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एक सुंदर शहर की गंदगी

Sun, 06 Sep 2015 07:27 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 06 Sep 2015 07:27 PM IST
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filth of a beautiful city

अपने देश को जब हम विदेशियों की आंखों से देखते हैं, तो कई ऐसी चीजें दिखने लगती हैं, जो देसी नजरों से नहीं दिखतीं। ऐसा मेरे साथ पिछले सप्ताह हुआ, जब मैं अपने एक पुराने अंग्रेज दोस्त और उसकी पत्नी के साथ लद्दाख गई। भारत का यह अति सुंदर प्रदेश किसी दूसरे देश में होता, तो वहां का हर परिवार धनवान हो गया होता। मगर लद्दाख की राजधानी लेह इतनी बेहाल है कि मेरे दोस्त की पत्नी कहने लगीं, समझ में नहीं आता कि इतने सुंदर शहर की सड़कें इतनी टूटी क्यों हैं? इस शहर के हर नुक्कड़ पर कूड़े के ढेर, गंदी नालियां और आवारा कुत्ते क्यों दिखते हैं?

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दोस्त की पत्नी ने यह बात तब कही, जब हम लेह के बड़े बाजार में घूम रहे थे। देसी नजरों से मैं सिर्फ यह देख रही थी कि कितनी सुंदर थीं पटरी वालों की दुकानें। उनमें लद्दाखी महिलाएं और मर्द अपने खास लिबास में बैठकर ताजा सब्जियां, अखरोट और किशमिश बेच रहे थे। दोस्त की पत्नी की बातें सुन मैंने उन चीजों पर ध्यान दिया, जो तब तक मेरे लिए अदृश्य थीं। तब मुझे वह टूटी सड़क दिखी, जिसकी पटरी पर दुकानें लगी थीं। मुझे दिखी वह गंदी नाली, जिसके किनारे कुत्ते कूड़े के ढेर पर खाने की चीजें ढूंढ रहे थे। मुझे वह धूल की चादर दिखी, जिसमें सारा शहर लिपटा पड़ा था। यदि ये चीजें न होतीं, तो हिमालय की गोद में बसा यह शहर इतना सुंदर होता कि लाखों की तादाद में यहां पर्यटक आते।
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नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने अपने भाषणों में बार-बार कहा है कि पर्यटन अर्थव्यवस्था का एक मजबूत खंभा बन सकता है। लेकिन बाकी काम उन्होंने औरों को सौंप रखा है, सो अभी तक इस क्षेत्र में परिवर्तन नहीं आया है। पर्यटन को पहले जिस लापरवाही से देखा जाता था, आज भी उसी तरह देखा जा रहा है। सो, लेह पहुंचना इतना महंगा है कि इसकी तुलना में दिल्ली से बैंकाक जाना ज्यादा सस्ता पड़ता है। वहां तक जाने के लिए कई वर्षों तक सिर्फ एयर इंडिया की फ्लाइट होती थी। अब कई निजी उड़ानें शुरू तो हो गई हैं, लेकिन वे कम हैं, और महंगी भी। इसके बावजूद लेह में अनेक ऐसे पर्यटक दिखे, जो अमेरिका, यूरोप और अपने देश के दूर-दराज के इलाकों से आए हुए थे।
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लद्दाख की सुंदरता देखकर जहां दिल खुश हुआ, वहीं इस बात का मुझे दुख भी हुआ कि कोशिशों को बढ़ावा देने का काम सिर्फ निजी क्षेत्र में ही हो रहा है। लेह में देश के कई प्रांतों से दुकानदार, व्यापारी, होटल मालिक आए हैं, और इनकी सेवाएं काफी अच्छी भी हैं। पर सेलफोन और इंटरनेट की सेवाएं वहां बहुत खराब हैं। बिजली वहां रामभरोसे है। सो जिन विदेशी पर्यटकों को बेहतर सेवाओं की आदत है, वे हमारी सरकार की सेवाएं देख मायूस होकर लौटते हैं।


मेरी समझ में यह नहीं आता कि जिस प्रधानमंत्री ने साफ इशारा किया है कि पर्यटन को वह बहुत गंभीरता से लेते हैं, वहां इस क्षेत्र में कोई नया कदम आखिर क्यों नहीं उठाया जा रहा। याद रखिए कि जम्मू-कश्मीर की गठबंधन सरकार में भाजपा अब एक भागीदार है। याद यह भी रखिए कि लद्दाख ने सांसद भी चुना है भाजपा का। सो अगर अब भी कुछ नहीं होता, तो फिर कभी नहीं होगा। लद्दाख इसका एक उदाहरण बन सकता है कि कैसे एक गरीब राज्य की गरीबी पर्यटन के सहारे दूर की जा सकती है। कमी पैसों की नहीं, दृढ़ इरादों की है।

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