Farmers: किसान और उपभोक्ता, दशा और दिशा
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
आज 23 दिसंबर को 'राष्ट्रीय किसान दिवस' है, और कल, यानी 24 दिसंबर को 'वैश्विक उपभोक्ता दिन' होगा। इनके लगे हुए जुड़कर होने को महज संयोग न समझें, बल्कि इसमें निहित है महत्वपूर्ण संबोधन। इसे गहराई से समझना दिलचस्प बात है। स्वाधीनता मिली, तब 1950 में देश की खाद्यान्न उपज थी पांच करोड़ टन, उसे किसानी क्षेत्र ने इस साल तक 31 करोड़ टन के ऊपर पहुंचाने का अनोखा पराक्रम कर दिखाया। आज 142 करोड़ टन के पार पहुंची हुई महाकाय भारतीय आबादी का पेट भरने वाले इस क्षेत्र को वंदन! 142 करोड़ उपभोक्ताओं को हर रोज दिन में तीन बार, साल के 365 दिन, सालों-साल पेट पूजा करवाने का यह अनोखा काम करने वाले ये सारे अन्नदाता ही नहीं हैं, वरन अन्न-सुरक्षा-सेना के आदरणीय सैनिक हैं। किसान और उपभोक्ता का यह अटूट, बेजोड़, जीवंत नाता सारे देश के उपभोक्ताओं को समझना जरूरी है।
कोरोना के महासंकट में देश की विकास दर ऋण 23 फीसदी की खाई में कुछ समय गिर गई थी, तब देश की गिरती अर्थव्यवस्था को गोद में उठाकर लुढ़कने से बचाते हुए तीन फीसदी वृद्धि दर की ऑक्सीजन देने का काम कृषि क्षेत्र ने ही किया। इसलिए यह भी समझना चाहिए कि ऐसे दिव्य काम करने वाले कृषि क्षेत्र को किन चुनौतियां का सामना करना पड़ रहा है। किसान व खेतिहर श्रमिक दो प्रकार के जुल्मों से ग्रस्त और त्रस्त हैं। पहला जुल्म है, सुलतानी जुल्म। सरकारी नीतियों और बाजार की पद्धतियों का जुल्म। कृषि उपज की सस्ते दामों पर लूट की लत लग चुके बाजार के ग्राहकों का भी जुल्म।
इसका पहला सबूत : कृषि क्षेत्र ने उत्पादन तो छह गुने से अधिक कर दिया, लेकिन उसे क्या मिला? आजादी के समय जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान यानी हिस्सा जो कि 52 फीसदी था, उसे सापेक्ष मूल्य गिराकर सिर्फ 15-16 फीसदी के आसपास धकेल दिया। देश की आधी से अधिक आबादी खेती में खटती है, लेकिन उनके काम को और उद्यमिता को मुआवजा दिया जाता है सिर्फ 15-16 फीसदी। पहली पंचवर्षीय योजना में 1951-56 के वर्षों में नियोजित अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र को सरकार ने करीब 15 फीसदी हिस्सा दिया था, वह लगातार गिरते-गिराते अब कई वर्षों में उसे तीन से पांच फीसदी तक लुढ़का दिया गया है। यानी तीन से पांच गुना तक गिरावट। अगला सबूत : कृषि क्षेत्र के हाथ में थोप दिया है, एक झुनझुना कर्ज माफी का।
पिछले सात सालों में 11 लाख करोड़ रुपये के कर्ज माफ किए गए। यह माफी मुख्यतः व्यापार क्षेत्र को 28 फीसदी और उद्योग क्षेत्र को 65 फीसदी बहाल की गई; देश के अन्नदाता कृषि क्षेत्र के हिस्से सिर्फ सात प्रतिशत ही आए। उपभोक्तागण समझ लें, आम आदमी की आपकी बैंक बचतें और कर राशि किनके लिए निछावर की जाती है। मुट्ठी भर लूटकर चुटकी भर छूट देने की नीतियां बनाने वाली सरकारें, और उन्हें अमल में लाने वाली नौकरशाही और कर्मचारीगण के जुल्म भी मात देने वाले हैं। भुलावे में डालने वाले राजनेता भी पीछे नहीं हैं। अब भी कृषि उपजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) निर्धारण की प्रक्रिया में खेती के लागत खर्च आंकते समय कई प्रकार के छिपे खर्चों के मद चालाकी से हिसाब से बाहर रखे जाते हैं और सही-सही, परिपूर्ण, सर्व-समावेशक और रेम्युनरेटिव मूल्य निर्धारण नहीं किया जाता है।
अनेक कृषि-विश्वविद्यालयों, सरकारी संस्थानों, विशेषज्ञों और स्वामीनाथन आयोग ने सरकार को स्पष्ट रूप से बताया है कि किसानों का असली उत्पादन लागत खर्च ही एमएसपी से डेढ़ गुना है। इस असली डेढ़ गुना लागत खर्च पर और आगे 50 फीसदी फायदा जोड़कर एमएसपी आंका गया हो, ऐसा मूल्य किसान को मिलना चाहिए। लेकिन मौजूदा हालात उल्टे हैं। दूसरा जुल्म है, आसमानी जुल्म। आसमान की मनमानी पहले भी किसान झेलते रहे, लेकिन वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संकट के कारण अब यह पहलू कई गुना तीखा हो गया है, प्रति वर्ष बढ़ता ही जा रहा है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटिऑरालाजी (आईआईटीएम) के नए नतीजे हैं कि आजादी मिलने के बाद पहले साठ वर्षों (1950 से 2011) की तुलना में पिछले 30 वर्षों में खेती क्षेत्र के लिए तबाही 41 फीसदी बढ़ गई है, कुछ प्रदेशों में तो वह पचास फीसदी तक बढ़ गई है। यानी अब हर दो साल में एक साल प्रतिकूल मौसम रहता है। प्रिय उपभोक्तागण, ऐसी कगार पर अन्नदाता खड़ा है, इस बात की अहमियत और विनाशकारी अवदशा को जानिए।
दिशा कैसी हो? पिछले चालीस वर्षों के हमारे कार्य और चिंतन से मिले नतीजे ये हैं- एक : राज्यसत्ता और अर्थसत्ता की नीतियों के कारण चलने वाले अर्थचक्र की इस अन्यायमूलक चाल की दिशा पर अनुकूल प्रभाव और बदलाव जरूरी हैं- तात्कालिक दिखावे की आतिशबाजी के भुलावे नहीं। दो : खेतों की मेड़ों के बाहर इन नीतिगत बदलावों के अलावा मेड़ों के अंदर किसानी की तकनीकें और तरीकों में भी बदलाव हों। इकहरी फसल (मोनोक्रापिंग) की जगह बहुफसली, शाश्वतता पुष्ट करने वाली पर्यावरणीय खेती यह सही दिशा है। यह सारी पद्धति वैज्ञानिक तथ्यों, आंकड़ों और प्रदर्शनों द्वारा पिछले 15 साल से आज भी लगातार साबित कर दिखाई गई है। देखने के लिए खुला निमंत्रण है। हरित क्रांति के आगे अब यह सदा-हरित क्रांति की दिशा और पद्धति है। तीन ः खेती के लिए नीतियां और तकनीकों की मार्गदर्शक पंचसूत्री जरूरी है- उत्पादकता, लाभप्रदता, स्थिरता, शाश्वतता और जीवन स्तर की गुणवत्ता।
याद रहे कि कृषि पद्धतियां ऐसी हों, जिससे सबको विषमुक्त और स्वास्थ्यवर्धक खाद्य सदा के लिए मिले। उपभोक्ता संवेदनशीलता से उत्पादक अन्नदाता की परिस्थितियों को समझें और ये दोनों कंधे से कंधा मिलाकर चलें; इस प्रकार 'दोनों की भलाई में ही दोनों की भलाई' है। उत्पादक किसान प्रोड्यूसर, और उपभोक्ता कंज्यूमर, इन दोनों की मिलकर 'प्रोज्यूमर' तरह की संकल्पना मैं एक नए गहरे अर्थ से प्रस्तुत कर रहा हूं। विकास के कई वैश्विक सूचकांकों (मानव विकास, भुखमरी-कुपोषण, स्वास्थ्य, खुशहाली) में भारत का स्थान बहुत नीचे वालों में भी नीचे है। उत्पादक का हित संभालने में उपभोक्ता का हितैक्य है, यह बात इन सूचकांकों में भी जुड़ी हुई है। उपभोक्ता का हर नोट एक वोट है; इस शक्ति से किसान के सशक्तीकरण में योगदान होगा। आपका फैमिली-डॉक्टर तो है, वैसे ही अपना फैमिली-फार्मर भी हो।
-कृषि वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता।