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बिना अर्थशास्त्रियों के चल रही है भारत की अर्थव्यवस्था

Sun, 08 Dec 2019 01:57 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 08 Dec 2019 01:57 AM IST
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Former Finance Minister P Chidambarm on current situation on Indian Economy
भारतीय अर्थव्यवस्था

हर कोई अर्थशास्त्री है, घर का बजट बनाने वाली गृहिणी से लेकर दूध के लिए गायों पर निर्भर डेयरी मालिक और छोटे उद्यमियों तक जो छोटे-छोटे सामान बनाकर अपार्टमेंट के कारोबार से जुड़ी बड़ी कंपनियों को बेचते हैं। उन्हें क्षेत्र-विशेष से संबंधित कानूनों और अनुबंधों तथा करों संबंधी सामान्य कानूनों, कारोबार की रीतियों और अपने समकक्ष/उपभोक्ता के साथ रिश्ते में सन्निहित खेल के नियमों का पालन करना चाहिए। इनके बारे में सबको बता है; वास्तव में ये सर्वज्ञात हैं। ऐसी सर्वज्ञात चीज, जिसके बारे में सबको अच्छी तरह से पता है, वह है धन। हमारी कहानी का नायक खासतौर से इन्हीं सर्वज्ञातों के आधार पर उचित निर्णय लेगा।


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हर कोई अर्थशास्त्री है, घर का बजट बनाने वाली गृहिणी से लेकर दूध के लिए गायों पर निर्भर डेयरी मालिक और छोटे उद्यमियों तक जो छोटे-छोटे सामान बनाकर अपार्टमेंट के कारोबार से जुड़ी बड़ी कंपनियों को बेचते हैं। उन्हें क्षेत्र-विशेष से संबंधित कानूनों और अनुबंधों तथा करों संबंधी सामान्य कानूनों, कारोबार की रीतियों और अपने समकक्ष/उपभोक्ता के साथ रिश्ते में सन्निहित खेल के नियमों का पालन करना चाहिए। इनके बारे में सबको बता है; वास्तव में ये सर्वज्ञात हैं। ऐसी सर्वज्ञात चीज, जिसके बारे में सबको अच्छी तरह से पता है, वह है धन। हमारी कहानी का नायक खासतौर से इन्हीं सर्वज्ञातों के आधार पर उचित निर्णय लेगा।

नायक अज्ञात चीजों के कारण गलत भी साबित हो सकता है, ये अज्ञात, ज्ञात-अज्ञात (ऐसी चीजें जो हैं, मगर अज्ञात हैं) और अज्ञात (ऐसी चीजें जो अज्ञात हैं और जिनके बारे में कुछ भी पता नहीं) दोनों हो सकते हैं। समय के कुछ अंतराल के बाद नायक अज्ञातों को लेकर माहिर भी हो सकता है।

नायक किसी राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में भी निर्वाचित हो सकता है और राज्य में प्रभावशाली शासन का प्रदर्शन भी कर सकता है। जब तक नायक सबसे अच्छी तरह से जाने-पहचाने अज्ञात यानी धन को प्रबंधित करता है, तो बाकी के सारे ज्ञात और अज्ञात खुद ही प्रबंधित हो जाते हैं। नायक को जब ज्ञातों और अज्ञातों से परे जाना पड़ता है, तभी उसके लिए मुश्किल पेश आती है। इस मुश्किल को बाजार कहते हैं। और जब बाजार का अर्थ ऐसे लाखों लोग हों जो एक दूसरे असंबद्ध हैं और भय तथा अनिश्चितता में कदम उठा रहे हैं और विभिन्न उद्देश्यों से प्रेरित हैं, तो बाजार सिर्फ मुश्किल ही नहीं, बहुत बड़ी मुश्किल बन जाता है। 

सावधानी से बनाई गई योजना भी गलत साबित हो सकती है। आकार और पैमाना भी मायने रखता है। किसी परीक्षा में संतुलित बजट तैयार करते समय वैसी चुनौतियां पेश नहीं आतीं, जैसा कि वास्तव में सरकार का बजट तैयार करने में आती हैं। एक राज्य को चलाने में वैसी चुनौतियां पेश नहीं आतीं, जैसा कि देश की सरकार चलाने में आती हैं

'ध्वस्त होने के करीब है भारत की अर्थव्यवस्था'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 वर्ष तक गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उनकी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पास जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र की एमए की डिग्री है। वह आपस में सोचते हैं, और उन्हें क्यों नहीं सोचना चाहिए? कि वे सक्षम अर्थशास्त्री हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था को संभालने में समर्थ हैं।

काश वे समझ पाते कि उनकी वजह से यह अवांछित स्थिति बनी है, जिसमें भारतीय अर्थव्यवस्था धीमी गति से नीचे जा रही है और ध्वस्त होने के करीब है। पिछली छह तिमाहियों के आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध हैं, जिनके मुताबिक भारत की जीडीपी की विकास दर क्रमशः 8.0, 7.0, 6.6, 5.8, 5.0 और 4.5 फीसदी रही। हर तरफ से हम सुन रहे हैं कि प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री दुखी हैं, लेकिन उन्होंने अब तक ऐसा जाहिर नहीं किया है। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के बीच श्रम का स्पष्ट विभाजन हैः फैसले प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा लिए जाते हैं और उन पर अमल वित्त मंत्री द्वारा किया जाता है। दोनों के बीच परस्पर संदेह है और इन दोनों कार्यालयों के अधिकारी एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं।

अब कहानी के दो मुख्य पात्र बेचारे प्याज की कीमत को नियंत्रित करने के लिए संघर्षरत हैं जो कि गरीबों और मध्य वर्ग के भोजन का हिस्सा है। इसके अलावा एनएसएसओ के मुताबिक घरेलू खपत में गिरावट दर्ज की गई है। ग्रामीण पारिश्रमिक में गिरावट आई है। खासतौर से किसानों के लिए उत्पादकों के दाम गिरे हैं। दैनिक रोजगार करने वालों को महीने में 15 दिन से अधिक का काम नहीं मिल रहा है। मनरेगा की मांग बढ़ी है। ड्यूरेबल और नॉन ड्यूरेबल सामान की बिक्री घटी है। थोक मूल्य आधारित महंगाई 1.92 फीसदी और उपभोक्ता मूल्य आधारित महंगाई 4.62 फीसदी बढ़ गई है। तापीय संयंत्रों में संयंत्र भार कारक 49 फीसदी उत्पादन है, इसका मतलब है कि बिजली की मांग में कमी के कारण तापीय क्षमता का आधा हिस्सा बंद है। 

'दिखावे और झांसे का सहारा ले रहे हैं मंत्री'

सरकार सोचती है कि वह आसन्न आपदा को दूर कर सकती है। सरकार की खामी अतीत के अपने फैसलों का अड़ियल तरीके से बचाव करने में निहित है। ये फैसले हैं नोटबंदी, त्रुटिपूर्ण जीएसटी, टैक्स टेररिज्म, जानलेवा नियंत्रण, संरक्षणवाद और निर्णय लेने की क्षमता का पीएमओ में केंद्रीकरण। आठ नवंबर, 2016 को नोटबंदी के रूप में मानवनिर्मित आपदा से सामना हुआ। चेतावनियों के बावजूद सरकार ने इस पर विचार नहीं किया। द इकोनॉमिस्ट ने इस सरकार को अर्थव्यवस्था के 'अक्षम प्रबंधक' की उपमा दी है। कोई और विकल्प नहीं होने के कारण मंत्री दिखावे और झांसे का सहारा ले रहे हैं।

सरकार ने माना है कि अर्थव्यवस्था सुस्त है, लेकिन उसने ढांचागत मुद्दों से इनकार किया है, जिनका निराकरण करने की जरूरत है। सरकार ने समस्या को 'चक्रीय' बताया है। उनकी मेहरबानी कि उन्होंने इसे 'मौसमी' नहीं बताया!

भारत की अर्थव्यवस्था बिना किसी सक्षम अर्थशास्त्री की सलाह और मदद के चल रही है। आखिरी अर्थशास्त्री थे डॉ. अरविंद सुब्रमण्यम। जरा प्रोफेसर के बिना किसी शोध कार्यक्रम की पढ़ाई या फिर डॉक्टर के बिना किसी जटिल सर्जरी की कल्पना कीजिए! यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी अर्थव्यवस्था को प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के बजाय अक्षम प्रबंधकों के जरिये चलाया जाए।
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