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सुरक्षित रहे किसानों की आय
देविंदर शर्मा
Updated Sun, 24 Feb 2013 10:05 PM IST
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बीते हफ्ते कर्नाटक सरकार ने कृषि आय आयोग के गठन की घोषणा कर दी। इसके नियम व शर्तों को प्रतिपादित करना अभी बाकी है, लेकिन अगर इसे सही ढंग से अमल में लाया गया, और पंजाब में भी शुरू किया गया, तो यह भयावह संकट की चपेट में फंसी भारतीय कृषि की तस्वीर बदलने वाला होगा।
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प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ एम एस स्वामिनाथन को इसमें खूबियां दिखती हैं। उन्होंने कर्नाटक सरकार को दिए गए मेरे इस सुझाव का समर्थन किया और मुझे एक पत्र लिखा है, 'किसानों की आय में वास्तविक वृद्धि के जरिये उत्पादन संबंधी कृषि विकास से लेकर समग्र विकास को मापने के लिए राष्ट्रीय कृषक नीति में एक बड़े बदलाव की जरूरत है, जो वक्त की मांग है।'
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देश के हताश कृषक समुदाय की आय-सुरक्षा के बुनियादी मुद्दे को हल करने के लिए एक निकाय गठित करने की दिशा में अब राष्ट्र धीरे-धीरे जागृत हो रहा है। किसानों को आय मुहैया कराना अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है और ऐसा करके हम वास्तव में अर्थव्यवस्था को ही बढ़ावा दे रहे हैं।
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मेरी राय में आधुनिक खेती दो प्रकार से हो रही है। पहली पश्चिमी देशों में होने वाली उच्च सब्सिडी वाली खेती है और दूसरी, विकासशील देशों में जीविका के लिए की जाने वाली खेती। जीविका के लिए की जाने वाली खेती को राहत प्रदान करने का एक ही उपाय है, उसे प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्रदान करना, जैसा कि समृद्ध एवं औद्योगिक देशों में होता है।
पश्चिमी देशों और अपने देश के किसानों की जरा तुलना कीजिए। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, 1997 से 2008 के दस वर्षों के बीच करीब 2.40 लाख किसानों ने बढ़ते कर्ज के अपमान से बचने के लिए खुदकुशी की। अन्य 42 फीसदी किसान जीविका का कोई अन्य विकल्प मिलने की स्थिति में खेती छोड़ना चाहते हैं।
दूसरी ओर, अमेरिका में 1995 से 2009 के बीच किसानों को प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता देने के साथ 12.50 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई। यानी, जब हमारे किसान कर्ज के बोझ की चपेट में थे, अमेरिकी किसान घर बैठे मोटी सब्सिडी का चेक पा रहे थे। असल में यूरोप में किसानों को मिलने वाली आर्थिक सहायता बेहद आकर्षक है।
वहां के किसान सब्सिडी के रूप में प्रति हेक्टेयर 4,000 रुपये की नकद सहायता प्राप्त करते हैं। अकेले अनाज के मामले में यदि आप यूरोपीय संघ के 27 देशों की 2.2 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में 4,000 रुपये से गुणा करें, तो 90.40 लाख करोड़ रुपये का चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आता है।
ऐसे समय में जब दूसरी हरित क्रांति शुरू करने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं, अनुवांशिक रूप से संशोधित फसलों एवं कृषि व्यवसाय में लगी कंपनियों के हाथों बीज का नियंत्रण सौंपने वाले कड़े बौद्धिक संपदा कानूनों को प्रोत्साहित करने और किसानों को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई अनुबंध खेती, बड़े रिटेल स्टोर, कमोडिटी एक्सचेंज व वायदा कारोबार के लिए बाजार ढांचा तैयार करने जैसे तमाम उपाय वास्तव में उन कंपनियों को ही मोटा मुनाफा देंगे, जबकि किसान खाली जेब रहने को मजबूर होंगे। यदि यह सब व्यावहारिक और किसानों की आय बढ़ाने वाला था, तो कोई कारण नहीं है कि अमेरिकी एवं यूरोपीय सरकारें अपने छोटे से कृषक समुदाय को भारी सब्सिडी प्रदान करतीं, जिनमें से ज्यादातर हिस्सा नकद वित्तीय सहायता है।
पिछले 45 वर्षों से प्रमुख नौकरशाह एवं टेक्नोक्रैट किसानों से कहते आ रहे हैं कि वे जितना अन्न उगाएंगे, उतनी ही उनकी आमदनी बढ़ेगी। ऐसा कहते हुए वे वास्तव में किसानों की मदद नहीं करते, बल्कि उनके नाम पर कीटनाशक, उर्वरक, बीज, एवं यांत्रिक उपकरण बनाने वाली कंपनियों का व्यावसायिक हित साधते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि वर्ष 2003-04 में नेशनल सैंपल सर्वे संगठन ने एक कृषक परिवार की मासिक आमदनी 2,115 रुपये आंकी थी।
छठे वेतन आयोग के तहत सरकारी सेवाओं में कार्यरत एक चपरासी की मासिक आय 15,000 रुपये है। क्या एक राष्ट्र के रूप में हम किसानों को चपरासी के बराबर भी मासिक आमदनी देने के बारे में नहीं सोच सकते? अगर कृषि वास्तव में लाभप्रद थी, तो कोई कारण नहीं है कि इतनी संख्या में किसान आत्महत्या करते। यहां तक कि कृषि में अग्रणी पंजाब में भी प्रतिदिन दो किसान आत्महत्या करते हैं।
किसानों को यह यकीन दिलाया गया था कि वे जितनी लागत लगाएंगे, उन्हें उतना ही फायदा होगा। अब उन्हें बताया जा रहा है कि मुक्त बाजार (कमोडिटी एक्सचेंज, वायदा कारोबार और बड़े रिटेल स्टोर) खेती को लाभप्रद और आर्थिक रूप से समृद्ध बनाएगा। लेकिन जो उन्हें नहीं बताया जा रहा है, वह यह है कि यह अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों में भी कामयाब नहीं हुआ और इसलिए भारत में भी सफल नहीं होगा।
जरा देखिए कि एक गलत धारणा को किस आक्रामकता से देश में बढ़ाया जा रहा है। वायदा कारोबार एवं कमोडिटी एक्सचेंज के लाभार्थी किसान नहीं, बल्कि सट्टेबाज, कंस्लटेंसी कंपनियां एवं रेटिंग एजेंसियां होंगी। लेकिन यह किसानों के नाम पर हो रहा है। दूसरी ओर किसान संघों ने मात्र न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाने की मांग की है। उनमें से किसी ने भी नहीं सोचा कि देश में मुश्किल से 35 से 40 फीसदी किसान ही हैं, जो सरकारी खरीद मूल्य का लाभ उठा सकते हैं, क्योंकि उन्हीं के पास मंडियों में बेचने के लिए अनाज बचता है। कृषक समुदाय के बाकी लोग, जो बहुमत में हैं, वे खाने के लिए भी अन्न उपजाते हैं। अगर वे अपने लिए खाद्यान्न उत्पादन नहीं करेंगे, तो उतना अनाज आयात करना पड़ेगा। इसलिए उन्हें भी पर्याप्त मुआवजा दिया जाना चाहिए।