क्यों धधकते हैं पहाड़ के जंगल

चंद्रशेखर तिवारी Updated Mon, 28 May 2018 06:28 PM IST
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चंद्रशेखर तिवारी
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पहाड़ों में पारा चढ़ते ही जंगल धधकने लगे हैं। पिछले हफ्ते भर के दौरान उत्तराखंड के पौड़ी, बागेश्वर, चमोली, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा और टिहरी समेत कई जनपदों के जंगल आग की भेंट चढ़ गए हैं। उत्तराखंड में 24,295 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र वनों से आच्छादित है, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 45.43 प्रतिशत है। अमूमन यहां हर साल 1,750 हेक्टयर जंगल फायर सीजन में स्वाहा हो जाते हैं। इस फायर सीजन में अब तक गढ़वाल, कुमाऊं, शिवालिक और वन्यजीव संगठन क्षेत्र में वनाग्नि से करीब 2,670 हेक्टेयर वन क्षेत्र को नुकसान पहुंच चुका है।
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पहाड़ के जंगलों में लगने वाली आग से न केवल उस क्षेत्र की जैव विविधता पर बुरा प्रभाव पड़ता है, बल्कि इससे भू-जल का स्तर भी प्रभावित होने लगता है। कई छोटी वनस्पतियां, जो पानी को जमीन के अंदर ले जाने में मददगार साबित होती हैं, आग से जल जाती हैं। जमीन के शुष्क हो जाने से जहां भू-कटाव का खतरा बढ़ जाता है, वहीं जमीन की जलधारण क्षमता घट जाने से आसपास के जलस्रोतों में पानी की मात्रा कम होने लगती है अथवा वे सूखने के कगार पर पहुंच जाते हैं।
पहाड़ के जंगलों में आग लगने के पीछे चीड़ की पत्तियों (पिरुल) को जिम्मेदार ठहराया जाता है। पिरुल तुरंत आग पकड़ लेता है और इस दौरान चीड़ का जलता फल जब नीचे की ओर लुढ़कने लगता है, तो यह आग को दूर तक फैला देता है। उत्तराखंड के कुल वनक्षेत्र के 15.25 प्रतिशत भाग पर फैले एकल चीड़ वनों में मार्च से जून के मध्य चीड़ की नोकदार पत्तियां जमीन में गिरने लगती हैं। चीड़ का एक हेक्टेयर जंगल वर्ष भर में छह-सात टन पिरुल जमीन में गिरा देता है। चीड़ के जंगल में नमी की मात्रा कम होती है, इसलिए इसके जंगलों में आग तेजी से फैल जाती है। चीड़़ से निकलने वाला चिपचिपा राल (लीसा) तुरंत आग पकड़ लेता है, इसलिए चीड़ के पेड़ बुरी तरह जल जाते हैं।
पहाड़ के जंगलों में आग लगने के मूल में स्थानीय लोगों और सरकारी महकमे की उदासीनता है। वर्षों पहले वन विभाग द्वारा फायर सीजन में अस्थायी आग-पतरौल रखने और फायर लाइन बनाने की जो व्यवस्था बनाई गई थी, वह बहुत कारगर मानी जाती थी। आग लगने पर पतरौल गांव वालों को आवाज देकर आग बुझाने के लिए एकत्रित कर लेता था। गांव वालों को आग बुझाने के एवज में तब स्थानीय वनों से मिलने वाले हक-हकूकों में प्राथमिकता मिलती थी। आग-पतरौल वाली परंपरा अब समाप्त-सी हो गई है। पहाड़ के गांव जिस तरह खाली हो रहे हैं, उस वजह से भी अग्नि नियंत्रण में मिलने वाली स्थानीय सहभागिता में कमी आई है।

वन विभाग में मौजूद वित्तीय व मानव संसाधनों की कमी और अग्नि शमन हेतु समुचित योजनाओं का अभाव भी अग्नि नियंत्रण में बाधक है। वन विभाग के एक फॉरेस्ट गार्ड को तकरीबन 50 से 100 वर्ग किमी वनक्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था करनी होती है। ऐसे में वनों में लगने वाली आग कहां तक नियंत्रित हो सकेगी? इस दिशा में वन विभाग को अग्नि शमन के अत्याधुनिक उपकरणों की खरीद, आग पतरौलों की अस्थायी नियुक्ति और वनाग्नि काल में आग की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाली फायर लाइनों की संख्या बढ़ाने के लिए बजट जुटाने के प्रयास करने होंगे। वन प्रबंधन में स्थानीय ग्रामीण जनों की भागीदारी बढ़ाकर आग से वनों को काफी हद तक बचाया जा सकता है।
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