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भटक तो नहीं गया किसान आंदोलन, क्यों नहीं सुनी जा रही सरकार की बात 

Wed, 16 Dec 2020 03:27 AM IST
Amit Mandal अवधेश कुमार
अवधेश कुमार Published by: Amit Mandal Updated Wed, 16 Dec 2020 03:27 AM IST
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Farmer movement: why government voice not heard
भूख हड़ताल पर बैठे किसान नेता - फोटो : अमर उजाला/एएनआई

किसानों के प्रति किसकी सहानुभूति नहीं होगी, पर जिस तरह आंदोलनकारियों ने जिद पकड़ी हुई है, सरकार की वाजिब बात तक सुनने को तैयार नहीं तथा जबरन टोल मुक्त करने से लेकर मार्गों को बाधित कर रहे हैं, उसमें बीच का रास्ता निकल ही नहीं सकता। लंबी बातचीत के बाद सरकार की ओर से 22 पृष्ठों का जो दस सूत्री प्रस्ताव आया, उसमें इनकी शंकाओं का समाधान तथा मांगों को समायोजित करने की पूरी कोशिश की गई थी। मगर जिस तरह आंदोलनकारियों ने सरकार का प्रस्ताव खारिज किया, उससे ऐसा लगा, जैसे पहले से मन बना लिया गया था कि हमें प्रस्ताव मानना ही नहीं है।


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आम धारणा यही है कि सरकारें खुले मन से सामने आएं, तो किसी आंदोलन का अंत समझौते के साथ हो सकता है। अगर राजनीति को परे रखकर निष्पक्षता से देखें, तो मोदी सरकार खुले मन से सामने आई। जिनने प्रस्तावों को देखा है, वे स्वीकार करेंगे कि इसके बाद आंदोलन समाप्त हो जाना चाहिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी पर प्रस्ताव में साफ कहा गया कि सरकार लिखित भरोसा देने को तैयार है, एमएसपी खत्म नहीं होगा। बाजार समितियों की ओर से स्थापित मंडियों के कमजोर होने और किसानों के निजी मंडियों के चंगुल में फंसने की आशंकाओं के समाधान के लिए सरकार ने कानून में इस तरह संशोधन करने की बात कही है, जिनसे राज्य निजी मंडियों में भी निबंधन की व्यवस्था कर सके। हां, सरकार ने यह स्पष्टीकरण अवश्य दिया कि नए प्रावधान पुराने विकल्प को जारी रखते हुए किसानों को ज्यादा पैसा मिल सके और ज्यादा प्रतिस्पर्धा रहे, इसलिए अधिक विकल्प उपलब्ध कराएंगे। मंडी समितियों में और एमएसपी पर फसल बेचने के विकल्प भी बरकरार हैं। 

आंदोलनकारियों की शिकायत थी कि विवाद हो जाए, तो किसान सिविल कोर्ट नहीं जा सकते। सरकार का जवाब है कि 30 दिन में समस्या का हल हो, ऐसा प्रावधान किया गया है, सुलह बोर्ड के जरिये समझौते की भी व्यवस्था है। बावजूद संशोधन द्वारा सिविल कोर्ट जाने का विकल्प भी दिया जाएगा। किसानों की जमीन पर बड़े उद्योगपतियों द्वारा कब्जा कर लेने की शंका का तो कानून में कोई आधार ही नहीं है। कानून के अनुसार, खेती की जमीन की बिक्री, लीज और मॉर्टगेज पर करार नहीं हो सकता। जमीन कुर्क होने के भय के जवाब में प्रस्ताव में कृषि करार कानून की धारा 15 को उद्धृत किया गया है, जिसके अनुसार किसान की जमीन के विरुद्ध कोई वसूली या कुर्की नहीं की जा सकती है।

सवाल है कि सरकार के प्रस्ताव में आखिर कौन-सी बात गलत है? यह आम समझ से परे है कि जब सरकार स्पष्टीकरण दे रही है, उचित मांगों को स्वीकार कर कानून में संशोधन को तैयार है तो फिर समस्या कहां है? तीनों कानून रद्द करने की जिद का कोई नैतिक, व्यावहारिक और न्यायोचित आधार नहीं है। अनेक हलकों से मांग की जा रही थी कि कृषि को सशक्त करने तथा किसानों की प्रगति के लिए निजी क्षेत्र को निवेश करने का ढांचा उपलब्ध कराया जाए। आंदोलन में शामिल अनेक संगठन ऐसी मांग कर चुके हैं। जो पार्टियां सरकार का विरोध कर रही हैं, वे स्वयं इसके लिए कोशिश कर चुकी हैं। यूपीए सरकार के मंत्री तक इसकी वकालत और प्रयास करते रहे। उस समय के रिकॉर्ड भी सामने आ गए हैं। 

जाहिर है, इस आंदोलन के साथ राजनीति हो रही है। राष्ट्रपति से मिलने जाने वाले नेताओं को देख लीजिए। शरद पवार ने कृषि मंत्री रहते मुख्यमंत्रियों को इसके लिए पत्र लिखा और अब विरोध कर रहे हैं। वामपंथी राजनीति में विश्वास करने और उसके लिए काम करने वाले संगठनों के साथ इसमें ऐसे भी समूह हैं, जिन पर कई राज्य सरकारें संदेह प्रकट कर चुकीं हैं। इनके पैम्फलेट में आंदोलनों में गिरफ्तार किसानों के साथ एक्टिविस्टों, अधिवक्ताओं, छात्र नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि को रिहा करने की मांग है। ये लोग कौन हैं? साफ है कि आंदोलन किसान के नाम पर अवश्य है, इसमें पंजाब एवं हरियाणा के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का समूह है, किंतु यह पूरी तरह किसानों का आंदोलन नहीं है। किसान आंदोलनों के साथ यही दुर्भाग्य जुड़ा रहा है। हमेशा निहित स्वार्थी एवं राजनीतिक हित साधने वाले अगुवा बनकर नुकसान पहुंचाते रहे हैं और इस आंदोलन में भी यही हो रहा है।

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