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भू-जल का दोहन करने वाली खेती, देश में लगभग आठ करोड़ लोगों को पीने का पानी सुलभ नहीं हो पाता

Thu, 21 Jan 2021 07:46 AM IST
VEER SINGH वीर सिंह
वीर सिंह Published by: VEER SINGH Updated Thu, 21 Jan 2021 07:46 AM IST
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Farming that exploits ground water drinking water is not accessible to about eight crore people in the country
भूगर्भ जल दोहन - फोटो : अमर उजाला

किसान आंदोलन यकायक ही खड़ा नहीं हो गया। यह दशकों पुराने असंतोष का पका फल है। यह सोचना गलत होगा कि केवल कृषि कानून ही इसकी जड़ों में हैं। इसके मूल में तो हरित क्रांति के वे बीज हैं, जिन्होंने किसानों को कृषि की तकनीकों से लेकर बैंकों तक का गुलाम बना डाला है। और उससे भी ऊपर, इन विष बीजों ने उस जीवनाधार को ही छिन्न-भिन्न कर दिया है, जिसके सहारे समाज पोषित होता है और जिसके बल पर हम एक सुरक्षित भविष्य के सपने संजोते हैं। एक प्राकृतिक संसाधन, जिस पर हमारी आधुनिक खेती की सबसे अधिक मार पड़ी है, वह है धरती के गर्भ का पानी।


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अब एक अध्ययन में पाया गया है कि भू-जल के अंधाधुंध दोहन के कारण दुनिया भर में जमीन धंस रही है। यह अध्ययन अमेरिकन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ साइंस द्वारा किया गया है। शोध के ये परिणाम दुनिया के संभावित भूमि धंसाव क्षेत्रों में चयनित 7,343 प्रमुख शहरों में से 1,596 शहरों, यानी 22 प्रतिशत सैंपल शहरों के अध्ययन के आधार पर हैं। भू-जल के अत्यधिक दोहन में कृषि सबसे आगे है। यह वही कृषि है, जो ऐसे बीजों पर निर्भर है, जिनसे अधिकतम उत्पादन लेने के लिए रात-दिन ट्यूबवेल से धरती का पानी उलीचा जाता है। भू-जल एक अनमोल प्राकृतिक संसाधन है। वैसे तो पृथ्वी एक जल-ग्रह है, जिसके 70 प्रतिशत भाग पर जल ही जल है, मगर पीने योग्य पानी कुल जल का मात्रा 2.5 प्रतिशत है, और यही पेयजल फसलों की सिंचाई में काम आता है। आश्चर्यजनक सत्य यह है कि इस सीमित पेय जल का लगभग 72 प्रतिशत तो हमारी आधुनिक कृषि ही पी जाती है–वह कृषि जो हरित क्रांति के आदानों पर अवलंबित है।

पानी की कमी स्वयं में एक बहुत बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा है। देश के कई प्रदेश और राजधानी दिल्ली सहित देश के बड़े-बड़े शहर जल संकट से जूझ रहे हैं। जल संकट इतना विकराल है कि निकट भविष्य में खाद्य सुक्षा की गारंटी हो न हो, जल सुरक्षा की तो बिल्कुल नहीं। अर्थात, हरित क्रांति से उपजी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा जल सुरक्षा की कीमत पर है। नीति आयोग के अनुसार शून्य भू-जल स्थिति वाले प्रमुख शहरों की संख्या बढ़ रही है। हमारा सारा खान-पान कृषि से मिलने वाले उत्पादों पर निर्भर है और प्रत्येक उत्पाद की कीमत पानी से चुकानी पड़ती है। गेहूं और धान हमारी दो प्रमुख फसलें हैं, जिनके अंतर्गत सर्वाधिक क्षेत्र आता है। एक किलो गेहूं पैदा करने के लिए लगभग 1,500 लीटर और एक किलो चावल पैदा करने में 2,497 लीटर पानी की खपत होती है। एक क्विंटल गन्ना पैदा करने में डेढ़ से तीन लाख लीटर पानी खप जाता है।

पानी के लिए सुरसा-सा मुंह खुला रखने वाले बीजों की जगह ऐसे पारंपरिक बीज भी हैं, जिन्हें देश के कई क्षेत्रों में उगाया जाता है, जैसे मंडुआ, झंगोरा, बाजरा, ज्वार जैसे मोटे अनाज और रामदाना (चौलाई) जैसी फसलें, जिन्हें बिना सिंचाई के पैदा किया जा सकता है। गेहूं और धान की अनेक ऐसी पारंपरिक प्रजातियां हैं, जिन्हें बारानी भूमि पर उगाया जा सकता है और अनेक जगह ऐसा हो भी रहा है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र बिना सिंचाई की खेती के उदाहरण हैं। कई राज्यों की सरकारें दलहन और तिलहनों की खेती को बढ़ावा दे रही हैं, ताकि पानी को बचाया जा सके। मगर हमारी कृषि नीति में भू-जल भंडार के संरक्षण, न्यूनतम पानी वाली फसलों और और सूखे में भी पैदावार देने वाले बीजों आदि के बारे में कोई चिंतन नहीं। किसान नेता भी इन मुद्दों को अपने आस-पास नहीं फटकने देते।

देश में लगभग आठ करोड़ लोगों को पीने का पानी तक आसानी से सुलभ नहीं हो पाता, तब खेती का मुंह पानी के लिए खोल देना कहां का न्याय है? हमारे यहां खाद्य सुरक्षा पर तो बहुत व्याख्यान होते हैं, चिंतन होता है और नीतियां बनती हैं, पर जल सुरक्षा पर कम बात होती है। क्या एक संपोषित खाद्य सुरक्षा जल सुरक्षा के बिना संभव है?

-पूर्व प्रोफेसर, जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय।

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