वित्त आयोग की परीक्षा
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पंद्रहवें वित्त आयोग की अंतरिम सिफारिशों में कई मुद्दे उठाए गए हैं, जिनका अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक प्रभाव है। वर्ष 2017 में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त इस आयोग से 2020-25 की अवधि में करों के वितरण के लिए अपनी सिफारिशें देने की उम्मीद की गई थी। पर तय समय यानी अक्तूबर, 2019 तक वह अपनी रिपोर्ट सौंप नहीं पाया, क्योंकि पिछले एक साल में दो अप्रत्याशित घटनाओं के चलते उसे राजस्व के अपने आकलन में बड़े बदलाव की आवश्यकता थी। इनमें से एक तो जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा खत्म कर और लद्दाख को उससे अलग कर दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने का फैसला था, और दूसरा अनिश्चित आर्थिक परिदृश्य था, जिसके कारण राजस्व पुर्वानुमान का आकलन करना कठिन हो गया। आयोग को और काम करने की जरूरत पड़ गई। इसलिए सरकार ने आयोग का कार्यकाल एक वर्ष और बढ़ा दिया। फिर आयोग ने वित्त वर्ष 2020-21 के लिए अंतरिम रिपोर्ट सौंपी, जबकि अगले चार साल के लिए अपनी सिफारिशें वह आगामी अक्तूबर में सौंपेगा।
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आयोग की अंतरिम रिपोर्ट से कई मुद्दे सामने आए हैं। राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न करों की राशि थी, जो उन्हें दी जाएगी। चौदहवें आयोग ने इसे विभाज्य पुल का 42 फीसदी रखा था। वित्त आयोग ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में इसमें कोई बदलाव नहीं किया है, लेकिन जम्मू-कश्मीर की स्थिति में बदलाव को देखते हुए भत्ते का प्रावधान किया है। आयोग द्वारा सुझाए गए हस्तांतरण फॉर्मूले के अनुसार अब उसकी हिस्सेदारी बढ़ोतरी के बाद करीब 0.85 फीसदी या कहें, तो एक फीसदी हो जाएगी। इस हिस्से का भुगतान केंद्र द्वारा किया जाएगा। इसके चलते राज्यों के विभाज्य पुल में एक फीसदी की कटौती की गई है और इसे 41 फीसदी रखा गया है।
राज्यों के बीच क्षैतिज वितरण के फॉर्मूले को हालांकि कई तरह से संशोधित किया गया है। पिछले चार दशकों से आयोग राज्यों के बीच क्षैतिज वितरण के लिए 1971 की जनसंख्या को आधार मानता था। लेकिन वर्तमान वित्त आयोग ने 2011 की जनसंख्या को आधार माना है। इससे दक्षिण के राज्यों में भारी नाराजगी दिखी, जिनकी जनसंख्या में बहुत कम वृद्धि हुई। उन्हें लगता है कि करों के वितरण में उन्हें दंडित किया जा रहा है। वर्तमान वित्त आयोग ने उनकी चिंता पर ध्यान दिया और जनसांख्यिकीय प्रदर्शन के नाम से एक नया कॉलम जोड़ा, जिसके लिए 10.5 अंक हैं। इसकी गणना 1971 की जनसंख्या के साथ समायोजित राज्य की कुल प्रजनन दर के विलोम के रूप में की जाती है। इसी तरह वन के संबंध में आयोग ने पूरे वन क्षेत्र के बजाय सघन वन के मानदंड का उपयोग किया है। इसे भी कर वितरण में 2.5 फीसदी अंकों के साथ शामिल किया गया है, जो पिछले आयोग की रिपोर्ट में नहीं था। ये सभी सकारात्मक घटनाक्रम हैं और दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को दूर करते हैं, क्योंकि केरल और कर्नाटक उपर्युक्त बदलाव के बावजूद पीड़ित थे।
कर्नाटक, तेलंगाना और मिजोरम की विशेष समस्याएं थीं, क्योंकि उनकी हिस्सेदारी के अलावा राजस्व घाटा को पाटने का अनुदान 2019-20 की तुलना में 2020-21 में कम था। आयोग ने इस पर ध्यान दिया और यह सुनिश्चित करने के लिए, कि उनका हिस्सा पिछले आयोग से मिले हिस्से से कम न हो, उन्हें 6,764 करोड़ रुपये का विशेष अनुदान दिया। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र सरकार ने सुझावों के इस हिस्से को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया है। हालांकि इस मुद्दे पर केंद्र का फैसला सार्वजनिक नहीं है, इसलिए निर्णय पर अमल का इंतजार करना उचित होगा। लेकिन स्पष्ट रूप से इस विसंगति को सुधारने की आवश्यकता है। स्थानीय निकायों के लिए दिया जाने वाला अनुदान महत्वपूर्ण अनुदान होता है, जो कर वितरण का 4.3 फीसदी है और शहरी व ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए 90,000 करोड़ रुपये आंकी गई है। यह कदम भी सकारात्मक है। दुर्भाग्य से राज्यों ने स्थानीय निकायों को ज्यादा धन और शक्ति देने और उन्हें मजबूत बनाने के लिए कदम नहीं उठाए हैं। अंतरिम रिपोर्ट में यह ठीक ही रेखांकित किया गया है कि केंद्र और राज्यों द्वारा अपने बजट में वित्तीय घाटे का स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिए। केंद्रीय बजट में इसका पालन किया गया है, राज्यों को भी इसका पालन करना चाहिए। इस साल केंद्र का यह घाटा करीब पांच फीसदी है। राज्यों को मिला दें, तो वित्तीय घाटा आठ से नौ फीसदी के बीच है। नीति निर्माण के लिए ये आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण हैं।
दो गंभीर चिंताएं हैं, जिन पर शेष चार वर्षों के लिए सुझाव देते हुए आयोग को बेहद सावधान रहना होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता और इसके लिए पर्याप्त धनराशि आवंटित की जानी चाहिए। पर केंद्र और राज्यों के अलावा भी कुल कर कोष को विभाजित करना विनाशकारी होगा। यदि केंद्र का इरादा अलग से सुरक्षा व्यय का निर्धारण करना और फिर कर को बांटना है, तो यह सांविधानिक प्रावधानों की भावना के अनुरूप नहीं होगा। यदि सुरक्षा व्यय बढ़ाना है, तो यह केंद्र और राज्य की कुल जरूरतों और उसके अनुसार विभाज्य पुल के वितरण में परिलक्षित होना चाहिए। सबसे अच्छा समाधान केंद्र प्रायोजित योजनाओं को तेजी से कम करना, सुरक्षा व्यय में वृद्धि करना और राज्यों को उनके विकास के प्रयासों में सहायता करना है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारक प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहन है। संघीय ढांचे में केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए उच्च प्राथमिकता नहीं हो सकती। प्रोत्साहन राशि धन के प्रभावी उपयोग, केंद्र अथवा राज्य की सभी योजनाओं (स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे में) के प्रभावी क्रियान्वयन के आधार पर दिया जाना चाहिए।
आयोग के पास बेहद मुश्किल काम है, क्योंकि उसे चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के मद्देनजर अपने सुझाव देने हैं, जिसने राज्यों के आवंटन में 10 फीसदी की बढ़ोतरी की थी। उम्मीद है कि अगले चार वर्षों के लिए सिफारिशें करते हुए वह हमारे संघीय ढांचे और विशेष रूप से राज्यों की जरूरतों का ध्यान रखेगा और सुरक्षा जरूरतों और प्रदर्शन प्रोत्साहन का आकलन करेगा।
-लेखक 13वें वित्त आयोग के पूर्व सदस्य और पूर्व कैबिनेट सचिव हैं।