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कटुता फैलाते हैं झूठे आरोप

के जी सुरेश Updated Thu, 02 Apr 2015 08:18 PM IST
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false allegations spread Bitterness

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ईसाई समुदाय पर हुए हमलों पर मचे हंगामे के बाद बुद्धिजीवियों और मीडिया के कुछ तबकों में अचानक एक गहरी चुप्पी छा गई, जो अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाने के लिए केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी के साथ संघ परिवार की आलोचना कर रहे थे। जाहिरा तौर पर यह चुप्पी उस नवीनतम खुलासे का नतीजा है, जिसमें बताया गया है कि विगत 14 मार्च को पश्चिम बंगाल के रानाघाट में एक नन के साथ हुई दुर्घटना के ज्यादातर अभियुक्त बांग्लादेशी मूल के थे और उस मामले से भाजपा या किसी हिंदूवादी संगठन का कोई लेना-देना नहीं था।
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समाज के किसी भी समुदाय के खिलाफ हिंसक घटनाओं की निंदा की जानी चाहिए। कोई भी सभ्य सरकार, जिसने सांविधानिक मूल्यों को बनाए रखने की शपथ ली है, इसे बर्दाश्त नहीं कर सकती। पर समस्या तब होती है, जब ऐसे हमलों के जवाब न केवल क्रूरतापूर्वक, बल्कि राजनीति से प्रेरित होकर दिए जाते हैं। अगर सरकार के आलोचक इन हमलों में एक 'पैटर्न' देखते हैं, तो जवाबी पैटर्न भी किसी से छिपा नहीं है। मसलन, हरियाणा में जिस ढांचे को कथित तौर पर अपवित्र किए जाने का आरोप लगा, उसकी वैधता पर विचार किए बिना कुछ बिंदु जरूर गौरतलब हैं। मसलन, क्या ऐसे किसी भवन को चर्च, मस्जिद, मंदिर या गुरुद्वारा कहा जा सकता है, जहां प्रार्थना, पूजा या उपासना न की जाती हो? सनातन धर्म के प्रति मेरी समझ के मुताबिक, एक मंदिर तभी मंदिर बनता है, जब उसमें प्राण-प्रतिष्ठा होती है या मूर्तियों का अभिषेक होता है; सिर्फ मूर्तियों की स्थापना से वह मंदिर नहीं बन जाता। इस तरह तो शनिवार के दिन उत्तर भारत में सड़कों के किनारे शनिदेव के नाम पर रखा गया तेल का हर टीन एक मंदिर बन जाएगा। हरियाणा के हिसार जिले में ईंट और गारे के उस ढांचे का निर्माण संभवतः एक धार्मिक स्थल के उद्देश्य से किया गया हो। वहां रखे क्रॉस को हटाना निश्चित रूप से अस्वीकार्य है, पर इस घटना को चर्च पर हमले के रूप में जिस तरह दिखाया गया, उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। ऐसे झूठे आरोप समाज में कटुता फैलाते हैं।

इस मामले में हमारे बुद्धिजीवियों की निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता कहां गई, जो हमें सिखाते हैं कि घटनाओं को अलग करके नहीं देखना चाहिए? रानाघाट में नन से बलात्कार एक घृणित काम था। पर क्या कानून-व्यवस्था राज्य का मामला नहीं है? अगर खट्टर सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह हरियाणा में बन रहे सभी भवनों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे, तो क्या ममता बनर्जी सरकार को इसका दोष नहीं दिया जा सकता कि वह एक बुजुर्ग महिला की रक्षा करने में विफल रही? क्या यह सच नहीं है कि पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति दिनोंदिन खराब होती जा रही है?
भाजपा चाहे सत्ता में हो या विपक्ष में, उसे और संघ परिवार को निशाना बनाने का एक पैटर्न उभर रहा है। जहां भाजपा सत्ता में है,वहां आरोप लगाया जाता है कि वह अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रही है, और जहां वह विपक्ष में है, वहां उस पर सत्ता के लिए ध्रुवीकरण करने का आरोप लगाया जाता है। नेल्ली से लेकर हाशिमपुरा तक और भागलपुर से लेकर दिल्ली में 1984 तक जितने भी नरसंहार देश में हुए, तब न तो भाजपा सत्ता में थी और न ही उसकी पूर्ववर्ती जनसंघ। राष्ट्र यह जानना चाहता है कि तब किसने वे दंगे कराए और क्यों? दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले आप के कार्यकर्ता ईसाइयों के एक विरोध प्रदर्शन में आगे-आगे क्यों चल रहे थे? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सरकार को बदनाम करने के लिए चर्चों पर हमले को अंजाम दिया गया हो? अन्यथा, कोई भी समझदार सरकार क्यों ऐसे बकवास की इजाजत देगी? हिंदुओं के मानस को जानने वाले समझ सकते हैं कि ऐसी घटनाओं से एकजुट होने के बजाय उदार हिंदू उन संगठनों से विमुख होते हैं, जिन पर ऐसी घटनाओं को अंजाम देने का आरोप लगता है।
इस बहस को एक और दिलचस्प आयाम की तरफ धकेल दिया गया। संघ प्रमुख मोहन भागवत के मदर टेरेसा से संबंधित बयान पर एक बड़े टेलीविजन शो पर चर्चा के दौरान कैथोलिक चर्च के जाने-माने प्रवक्ता ने अपने प्रशंसकों को तब हैरान कर दिया, जब उन्होंने पूरे हिंदू समुदाय की आलोचना करते हुए कहा कि उसके 'अप्रिय' कर्म सिद्धांत के कारण बहुसंख्यक हिंदू गरीबी और भूख से जूझते हैं। उनकी उस टिप्पणी न केवल बहस में हिस्सा लेने वाले हिंदू पैनलिस्टों को तीखी प्रतिक्रिया के लिए उकसाया, बल्कि एंकर को भी, जिसने ईसाई पादरी की इस टिप्पणी को खारिज कर दिया, कि हिंदू सामाजिक कार्य नहीं करते।
यहां सबसे बड़ा मुद्दा जान-बूझकर या अज्ञानतावश इस मिथक को बनाए रखने का है कि हिंदू बहुत ज्यादा भौतिकवादी होते हैं, जबकि हिंदू संगठन केवल आध्यात्मिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं और उन्हें व्यापक समाज की चिंता कम रहती है, जो कि सच के विपरीत है। इसे कुछ हद तक धर्मांतरण को जायज ठहराने के लिए भी प्रतिपादित किया जाता है, जब कई शिक्षित हिंदू स्वयं ही कहते हैं, कि यदि हिंदू समुदाय अपने लोगों की देखभाल नहीं करता, तो फिर ईसाइयों को दोष देने का क्या मतलब है? क्या वास्तव में हिंदू अपने लोगों की उपेक्षा करते हैं या यह केवल दुष्प्रचार है? सच यह है कि जिस संघ को भाजपा का रिमोट कंट्रोल कहा जाता है, वह 1,40,000 से अधिक सेवा की योजनाएं चलाता है। आर्य समाज 24,000 से भी अधिक शैक्षिक संस्थाएं चलाता है। सत्य साईं ऑर्गेनाइजेशन दुर्गम गांवों में गरीबों और जरूरतमंदों को मुफ्त में राशन बांटता है, जबकि माता अमृतानंदमयी मठ तमिलनाडु से लेकर उत्तराखंड तक प्राकृतिक दुर्योगों से प्रभावित लोगों को मुफ्त आवास मुहैया कराता है। पर दुर्भाग्य से कोलकाता में कुष्ठ रोगियों की सेवा करने वाली साड़ी पहनने वाली एक दिवंगत श्वेत मिशनरी महिला ही ज्यादातर खबरों में बनी रही, क्योंकि पश्चिमी मीडिया हमारी सोच को गहरे रूप से प्रभावित करता है।
यही वक्त है, जब एक राष्ट्र के रूप में हमें अपने दोहरे मापदंड को त्यागना चाहिए और घटनाओं को किसी खास चश्मे से देखने के बजाय वस्तुनिष्ठता के साथ उसे देखना चाहिए।

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