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क्यों निकल गई तीसरे मोर्चे की हवा?

Fri, 28 Mar 2014 06:50 PM IST
के जी सुरेश
के जी सुरेश Updated Fri, 28 Mar 2014 06:50 PM IST
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failure of third front

कथित तीसरे विकल्प के लिए सहयोगी दलों के साथ दिल्ली में भव्य एकजुटता प्रदर्शन के कुछ ही दिनों बाद भाकपा के पूर्व महासचिव ए बी बर्धन ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान स्वीकार किया कि वाम मोर्चा ने लोकसभा चुनाव से पहले तीसरे मोर्चे के गठन की जो कोशिश की, वह एक बड़ी भूल थी। बर्धन की इस स्वीकारोक्ति की मुख्य वजह यह है कि वाम मोर्चा और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की पार्टी अन्नाद्रमुक के बीच बहुचर्चित गठजोड़ घोषणा के कुछ ही दिनों के भीतर टूट गया। इसके अलावा समाजवादी पार्टी ने भी वामपंथी दलों के साथ उत्तर प्रदेश में सीटों का बंटवारा करने से इन्कार कर दिया।

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25 फरवरी को दिल्ली में वाम दल, अन्नाद्रमुक, समाजवादी पार्टी, जदयू और जद-एस के बड़े नेताओं ने साझा कार्यक्रम चार्टर की रूपरेखा तैयार करने के लिए बैठक की थी, जिसके बाद माकपा नेता प्रकाश कारत ने कहा था कि 11 गैर-संप्रग, गैर-राजग पार्टियां संप्रग को हराने और भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगी। विडंबना देखिए कि जिस सपा नेता मुलायम सिंह ने इस गठबंधन के लिए पहल की थी, वह न तो सोनिया गांधी और न ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ अपना कोई उम्मीदवार खड़ा करेंगे।
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पिछले आम चुनाव से पहले पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा ने ऐसी ही पहल की थी। पर जैसे ही चुनाव परिणाम आने लगे, देवगौड़ा के बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी यूपीए-दो को अपनी पार्टी का समर्थन आगे भी जारी रखने के लिए चुपके से 10 जनपथ पहुंच गए थे। साफ है, 2009 की विफलता से सबक नहीं लिया गया। ऐसे में स्वाभाविक है कि आलोचक तीसरे मोर्चे के विचार को अव्यावहारिक और 'बरसाती मेंढक' बताते हैं, जो केवल चुनावों के दौरान दिखाई देता है।
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अमेरिका और ब्रिटेन की तरह हमारे यहां भी दो दलीय प्रणाली की वकालत की जाती है, मगर भारत में भौगोलिक, क्षेत्रीय, धार्मिक, भाषायी तथा जाति के आधार पर काफी विविधताएं हैं। असल में तथाकथित राष्ट्रीय दलों के लोगों की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतरने के कारण ही क्षेत्रीय दल उभरे हैं। इन दलों में कांग्रेस और भाजपा, दोनों का विकल्प प्रदान करने की क्षमता है। ये पार्टियां अपने क्षेत्रीय अनुभवों को राष्ट्रीय स्तर पर लागू कर सकती हैं। साथ ही विकास पद्धति को नीचे से ऊपर की ओर लागू कर सकती हैं, जो अभी तक ऊपर से नीचे की ओर विकास पद्धति से प्रेरित है। हालांकि सुरक्षा, विदेशी मामले, उग्रवाद, आतंकवाद एवं नक्सलवाद से निपटने के लिए एक मजबूत केंद्र सरकार का होना जरूरी है, साथ ही योजना एवं विकास प्रक्रिया के विकेंद्रीकरण की जरूरत है। ऐसे में छोटे दल संविधान में वर्णित संघीय ढांचे को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं। जिस तरह राष्ट्रीय पार्टियां अक्सर वंचित तबके को नजरंदाज करती हैं, तीसरा मोर्चा उन बेआवाज तबकों को भी आवाज दे सकता है।


अतीत में कई नामों से बने तीसरे मोर्चे (वीपी सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा सरकार, देवगौड़ा और आई के गुजराल के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार) ने कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की हैं। भ्रष्टाचार के मामले में वामपंथी पार्टियों की छवि अन्य दलों के मुकाबले ज्यादा स्वच्छ है। यूपीए-एक सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वाम दलों ने मजदूरों, किसानों और यहां तक कि व्यापारियों के अधिकारों के संरक्षण तथा विदेश नीति पर अमेरिकी प्रभाव को रोकने के लिए सरकार पर भारी दवाब बनाए रखा था।

जाहिर है, भारतीय लोकतंत्र में तीसरे विकल्प के लिए पर्याप्त जगह है, लेकिन वह तब तक कारगर नहीं हो सकता, जब तक कि वह ठोस कार्यक्रम लेकर सामने न आए।

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