का अनुभव है। दुनिया के छियासी देशों में यहूदियों के साथ नस्ली भेदभाव हुआ, उन्हें निकाला गया, दूसरे धर्मों का नागरिक बनाकर अपमानित किया गया। भारत अकेला ऐसा देश था, जहां के हिंदुओं ने दो हजार वर्ष पहले से यहूदियों को अपनेपन, सम्मान व समानता के साथ शरण दी। यही आत्मीयता इस्राइल और भारत के बीच असाधारण मैत्री का आधार है। बाकी विषय-कूटनीतिक, रक्षा, कृषि आदि उस मजबूत आधार पर टिके सहयोग के शिखर हैं।
यह श्रेय नरेंद्र मोदी की साहसिक विदेश नीति को जाता है कि उन्होंने मुस्लिम देशों के भय को खारिज करते हुए पिछले साल जुलाई में इस्राइल की ऐतिहासिक यात्रा की। वह स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री हुए, जो इस्राइल की यात्रा पर गए। दोनों देशों के रिश्ते पहली बार स्वतंत्र, निर्भीक, निर्द्वंद्व और गर्मजोशी से भरे प्रकट हुए। इस्राइल से संबंध न तो भारतीय मुस्लिमों के खिलाफ है, न किसी अन्य देश के। फलस्तीन के साथ ही नहीं, खाड़ी तथा अन्य अरब देशों के साथ भारत के परंपरागत संबंध एवं विदेश नीति में निरंतरता जारी है। पर भारत में ऐसे बौद्धिक खंडहरों की कमी नहीं, जो यह देखना नहीं चाहते। यद्यपि फलस्तीन स्वयं अरब देशों से अलग-थलग हो रहा है, लेकिन भारत में अरब से भी ज्यादा अरब तत्व मिल जाएंगे, जो देश हित की चिंता किए बगैर इस्राइल का विरोध कर रहे हैं।
चीन से पाकिस्तान सीमा तक आज इस्राइल के बने रडार हैं, जैसे तेल, ऊर्जा, औद्योगिक शोध तथा विकास, पर्यटन, कृषि के क्षेत्र में बंजर व कम पानी वाले क्षेत्रों को हरियाला बनाने की तकनीक, खारे जल को पेयजल में बदलने और वर्तमान के पांच अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार को दस अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य-ये सब आज के बदले मौसम के कुछ प्रारंभिक परिचय मात्र हैं। यह भारत-इस्राइल संबंधों का वसंत है।
मोदी की इस्राइल और नेतन्याहू की भारत यात्रा हमारी विदेश नीति का एक अद्भुत, असाधारण आत्मविश्वास पर्व है, जो अपनी शक्ति और युक्ति में पूरा भरोसा रखे बिना संभव नहीं था। एक जीवंत, साहसी और कुशाग्र बुद्धि का पराक्रमी उदाहरण इस्त्राइल यदि भारत का अभिन्न और परम विश्वसनीय मित्र है, तो निश्चय ही यह देखकर भारत के शत्रुओं की नींद उड़ेगी।