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व्यंग्यः पॉकेटमारी में एफडीआई

Mon, 24 Sep 2012 04:00 PM IST
मनु पंवार
मनु पंवार Updated Mon, 24 Sep 2012 04:00 PM IST
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fdi to pinch pocket

धंधे का सालाना टर्नओवर घटने से डॉन परेशान था। ऐसा ही चलता रहा, तो एक दिन धंधा बंद करने की नौबत आ जाएगी। डॉन को अपने लोकल गुर्गों की काबिलियत पर अब भरोसा नहीं रहा। उसे एक आइडिया सूझा। अपने धंधे में एफडीआई का आइडिया। लुटेरे, झपटमार, जेबकतरे, उठाईगीर इन सारे दायित्वधारी गुर्गों की टेंशन बढ़ गई है। उन्हें इतना अंदाजा है कि एफडीआई से उनकी रोजी-रोटी छिन सकती है। इसी मसले पर बस स्टॉप पर दो जेबकतरों के बीच वार्तालाप चल रहा है।

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ऐ पकिया! यह एफडीआई क्या बला है रे?
अरे कुछ नहीं रे स्याणे! एफडीआई बोले तो अमेरिका, इंग्लैंड, दुबई से अपने प्रोफेशन के भाई लोग इधर आएंगे। अपना काम-धंधा सेट करेंगे और मजे-मजे में लोगों की जेब काटते रहेंगे।
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पकिया! ये अमेरिका, इंग्लैंड, दुबई वाले जेबकतरे ज्यादा एक्सपर्ट होते हैं क्या रे?
अरे नहीं रे! इस धंधे में अपन से ज्यादा एक्सपर्ट कौन हो सकता है भला? अपन तो इत्ती से ब्लेड से कैसे-कैसों की जेब काट डालते हैं। इस कला में कई मौकों पर सरकार हमें टक्कर दे देती है, लेकिन अपन लोगों की बात ही कुछ और है।
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फिर डॉन को परदेस से जेबकतरे बुलाने की क्या जरूरत पड़ी? अपन भी तो जेब ही काट रहे हैं न।
यार, जरा शक्ल-सूरत और स्टाइल का फर्क हो गया। अपन लोग शक्ल से ही जेबकतरे लगते हैं। वे बंदे टाई-शाई पहनके, चेहरे पे हमेशा इस्माइल चिपकाके, अंगरेजी में गिटपिटाके मजे-मजे में सामने वाली की जेब काट डालते हैं। सामने वाले को पता है कि जेब कट गई है, फिर भी वो मुसकराता हुआ ऐसे निकल लेता है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। अपन पकड़े गए, तो हर कोई हाथ-साफ कर लेता है। उनके पकड़े जाने का कोई चांस ही नहीं। अपन बसों, ट्रेनों, भीड़-भाड़ वाले इलाकों में ही जेब काट सकते हैं। वे लोग बाकायदा शोरूम लगाकर जेब काटते हैं।


तो फिर डॉन भाई को एफडीआई लाने से पहले हमें फैसिलिटी देनी चाहिए। तभी तो अपन लोग धंधे को चमका सकते हैं।
अरे, जब से अमेरिका वालों ने डॉन भाई को उदारीकरण की बूटी सुंघाई है, तब से भाई का दिमाग ही फिर गया है। ...चल छोड़ यार। शाम की रोटी का जुगाड़ भी करना है। इतने में बस स्टॉप पर बस आ गई। दोनों जेबकतरे अपने धंधे पर निकल पड़े।

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