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सबको देखा मगर अपने अंदर नहीं देखा
हंसराज हंस
Updated Sat, 06 Apr 2013 11:29 PM IST
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सूफी अंदर से महसूस करने की चीज थी, दिखने की चीज हो गई और अब बिकने की चीज है। सूफी लिबास, सूफी आवाज, सूफीयाना चेहरे, सूफी संगीत और न जाने क्या-क्या। ये हिंदुस्तान का सूफी, वो पाकिस्तान का सूफी! सच कहूं तो इस सूफी शब्द ने एक नए किस्म के सांस्कृतिक भ्रम के मोड़ पर सबको खड़ा कर दिया है।
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हम सूफी के मूल स्वर को भूलते जा रहे हैं। हमारे यहां लोग सूफी गीत-संगीत पसंद करते हैं, मगर सोचते हैं कि यह सूफी धारा पाकिस्तान से बहकर हिंदुस्तान आ रही है। लोग भूल जाते हैं अजमेर शरीफ और दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह के बारे में, जहां से निकली सूफी संगीत की धारा दुनिया भर के संगीत प्रेमियों को भिगोती रही है। लोग भूल जाते हैं कि हिंदुस्तान में भी सूफी गाने वाले हैं।
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लोग भूल जाते हैं कि सूफी की जड़ें, उसकी नींव, यहीं से जुड़ी है। शायद लोगों को भूलने पर मजबूर कर दिया जाता है। इसकी वजह भी है। जितने भी सूफी गायकों का हम जिक्र करते हैं जैसे नुसरत फतेह अली खान साहब, आबिदा परवीन, सलामत अली खान और नजाकत अली खान, वह सब पकिस्तान से ही आते हैं। जानने वाली बात यह है कि ये लोग विभाजन के दौरान हिंदुस्तान से ही पाकिस्तान गए हैं। इनकी जड़ें मूल रूप से हिंदुस्तान की ही हैं।
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सूफी का सबसे बड़ा केंद्र भी हिंदुस्तान की दरगाहों से ही बनता है। वैसे तो जो भी सूफी को समझता है वह सरहद, मजहब या देश की सीमा में नहीं बंधता। लेकिन एक कलाकार होने के नाते मुझे यह टीस जरूर होती है कि हिंदुस्तान ने अपने ही सूफी गायकों को बेगाना सा कर दिया है।
एक बात यह भी है कि बाहर की चीज हमेशा ही ज्यादा आकर्षित करती है। इसलिए चाहे यहां का मीडिया हो या फिल्म इंडस्ट्री, वह पाकिस्तान के गायकों को यहां बुलाते हैं, उनसे गवाते हैं। जबकि आप इंटरनेट पर देखें तो पाकिस्तान में सबसे ज्यादा मुझे गाने के लिए बुलाया जाता है।
यह सब होना चाहिए, लेकिन दुनिया में यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि हमारे यहां सूफी संगीत पर काम नहीं हो रहा या यहां के कलाकारों में कोई कमी है। मैं तो चाहता हूं कि पूरी दुनिया में इसका प्रचार हो और दुनिया भर से लोग इस कला को सीखें। पाकिस्तान में मीडिया, टीवी और फिल्म इंडस्ट्री हर स्तर पर वहां के सूफी कलाकारों को प्रमोट किया जाता है।
उन्हें पूरा वक्त दिया जाता है कि वह इस संगीत पर काम कर सकें। लेकिन हमारे यहां इन दिनों व्यावसायिकता ज्यादा हावी होती नजर आ रही है। अगर हौसला अफजाई की जाए तो यहां भी बरकत सिद्धु, वडाली ब्रदर्स जैसे गायक हैं, जो बेहतरीन सूफी कलाम गाते हैं।
अपने बारे में ज्यादा कुछ नहीं कह सकता, लेकिन एक बार राहत फतेह अली खान ने खुद एक रियलिटी शो में कहा था कि नुसरत साहब हमेशा अपनी गाड़ी में हंसराज हंस के गाने सुनते हैं। उन्होंने अपनी फिल्म ‘कच्चे धागे’ में मुझसे गवाया भी। अभी पिछले दिनों भी ‘मौसम’ फिल्म में एक गाना गाया था।
जब भी मुंबई वाले बुलाते हैं मैं प्यार से चला जाता हूं, लेकिन फिल्मों में भी मैं हमेशा सूफी ही गाता हूं। एक बार मैंने टोटे-टोटे गाना गाया था। इस गाने से मुझे कमर्शियली बहुत प्रचार मिला, लेकिन इसे गाने के पीछे भी वजह यही थी कि इस गाने में भी संदेश था, ‘न नशा करो न वार करो, करना है अगर तो प्यार करो’। मकसद यही है कि अपने काम के जरिये संदेश दिया जा सके।
तड़क-भड़क वाले संगीत के लिए बहुत लोग हैं, लेकिन सूफी के लिए बहुत कम। इसलिए अब सिर्फ इसी के प्रचार में लगा हूं। बचपन से ही सूफी कलाम सुने, सूफी ही सीखा, सूफी ही गाया और अब आगे भी इसी के प्रचार की चाहत है। इन दिनों भी फाइव स्टार होटल से लेकर दरगाहों तक सूफी गा रहा हूं।
बस यही संदेश देना चाहता हूं कि फिल्में दुनिया तक संदेश पहुंचाने का बहुत बड़ा माध्यम हैं, इसलिए फिल्मवालों को हिंदुस्तानी सूफी गायकों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कहते हैं न ‘दरिया देखे मगर समंदर नहीं देखा, तूने झांककर अपने अंदर नहीं देखा’।