फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   friend or foe of tribes

आदिवासियों की हितैषी या दुश्मन

Sun, 18 Jan 2015 08:20 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 18 Jan 2015 08:20 PM IST
विज्ञापन
friend or foe of tribes

आज पर्यावरण के तथाकथित रखवालों से सवाल करना उनका अपमान माना जाता है। सो जब मैंने पिछले हफ्ते पर्यावरण बचाने वालों की नई नायिका, प्रिया पिल्लई, से टीवी पर पूछा कि वह लंदन जाकर ब्रिटिश सांसदों को मध्य प्रदेश के वनवासियों के बारे में क्यों बताना चाहती हैं, तो उनकी संस्था ग्रीनपीस के समर्थकों ने ट्विटर पर मुझे खूब गालियां दीं। अगर हम और आप सवाल नहीं करेंगे इन विदेशी संस्थाओं को लेकर, तो प्रधानमंत्री का विकसित, संपन्न भारत बनाने का सपना कभी साकार नहीं होगा।

विज्ञापन


क्या आपने ध्यान दिया है कि ग्रीनपीस जैसी यूरोपीय संस्थाएं भारत में हर किस्म की ऊर्जा का विरोध करती हैं? नदियों पर बांध बनाने की हर योजना का विरोध हुआ है; परमाणु ऊर्जा की हर योजना का विरोध किया गया है, और भारत ने अगर धरती में से कोयला निकालने की कोई कोशिश की, तो अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है। लेकिन फ्रांस अपनी कमोबेश सारी ऊर्जा परमाणु बिजली घरों से पैदा करता है, जर्मनी लगभग कोयला जलाकर पूरी बिजली पैदा करता है। नॉर्वे, स्विट्जरलैंड नदियों से ऊर्जा हासिल करते हैं। वहां वैसा विरोध क्यों नहीं दिखता?
विज्ञापन


प्रिया पिल्लई और उसके साथी महीनों से इस आधार पर मध्य प्रदेश स्थित महान ऊर्जा योजना का विरोध कर रहे हैं कि कोयला अगर निकाला जाएगा, तो जंगल तबाह हो जाएंगे और वनवासियों का जीवन बर्बाद हो जाएगा। कैसा है इन लोगों का जीवन, ग्रीनपीस जैसी संस्थाएं जिन्हें सुरक्षित रखना चाहती हैं? इतने गरीब हैं ये वनवासी कि कच्ची बस्तियों में रहते हैं। अक्सर ये निर्भर होते हैं एक वार्षिक फसल पर, और जब किसी वर्ष बरसात धोखा दे जाती है, तो भूखे मरते हैं इनके बच्चे-बूढ़े। एक वक्त की पूरी रोटी मिल जाए, तो गनीमत माना जाता है। मैंने ऐसे आदिवासी बच्चे देखे हैं, जिन्होंने कभी हरी सब्जी या दूध नहीं देखा।
विज्ञापन
विज्ञापन


क्या उनको वैसे ही रहना चाहिए या उन्हें भी विकास और परिवर्तन का सपना दिखाया जाना चाहिए? पर्यावरण को बचाने के नाम पर ग्रीनपीस जैसे संस्थान गरीब, अशिक्षित लोगों का फायदा उठाकर खूब पैसा अपने तथाकथित नेक कार्यों के लिए जमा करते हैं। आंकड़े के मुताबिक, तीन वर्षों में 22,000 गैरसरकारी भारतीय संस्थाओं को विदेशों से 3.2 अरब डॉलर हासिल हुए। आंकड़े ये भी बताते हैं कि एनजीओ क्षेत्र को भारतीय सरकारी महकमों से 6,654 करोड़ मिले। इन संस्थाओं में सिर्फ 10 फीसदी ऐसी हैं, जो वार्षिक हिसाब देती हैं। इनके कामकाज पर अगर कोई सवाल खड़ा करता है, तो वह फौरन खलनायक बन जाता है।

प्रिया पिल्लई नायिका बनीं, क्योंकि उन्हें इसलिए लंदन जाने से रोका गया कि उनके खिलाफ मुकदमा चल रहा है। उन्हें रोका नहीं जाना चाहिए था। पर उन्हें ब्रिटेन के सांसदों से मिलकर भारत सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलने का कोई अधिकार नहीं है।


ग्रीनपीस जैसी संस्थाओं का विरोध कभी रचनात्मक नहीं होता। रचनात्मक होता, तो वे भारत की नदियों में प्रदूषण कम करने का प्रयास करतीं, शहरों की गंदी बस्तियों में सफाई लाने का काम करतीं। इसके बदले इनके सारे अभियान ऐसी योजनाओं के विरोध में किए जाते हैं, जिनसे इस देश के अति गरीब लोगों के जीवन में सुधार आ सके। आदिवासी क्या नहीं चाहते कि उनके घरों में भी बिजली की सुविधा आए? जिन लोगों ने उनके जीवन का ठेका ले रखा है, वही साबित हो रहे हैं उनके सबसे बड़े दुश्मन।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed