फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   history should become history

इतिहास को इतिहास रहने दें

Sun, 10 Aug 2014 07:25 PM IST
दीपांकर गुप्त
दीपांकर गुप्त Updated Sun, 10 Aug 2014 07:25 PM IST
विज्ञापन
history should become history

अभी नई सरकार को सत्ता संभाले ज्यादा वक्त नहीं हुआ है। ऐसे में इतिहास, साहित्य, शिक्षा आदि से जुड़ी सार्वजनिक संस्थाओं में जैसे लोगों की नियुक्ति वह कर रही है, वह चिंताजनक है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के अध्यक्ष पद पर वाई सुदर्शन राव की नियुक्ति ऐसा ही कदम है। काबिल इतिहासकार इस देश में कम नहीं हैं। लेकिन आईसीएचआर की अध्यक्षता के लिए राव का नाम ही सूझा? भाजपा की विचारधारा से जुड़ाव के अलावा उनकी और किसी योग्यता पर विचार किया गया होगा, इसमें संदेह है।

विज्ञापन


सरकार बदलने पर सरकारी संस्थाओं में अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों की नियुक्ति अपने यहां कोई नई बात नहीं है। पहले भी ऐसा होता आया है। मगर शिक्षा तंत्र में इस तरह के बदलाव इसलिए उचित नहीं हैं, क्योंकि इससे गलत संदेश जाता है। इससे यही मालूम होता है कि इस देश में शिक्षा का कोई संस्थागत ढांचा अब तक विकसित ही नहीं हो पाया है। इस तरह के फैसलों से पूरी की पूरी शिक्षा प्रणाली ही विचारधारात्मक बन जाती है। फिर इससे देश के नौनिहालों को बौद्धिक स्तर पर जो नुकसान उठाना पड़ता है, उसकी भरपाई कौन करेगा? इतिहास से ऐसी छेड़खानी बेहद खतरनाक साबित होती है, क्योंकि इतिहास एक ऐसा विषय है, जो खुद काफी हद तक विचारधारा पर ही आधारित है। इतिहास की अपनी एक प्रक्रिया होती है, जिसका पालन होना ही चाहिए। इतिहास में हम यह नहीं कह सकते कि फलां चीज हम तो मानते हैं, आप मानो या न मानो।
विज्ञापन


मसलन, रसायन विज्ञान में हम पढ़ते हैं कि हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन के एक परमाणु से मिलकर पानी बनता है, और इसका एक निश्चित रासायनिक फॉर्मूला (एच टू ओ) भी होता है। कोई यह नहीं कह सकता कि पानी के इस फॉर्मूले को हम स्वीकार नहीं करते। चाहे पानी का रासायनिक सूत्र हो या विज्ञान के दूसरे नियम, हम इन्हें मानने के लिए बाध्य हैं। यही बात ज्ञान की हर शाखा पर लागू होनी चाहिए। अचानक एक दिन आप यह नहीं कह सकते कि इतिहास में जो कुछ लिखा गया है, वह गलत है, इसलिए हम अपना अलग इतिहास लिखेंगे। इतिहास ऐसा होना चाहिए, जिस पर कमोबेश सबकी स्वीकृति हो। वास्तविक ज्ञान वह है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति प्राप्त हो। दूसरे शब्दों में कहें, तो ज्ञान सार्वभौमिक होना चाहिए। यही वास्तविक ज्ञान का लक्षण भी है। मगर अपने देश में ऐसा नहीं होता। हमारे यहां जब सरकार बदलती है, तो सांविधानिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और बौद्धिक संगठनों के प्रमुख बदल दिए जाते हैं, और ज्यादातर इनमें ऐसे लोगों की नियुक्ति होती है, जो सत्तारूढ़ दल की विचारधारा की तरफ झुकाव रखते हों।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह सच है कि भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद पर मार्क्सवादी इतिहासकारों का वर्चस्व रहा है। मार्क्सवादियों ने जो इतिहास लिखा, वह बौद्धिक विश्लेषण पर आधारित था। ऐसा नहीं है कि उनके इतिहास लेखन में कमियां नहीं थीं। कई बिंदुओं पर उनके इतिहास लेखन से मेरी भी आपत्ति है, मगर उन कमियों का विरोध जताने और उन्हें दूर करने की भी एक इतिहाससम्मत प्रक्रिया होनी चाहिए। केवल अपनी विचारधारा के व्यक्ति को सांस्कृतिक संस्थानों का प्रमुख बना देने भर से यह कमी दूर नहीं होगी।

इसी तरह शिक्षा में स्वदेशीकरण की बात की जा रही है, दीनानाथ बत्रा जिसके अगुआ हैं। हिंदू संस्कृति पर लिखी उनकी पाठ्यपुस्तकें गुजरात के स्कूलों में लागू हो चुकी हैं। हिंदू संस्कृति में सकारात्मक चीजें हैं। पर सवाल यह है कि ज्ञान में हम आगे जाएंगे, वैज्ञानिक नजरिया अपनाएंगे या पीछे जाकर ऐसे तथ्यों पर भरोसा करेंगे, जिनका ऐतिहासिक आधार नहीं है। यह समझ लेना होगा कि हिंदू संस्कृति व परंपरा तथा इतिहास दो अलग-अलग चीजें हैं। धर्म-संस्कृति को इतिहास से जोड़ना कतई सही नहीं। अब रामायण को ही लें। इस पर आज तक कितना कुछ लिखा गया है। इतिहास को लेकर खींचतान की कोशिश कर रहे लोगों को समझना चाहिए कि रामायण-महाभारत पर बात करना गलत नहीं, पर तब उसकी ऐतिहासिकता, उसके दस्तावेजीकरण पर भी बात होगी। मेरा मानना है कि रामायण और महाभारत को रामायण-महाभारत ही रहने देना चाहिए, उन्हें इतिहास बनाने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। धर्मग्रंथ के तौर पर वे ठीक हैं। उनसे नैतिक शिक्षा भी प्राप्त की जा सकती है। पर उन्हीं के आधार पर इतिहास लिखने और गढ़ने की बात अलग है। धर्म को लेकर हर व्यक्ति की कुछ सोच हो सकती है, मगर उसे सार्वभौमिक बनाने की कोशिश को स्वीकार नहीं किया जा सकता। जो इतिहास की प्रक्रिया है, धर्म उससे बिल्कुल अलग है। इतिहास उनका होता है, जो जीते हैं, और मरते हैं। जबकि धर्म का मूल्य किसी और स्तर पर होता है। दरअसल धार्मिक मूल्य ऐतिहासिक मूल्यों से अलग होते हैं। धर्म लोगों की आस्था और भरोसे से जुड़ा है। हमें धर्म और इतिहास के बीच के फर्क को समझना ही होगा।


धर्म से लोगों को भरोसा और कठिन परिस्थितियों से निपटने की ताकत मिलती है। वैसे भी, जो विषय लोगों के विश्वास से जुड़े होते हैं, उनमें न तो कोई तर्क काम आता है, और न ही कोई वैज्ञानिक प्रक्रिया। ऐसे में इतिहास की धार्मिक आधार पर पुनर्व्याख्या के प्रयास को उचित नहीं माना जा सकता। धर्म को इतिहास में लाने की कोशिश का मतलब है कि आप धर्म को नीचे ला रहे हैं और इतिहास का भी कुछ भला नहीं कर रहे।

(प्रोफेसर एवं निदेशक, सेंटर फॉर पब्लिक अफेयर्स ऐंड क्रिटिकल थ्योरी, शिव नडार यूनिवर्सिटी)

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed