सूरत-ए-हाल: पाकिस्तान के लिए आपदा साबित हुए इमरान, जंग के मैदान में तब्दील हुआ लाहौर
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विस्तार
अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स में मैंने एक लेख का शीर्षक देखा, जिसमें लिखा था-हमें अमेरिका-मैक्सिको सीमा पर संकट का हल ढूंढ़ने की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए, और अचानक मैंने सोचा, क्या होगा अगर यहां अमेरिका और मैक्सिको की जगह भारत और पाकिस्तान को रख दिया जाए। क्या हमें भी दोनों देशों के बीच इस 'युद्ध नहीं' वाले परिदृश्य को नया नियम मानकर स्वीकार कर लेना चाहिए और उस संकट को हल करने की दिशा में काम नहीं करना चाहिए, जिसका हम दशकों से सामना कर रहे हैं? खैर, इस विषय पर फिर कभी लिखूंगी, लेकिन पाकिस्तान में हर कोई (आम जनता, जो भारत-पाकिस्तान रिश्तों पर नजर रखती है और सरकार में शामिल लोग भी) इस बात से हैरान है कि क्यों मोदी सरकार इस साल की अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक खबर की अनदेखी कर रही है, जो सऊदी अरब और ईरान के बीच राजनयिक संबंधों को फिर से शुरू करने के लिए हालिया समझौतों से संबंधित है।
यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत के सऊदी अरब और ईरान, दोनों के साथ बहुत अच्छे द्विपक्षीय रिश्ते हैं। मैंने इस विषय पर भारतीय मीडिया में प्रकाशित कुछ संपादकीय देखे, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से नई दिल्ली द्वारा स्वागत या निंदा से संबंधित कोई टिप्पणी नहीं थी। पाकिस्तान ने चीन की मध्यस्थता में हुए इस समझौते का स्वागत किया है, क्योंकि सऊदी अरब और ईरान के बीच जारी तनाव पाकिस्तान की धरती पर शिया और सुन्नी के बीच संघर्ष में दिखा, जहां ये दोनों देश अलग-अलग गुटों का समर्थन कर एक तीसरे देश की धरती पर लड़े। शिया समुदाय को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उन पर चरमपंथियों और यहां तक कि जिहादियों, विशेष रूप से बलूचिस्तान में हजराजात समुदाय द्वारा हमला किया जाता है, जहां सामूहिक हत्याएं हुई हैं।
सऊदी अरब और ईरान के बीच शांति और बेहतर द्विपक्षीय संबंधों का असर तुरंत पाकिस्तान पर दिखेगा, जहां उम्मीद की जाती है कि पाकिस्तानी समूहों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ हमले बंद हो जाएंगे। लेकिन अमर उजाला के पाठकों को पिछले दो दिनों से पाकिस्तान में हो रहे घटनाक्रम में ज्यादा दिलचस्पी होगी, जहां पड़ोसी मुल्क की प्रांतीय राजधानी लाहौर के पॉश और सुरुचिपूर्ण इलाके में युद्ध जैसा माहौल दिखता है, जहां से कुछ बहुत ही बदसूरत दृश्य सामने आ रहे हैं। इस बीच, बाकी लाहौर हमेशा की तरह शांत और सामान्य है, यहां तक कि पाकिस्तान सुपर लीग क्रिकेट मैच भी लाहौर के किसी अन्य हिस्से में बड़ी भीड़ खींच रहा है।
लाहौर के जमान पार्क इलाके में तहरीक-ए इंसाफ पार्टी के नेता इमरान खान का घर है, जो कई दशक पहले उन्हें अपने भाई-बहनों के साथ पिता से विरासत में मिला था। यह उच्च मध्यवर्गीय पंजाबी परिवार का बहुत ही सामान्य घर था। लेकिन जब इमरान खान मुल्क के प्रधानमंत्री बने, तो उनकी तीसरी बीवी बेगम बुशरा ने घर के भीतरी और बाहरी हिस्से में इतनी मरम्मत कराई कि कोई सोच भी नहीं सकता कि यह वही पुराना मामूली बंगला है। अब इसका डिजाइन ज्यादा आलीशान है और भीतरी कमरे शाही महल जैसे दिखते हैं। निस्संदेह उन पर बड़ी रकम खर्च की गई है। इन दिनों यह इलाका इसलिए युद्ध क्षेत्र बना हुआ है, क्योंकि इमरान खान ने कानून के आगे झुकने से इनकार कर दिया है। उन्हें पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट, इस्लामाबाद हाईकोर्ट और लाहौर हाईकोर्ट द्वारा तलब किया गया है, लेकिन वह बहाना बनाते हैं और अदालत की कार्यवाही में शामिल नहीं होते हैं।
आखिरकार अदालतों को इस्लामाबाद पुलिस को गिरफ्तारी वारंट के साथ भेजना पड़ा, लेकिन इमरान खान इसके लिए पूरी तरह से तैयार थे। उन्होंने और पीटीआई के अन्य नेताओं ने सोशल मीडिया पर लोगों का आह्वान किया और देखते ही देखते डंडों, लाठियों, गुलेल और पत्थरों से लैस हजारों समर्थक पुलिस को इमरान खान को गिरफ्तार करने से रोकने के लिए उनके घर के बाहर इकट्ठा हो गए। मैंने जिस तरह से इन समर्थकों को पुलिस और रेंजरों के साथ संघर्ष करते हुए देखा, यह साफ था कि ये सामान्य समर्थक नहीं थे, बल्कि वे लोग थे, जो गुरिल्ला युद्ध में अच्छी तरह से प्रशिक्षित थे। वे नकाबपोश थे और उन्होंने पुलिस के ऊपर आंसू गैस के गोले छोड़े। उनके पास पेट्रोल बम थे और उन्होंने सरकारी एवं निजी वाहनों को नष्ट कर दिया। यहां तक कि जिन वाहनों में पुलिस और रेंजर्स बैठे थे, उन्होंने उस पर भी पेट्रोल बम फेंके, जिसके चलते उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए भागना पड़ा। गनीमत रही कि भीड़ को तितर-बितर करने के लिए किसी तरह की हवाई फायरिंग नहीं हुई।
वास्तव में राज्य पुलिस तंत्र की पूरी ताकत का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा था। अब पता चला है कि गिलगिट-बाल्टिस्तान की पुलिस इमरान खान के समर्थकों के साथ मिलकर सरकार के खिलाफ लड़ने के लिए अवैध रूप से लाहौर आई थी। गिलगिट-बाल्टिस्तान पुलिस प्रमुख का तबादला कर दिया गया है और अब जांच से ही पता चलेगा कि ऐसा खतरनाक कदम उठाया गया या नहीं तथा उठाया गया, तो क्यों।
मगर जो सबसे जरूरी सवाल है, वह कोई नहीं पूछ रहा कि आखिर किन वजहों से इमरान खान अपने समर्थकों को मानव ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि वह खुद छिपे हुए हैं और अन्य नेताओं की तरह अदालतों का सामना नहीं कर रहे हैं। इसका जवाब पूर्व सेना प्रमुख जनरल बाजवा के उस विफल प्रयोग में निहित है, जिसके तहत उन्होंने पिछले आम चुनाव में धांधली करके और इमरान खान को केंद्र में लाकर उनकी गठबंधन सरकार बनवाई थी।
इमरान खान पाकिस्तान के लिए आपदा साबित हुए, क्योंकि उन्होंने दुनिया के महत्वपूर्ण देशों के साथ तनाव बढ़ाया और पाकिस्तान का शासन करने में असमर्थ रहे। उन्होंने ऋण की शर्तें स्वीकार करने के बाद अपने वादे से मुकर कर आईएमएफ के साथ भी संबंध खराब कर लिए। यही वजह है कि आईएमएफ और नई सरकार के बीच भरोसे की कमी है। सवाल है कि क्या सेना अपनी गलतियों से कुछ सीखेगी और जैसा कि वादा किया था, राजनीति से दूर रहेगी। जैसा कि राजनीतिक विश्लेषक अब्बास नासिर कहते हैं, 'यदि हर कोई यह स्वीकार कर लेता है कि हम अराजकता की ओर बढ़ रहे हैं और यथास्थिति कायम नहीं रह सकती है, तो हमें उन सभी बाधाओं को स्वीकार करना चाहिए, जो हमें प्रभावित करती हैं। यदि सेना को यह याद दिलाया जाता है कि वह हममें से बाकी लोगों से अलग नहीं है, तो वह इस रवैये को छोड़कर अपने भीतर की सड़ांध को खत्म कर सकती है।'