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जात-पात के भेदभाव से दूर

Wed, 18 Sep 2013 08:01 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Wed, 18 Sep 2013 08:01 PM IST
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far from from discrimination of caste

दलित जाति में पैदा हुए रविदास परम विरक्त और भगवद्भक्त थे। संतोष और भक्ति को वह सच्चा धन मानते थे। काशी के विख्यात संत स्वामी रामानंद ने उन्हें दीक्षा देते समय आशीर्वाद दिया था, भक्ति के क्षेत्र में तो तुम शिखर पर पहुंचोगे ही, तुम्हारे लिखे पदों से असंख्य लोग प्रेरणा लेकर जीवन सार्थक करेंगे। आगे चलकर रविदास जी ने कई भक्ति पदों की रचना की।

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संत रविदास अपने प्रवचन और पदों के माध्यम से सदाचार और नैतिकता की प्रेरणा दिया करते थे। वह कहा करते थे कि भगवान की कृपा उसे प्राप्त होती है, जिसका हृदय लोभ, लालच और अन्य दुर्व्यसनों से मुक्त होकर पवित्र बन जाता है।
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एक बार काशी में कुछ संत उनके सत्संग के लिए पहुंचे। किसी ने पूछ लिया, संत की पहचान किस गुण से होती है। क्या संत ऊंची जाति का ही होता है। संत रविदास ने बताया, संतन के मन होत है, सबके हित की बात। घट-घट देखे अलख को, पूछे जात न पात।। यानी सच्चा संत वही है, जो सबके कल्याण की बात सोचता है, जो जात-पात के भेदभाव से दूर रहकर प्राणी मात्र में, सब जगह भगवान के दर्शन करता है।
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संत रविदास ने एक जगह लिखा है- रविदास जन्म के कारनै, होत न कोऊ नीच। नर को नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच।। यानी, जन्म के कारण कोई ऊंच-नीच नहीं होता। बुरा कर्म ही व्यक्ति को नीच बनाता है।

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