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स्मृति शेष: बीच संगत से उठकर गए तुम जाकिर... संगीत को नई ऊंचाई, पहचान और प्रसिद्धि दिलाई, प्रयोग से पीछे नहीं
Tue, 17 Dec 2024 05:24 AM IST
ज्योति भास्कर
पं. हरिप्रसाद चौरसिया, प्रख्यात बांसुरी वादक
पं. हरिप्रसाद चौरसिया, प्रख्यात बांसुरी वादक
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Tue, 17 Dec 2024 05:24 AM IST
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अपने पिता के साथ उस्ताद जाकिर हुसैन (फाइल)
- फोटो :
अमर उजाला / एजेंसी
विस्तार
उस्ताद जाकिर हुसैन केवल मेरे तबला वादक या संगतकार नहीं थे, मेरे साथी कलाकार ही थे, बल्कि इन सबसे अधिक वह मेरे परिवार के सदस्य की तरह थे। उनका हमारा बहुत लंबा साथ रहा, संगीत में भी और जीवन में भी। यह साथ तबसे था, जब वह बहुत छोटे थे।
वह बचपन से ही अपने पिता उस्ताद अल्ला रक्खा खान साहब के साथ मेरे पास आया करते थे। उनके पिता और मैं तब फिल्मों के संगीत के लिए काम किया करते थे। जाकिर अपने पिता के साथ आ जाया करते थे और वहीं रहते थे। उस दौरान जाकिर को देखकर किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह बालक एक दिन इतना बड़ा तबला वादक, इतना बड़ा कलाकार बन जाएगा और पूरी दुनिया में उसका इस प्रकार खूब नाम रोशन होगा। उनके पिता मेरे साथ कार्यक्रमों में भी बजाया करते थे। बाद में जाकिर हुसैन भी मेरे साथ बजाने लगे और खूब बजाने लगे।
मेरे साथ संगत में बहुत सारे कलाकार रहे हैं, लेकिन मेरे साथ जाकिर हुसैन की संगत को लोगों ने काफी पसंद किया और यह सिलसिला चल पड़ा। गांव में, शहर में, दिल्ली में, कोलकाता में, अमेरिका में, लंदन में हर जगह दुनिया भर में हमारे कार्यक्रम होने लगे और खूब हुए। ऐसा बहुत बार हुआ कि हम साथ-साथ रहे, कभी वह कार चला रहे होते, कभी मैं चला रहा होता, साथ ही खाते और साथ ही बजाते। मंच से उतरे, कार में बैठे और दूसरे शहर के लिए निकल पड़े। यह वह दौर था, जब हमारे साथ में खूब कार्यक्रम हो रहे थे। हम कार से एक जगह से दूसरी जगह जाना पसंद करते थे। इससे साथ भी रहता था और हवाई जहाज का खर्च भी बच जाया करता था। कई बार ऐसा भी हुआ कि हम साथ भी रहे, एक ही होटल, एक ही कमरे में।
कुछ कलाकारों से ऐसा ही रिश्ता हो जाता है, इतने अपनेपन का, परिवार की तरह। उनके साथ ऐसा ही हुआ। मुझे याद आ रहा है कि उस्ताद अल्ला रक्खा जी के घर में जो पहली शादी हुई, उनकी बेटी खुर्शीद की, तो मैं, सितारा देवी, पंडित राम नारायण जी और पंडित शिवकुमार जी ने मिलकर खूब नृत्य किया था। खुर्शीद लंदन में हैं। मंच पर हमने खूब नृत्य किया, इस तरह जैसे यह हमारे परिवार में शादी हो। सोचिए क्या दृश्य रहा होगा, कोई सोच भी नहीं सकता, कल्पना से परे लगता है कि ये कलाकार मंच पर इस तरह नाच रहे हैं, हम देर तक नाचते रहे। ऐसा इस कारण ही हो सका कि हम सब एक परिवार की तरह ही थे। हम सबको यही लगा कि यह हमारे ही घर-परिवार की शादी है।
ऐसा भी हुआ कि मेरा, पंडित शिवकुमार शर्मा और उस्ताद जाकिर हुसैन का साथ काफी पसंद किया गया। आयोजक कहते थे कि शिव-हरि और जाकिर। कभी हम तीनों के साथ कार्यक्रम होते, तो कभी मेरे और जाकिर या शिव जी और जाकिर के। हमारे साथ को खूब लोकप्रियता मिली। हमारे साथ को संगीत रसिक खूब पसंद करते थे। हमारे कार्यक्रम तो खूब हुए ही, अलबम भी कई निकले। वास्तव में संगीत में ऐसा तभी संभव हो पाता है, जब आपके मन मिलते हों, जब आप एक-दूसरे को अच्छी तरह समझते हों। कलाकार को समझते हों, उसकी कला को समझते हों। हम साथ-साथ होते, तो खूब बातें होतीं, घूमते-फिरते।
एक और बात मुझे जाकिर हुसैन की बहुत अच्छी लगती थी। उनकी हर चीज में एक सोच, एक समझ दिखती थी। वह अगर संगीत में कुछ कह रहे होते, संगत कर रहे होते, बजा रहे होते, तो बहुत सोच-समझकर वह काम करते थे। संगत में सोच-समझकर जवाब देते ही थे, जब बजाने के बारे में बोल रहे होते, अपने बारे में, अपने परिवार के बारे में या किसी दूसरे तबला वादक के बारे में बोलते, तो बहुत ही समझदारी के साथ बोलते थे। वह जितने विनम्र थे, उतने ही समझदार थे।
उस्ताद जाकिर हुसैन जैसे कलाकार बहुत कम होते हैं, यदा-कदा आते हैं। उन्होंने संगीत को एक नई ऊंचाई, एक नई पहचान दी। उसे लोकप्रियता का नया आयाम दिया। न सिर्फ भारत में, बल्कि विदेश में उन्होंने एक बड़ा प्रशंसक वर्ग तैयार किया। तरह-तरह के प्रयोग करते रहे। भारतीय संगीत के साथ भी और विश्व के दूसरे देशों के संगीत के साथ भी।
कुछ समय पहले ही उनके इस तरह के प्रयोगात्मक संगीत को प्रतिष्ठित ग्रैमी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। मुझे इस बात की हमेशा प्रसन्नता रहेगी कि जाकिर हुसैन और मैं इतने समय तक साथ रहे, साथ-साथ घूमते-फिरते रहे, कार्यक्रम करते रहे। एक-दूसरे के साथ इतना अधिक वक्त व्यतीत किया। वास्तव में ऐसा तभी होता है, जब आप परिवार की तरह एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं, लेकिन मुझे यह शिकायत भी रहेगी कि मुझे उनकी अस्वस्थता का पता नहीं चल सका। शायद उन्हें कुछ समय से समस्या थी, लेकिन उन्होंने मुझसे कभी इसकी चर्चा नहीं की। उन्हें मुझे बताना चाहिए था। वैसे मुझे पता चला था कि वह भारत के अपने कुछ कार्यक्रम स्थगित करने लगे थे। उन्होंने यह अच्छा किया कि अमेरिका चले गए। उनका परिवार वहीं है, वह अपने अंतिम समय में परिवार के लोगों के साथ थे।
लेकिन वह मेरे सामने बच्चे ही थे, बहुत छोटे थे। उनका इस प्रकार निधन बहुत दुखद है। पहले पंडित शिवकुमार शर्मा चले गए, अब जाकिर हुसैन भी नहीं रहे, लेकिन मेरे पास यमराज आएंगे, तो मैं उन्हें मारने के लिए दौड़ा लूंगा। संगीत या बांसुरी तो उन्हें समझ में नहीं आएगा, तो मैं अपनी बांसुरी से उनकी पिटाई कर दूंगा। बोलूंगा कि तुम ये काम छोड़ो, कोई दूसरा काम करो।
(आलोक पराड़कर से बातचीत पर आधारित)