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मुद्दा: किसानों पर जलवायु संकट का कहर... जलवायु के प्रति अनुकूल कृषि वाले दृष्टिकोण से बदल सकती है तस्वीर

Sat, 13 Jul 2024 04:58 AM IST
Seema Javed सीमा जावेद
Updated Sat, 13 Jul 2024 04:58 AM IST
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सार
फसलों की उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाने के लिए जलवायु-स्मार्ट कृषि प्रौद्योगिकियों की सख्त जरूरत है।
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farmers facing Climate crisis situation can improve with climate-friendly agricultural approach
सूखा (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एएनआई

विस्तार

पिछले दो वर्षों से लगातार मौसम का कहर अन्नदाताओं पर टूट रहा है। इस साल पड़ी अभूतपूर्व गर्मी जलवायु परिवर्तन के चलते बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग का साफ संकेत है। इसने भारत में फसलों की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित किया है। पिछले पांच वर्षों में चरम मौसमी घटनाओं ने फसल और उपज के नुकसान के रूप में 60 फीसदी से अधिक सीमांत (दो हेक्टेयर से कम जमीन वाले छोटे और मंझोले) किसानों को प्रभावित किया है।



डेवलपमेंट इंटेलिजेंस यूनिट (डीआईयू) द्वारा 'भारत के सीमांत किसानों की स्थिति 2024' पर जारी दूसरी वार्षिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि भारी गर्मी, सूखा, बेमौसम बारिश और बाढ़ से उनकी  पैदावार को नुकसान हो रहा है। इस अध्ययन में साफ तौर पर बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग लगातार छोटे व मंझोले किसानों पर प्रहार कर रहे हैं और उनकी फसलों की उत्पादकता में निरंतर गिरावट आ रही है।


गौरतलब है कि साल 2022 में हीटवेव के शुरुआती रौद्र रूप ने भारत में गेहूं की फसल को प्रभावित किया और उत्पादन की मात्रा साल 2021 में 10.959 करोड़ टन से घटकर 10.77 करोड़ टन रह गई। इसने दुनिया के दूसरे सबसे बड़े गेहूं उत्पादक भारत को गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने को बाध्य किया। वर्ष 2023 में भी इसी वजह से गेहूं का उत्पादन प्रभावित हुआ, और लक्ष्य से लगभग तीस लाख टन कम उत्पादन हुआ।  जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम का बदलता मिजाज पिछले कुछ वर्षों से खेती के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है, जो किसानों के लिए मुसीबत बन चुका है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेंट चेंज (आईपीसीसी) की रिपोर्ट में गेहूं और मक्के की खेती पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों सहित अन्य क्षेत्रों में भी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की बात कही गई है।

वैज्ञानिकों की मानें, तो यदि जलवायु परिवर्तन की दर इसी गति से बढ़ती रही, तो भविष्य में कई फल मिलने में दुश्वारियां पैदा हो जाएंगी। आने वाले वर्षों में केले के उत्पादन पर भी नकारात्मक असर देखने को मिल सकता है। अगर तापमान में एक डिग्री की वृद्धि होती है, तो गेहूं उत्पादन में करीब तीन से चार फीसदी कमी आएगी।

तापमान में चार-पांच डिग्री वृद्धि से उत्पादन में 15-20 फीसदी की कमी आ सकती है। बढ़ते तापमान और बदलते वर्षा चक्र से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की फसलें तबाह हो रही हैं। क्लाइमेट ट्रांसपेरेंसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि क्लाइमेट चेंज की वजह से धान के उत्पादन में भी 10 से 30 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है, और मक्का की पैदावार में भी 25 से 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से फसल की पैदावार कम होने के साथ उपज की पोषण गुणवत्ता भी घट जाती है। कम वर्षा की वजह से महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चावल, मक्का, कपास, सोयाबीन, मूंगफली और दालों जैसी फसलों की बुअाई देर से हो सकी। कई उत्तरी राज्यों में धान के खेत अक्सर बाढ़ के कारण जलमग्न रहते हैं, जिससे फसल बर्बाद हो जाती है।

भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान लगभग 19.9 प्रतिशत है। यह क्षेत्र भारत के 42.6 प्रतिशत लोगों को रोजगार देता है। लिहाजा राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (एनएमएसए) जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) के तहत संचालित मुख्य अभियानों में से एक है। तापमान में वृद्धि और पानी की उपलब्धता में बदलाव, पूरे कृषि-पारिस्थितिकी क्षेत्रों में सिंचित कृषि उत्पादन को प्रभावित करते हैं। ऐसे में, हमें जलवायु-लचीली कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने और आजीविका में विविधता लाने की जरूरत है। फसलों की उत्पादकता और  किसानों की आय बढ़ाने के लिए जलवायु-स्मार्ट कृषि (सीएसए) प्रौद्योगिकियों की सख्त जरूरत है, जिसमें एक सतत दृष्टिकोण शामिल है। एक प्रभावी जलवायु के प्रति अनुकूल कृषि वाले दृष्टिकोण से हम भारतीय कृषि पर जलवायु परिवर्तन के असर को कम कर सकते हैं।

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