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असम की नियति बन चुकी है बाढ़

Wed, 22 Jul 2020 01:36 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Wed, 22 Jul 2020 01:36 AM IST
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flood has become Assams destiny
असम में बाढ़ - फोटो : PTI

यह उनके लिए कोई नई बात नहीं है- हर साल ऐसा होता है, लेकिन हर साल राज्य के विकास में जो धन व्यय होता है, उससे ज्यादा नुकसान दो महीने में ब्रह्मपुत्र का कोप कर जाता है। इस समय असम के कुल 33 में से 30 जिले बुरी तरह बाढ़ की चपेट में हैं। 54 लाख लोग घर-बार छोड़ कर राहत शिविरों में हैं।


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सौ से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। दुनिया भर में एक सींग के गैंडे का आश्रय स्थल काजीरंगा पार्क 90 फीसदी जलमग्न है और वहां सौ से ज्यादा जानवर डूबकर मर चुके हैं, जिनमें पांच गैंडे भी हैं। हजारों हेक्टेयर में खड़ी फसल, सड़क, मकान नष्ट हो गए हैं। यह भी जान लें कि राज्य के अधिकांश जिलों में ऐसे ही हालात सितंबर तक चलेंगे।

यह विडंबना है कि असम राज्य का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा नदियों के रौद्र रूप से पस्त रहता है। अनुमान है कि इसमें सालाना कोई 200 करोड़ रुपये का नुकसान होता है जिसमें- मकान, सड़क, मवेशी, खेत, पुल, स्कूल, बिजली, संचार आदि शामिल हैं। राज्य में इतनी मूलभूत सुविधाएं खड़ा करने में दस साल लगते हैं, जबकि हर साल औसतन इतना नुकसान हो ही जाता है।

असम हर साल विकास की राह पर पिछड़ता जाता है। असम में प्राकृतिक संसाधन, मानव संसाधन और बेहतरीन भौगोलिक परिस्थितियां होने के बावजूद यहां का समुचित विकास न हो पाने का कारण हर साल पांच महीने ब्रह्मपुत्र का रौद्र रूप है।

पिछले कुछ सालों से जिस तरह से बह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों में बाढ़ आ रही है, वह हिमालय के ग्लेशियर क्षेत्र में मानवजन्य छेड़छाड़ का ही परिणाम है। यह दुखद है कि आजादी के 72 साल बाद भी हम वहां बाढ़ नियंत्रण की कोई मुकम्मल योजना नहीं दे पाए हैं। यदि इस अवधि में राज्य में बाढ़ से हुए नुकसान व बांटी गई राहत राशि को जोड़ें, तो पाएंगे कि इतने धन में एक नया सुरक्षित असम खड़ा किया जा सकता था।

पिछले कुछ सालों से ब्रह्मपुत्र का प्रवाह दिनोंदिन रौद्र होने का मुख्य कारण इसके पहाड़ी मार्ग पर अंधाधुंध जंगल कटाई को माना जा रहा है। ब्रह्मपुत्र का प्रवाह क्षेत्र उत्तुंग पहाड़ियों वाला है, वहां कभी घने जंगल हुआ करते थे। उस क्षेत्र में बारिश भी जमकर होती है।

असम में हर साल तबाही मचाने वाली ब्रह्मपुत्र और बराक नदियां, उनकी कोई 48 सहायक नदियां और उनसे जुड़ी असंख्य सरिताओं पर सिंचाई व बिजली उत्पादन परियोजनाओं के अलावा इनके जल प्रवाह को आबादी में घुसने से रोकने की योजनाएं बनाने की मांग लंबे समय से उठती रही है।

असम की अर्थव्यवस्था का मूल आधार खेती-किसानी ही है, और बाढ़ का पानी हर साल लाखों हेक्टेयर में खड़ी फसल को नष्ट कर देता है। ऐसे में वहां का किसान कभी भी कर्ज से उबर ही नहीं पाता है। इस क्षेत्र की मुख्य फसलें धान, जूट, सरसों, दालें व गन्ना हैं।

धान व जूट की खेती का समय ठीक बाढ़ के दिनों का ही होता है। खेती के तरीकों में बदलाव और जंगलों का बेतरतीब दोहन जैसी मानव-निर्मित दुर्घटनाओं ने जमीन के नुकसान के खतरे को दोगुना कर दिया है। दुनिया में नदियों पर बने सबसे बड़े द्वीप माजुली पर नदी के बहाव के कारण जमीन कटान का सबसे अधिक असर पड़ा है।

ब्रह्मपुत्र घाटी में तट-कटाव और बाढ़ प्रबंध के उपायों की योजना बनाने और उसे लागू करने के लिए दिसंबर 1981 में ब्रह्मपुत्र बोर्ड की स्थापना की गई थी। बोर्ड ने ब्रह्मपुत्र व बराक की सहायक नदियों से संबंधित योजना कई साल पहले तैयार भी कर ली थी।

केंद्र सरकार के अधीन एक बाढ़ नियंत्रण महकमा कई सालों से काम कर रहा है और उसके रिकॉर्ड में ब्रह्मपुत्र घाटी देश के सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में से है। इन महकमों ने इस दिशा में अभी तक क्या कुछ किया?

उससे कागज व आंकड़ों को जरूर संतुष्टि हो सकती है, असम के आम लोगों तक तो उनका काम पहुंचा नहीं है। असम को सालाना बाढ़ के प्रकोप से बचाने के लिए ब्रह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों की गाद सफाई, पुराने बांध व तटबंधों की सफाई और नए बांधों का निर्माण जरूरी है।

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