प्रतिरोध की यह चिंगारी रंग लाएगी
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पिछले 15 दिनों में मुस्लिम औरतों से संबंधित तरह-तरह की खबरें देश-विदेश से मिल रही हैं। कुछ आशान्वित करती हैं, तो कुछ आक्रोश पैदा करती हैं। लेकिन इन खबरों में मुस्लिम महिलाओं के अनुभवों में मौजूद विभिन्नता को पहचानना बहुत जरूरी है। पहली खबर लाहौर से है, जहां विगत 23 मार्च को ताहिरा मजहर अली का देहांत हुआ। ताहिरा उन लोगो में से थीं, जिन्होंने पाकिस्तान बनने के बाद भी, अपने पति और अन्य साथियों के साथ हमेशा 23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में मनाया। जिया के क्रूर तानाशाही के दिनों में भी उन्होंने इसे कायम रखा। उनका जन्म पश्चिमी पंजाब (जो बाद में पाकिस्तान बना) के सबसे बड़े जमींदार परिवार में हुआ था। 16 साल की उम्र में उनकी शादी मजहर अली से हुई, जो एक चर्चित छात्र नेता थे। आगे चलकर, दोनों पति-पत्नी पाकिस्तान के कम्युनिस्ट आंदोलन के साथ जुड़े। वहां पहली बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की परंपरा भी उन्हीं के प्रयासों से शुरू हुई।
बहरहाल, हमारे देश में भी पिछले कुछ दिनों से भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन नामक संगठन सुर्खियों में है। मुंबई स्थित इस संगठन ने कट्टरपंथियों के तमाम विरोध के बाद भी मुस्लिम महिलाओं के न्यायिक और जीविका-संबंधी अधिकारों के लिए लगातार अभियान चलाया। हाल में उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ को नियमित करने का सुझाव दिया है। बहुविवाह पर रोक, महिलाओं को बच्चों का पालक बनाए जाने, तलाक मांगने का अधिकार जैसी धाराओं को इस नियमित मुस्लिम पर्सनल कानून में दर्ज करने की मांग की गई है।
इस संगठन की संस्थापक नूरजहां सफिया नियाज का मानना है कि भारत में मुस्लिम महिलाओं के सामने तीन बड़े मुद्दे हैं- गरीबी, सांप्रदायिक हिंसा और समुदाय के महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव के प्रति व्यापक खामोशी। हाल की घटनाएं उनकी बातों की सच्चाई का सुबूत हैं। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट बताती हैं कि पूरे देश में सबसे अधिक गरीबी और पिछड़ापन का शिकार मुस्लिम महिलाएं ही हैं, जिसके लिए विभिन्न केंद्रीय और राजकीय सरकारें जिम्मेदार हैं। दूसरा मुद्दा भी सरकार के अन्यायपूर्ण दृष्टिकोण से संबंधित है। 2014 में मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान हुए मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार के आरोपियों को आज तक सजा नही मिली, जबकि हाशिमपुरा हत्याकांड में भी दोषियों को अदालत ने बरी कर दिया। नूरजहां द्वारा चिह्नित तीसरा मुद्दा भी दुरुस्त मालूम देता है। लेकिन यह तय है कि व्यापक चुप्पी भी कानून में सुधार की मांग खत्म नहीं कर पाएगी।
उधर अफगानिस्तान में दो खबरें शोचनीय हैं। फर्कुन्दा नामक महिला को भीड़ द्वारा पहले पत्थर मारने और फिर जला कर हत्या कर देने के बाद अफगानिस्तान की तमाम बहादुर औरतें घटनास्थल पर पहुंचीं और विरोध के बावजूद उसे बाइज्जत दफन किया। उनकी बहादुरी का ही नतीजा है कि सरकार को मामले की जांच करवानी पड़ी और फर्कुन्दा निर्दोष साबित हुईं। वहीं दूसरी खबर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की है, जब काबुल की सड़कों पर अफगान पुरुषों ने बुर्के पहनकर जुलूस निकाला। उनके हाथ में तख्तियां थीं, जिन पर लिखा था- 'समानता' और 'औरतों को यह बताना बंद करें कि उन्हें क्या पहनना चाहिए।' इससे भविष्य के लिए उम्मीद पैदा होती है। आखिर प्रतिरोध की ये चिंगारियां रंग तो लाएंगी ही!
-लेखिका माकपा की पूर्व सांसद हैं