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चिंता की बात : जलवायु संकट के हालात में आर्थिक जरूरतों को पर्यावरणीय स्थिरता के साथ संतुलित करने की चुनौती

Mon, 17 Apr 2023 07:18 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Mon, 17 Apr 2023 07:18 AM IST
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सार
जैसे-जैसे देश के बड़े हिस्से में पारा चढ़ता जा रहा है, बिजली को लेकर व्यापक चिंता शुरू हुई है। सरकार ने इस महीने से कोयले व तेल से चलने वाले जेनरेटरों को पूरी शक्ति से चलाने का आदेश दिया है, जिसका अर्थ है आर्थिक जरूरतों को पर्यावरणीय स्थिरता के साथ संतुलित करने की चुनौती।
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Everyone knows that the climate fight will not succeed without India
जलवायु संकट का असर (सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : Pixabay

विस्तार

हर कोई यह जानता है कि जलवायु की लड़ाई भारत के बिना सफल नहीं होगी। हर कोई यह भी जानता है कि 1.4 अरब नागरिकों (जिन्हें ऊर्जा की जरूरत है) के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने के नाते हमें जीवाश्म ईंधन से खुद को दूर करते हुए मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।



आने वाले दिनों में यह कटु सत्य और बेरहम होगा। हो सकता है कि इसको लेकर कठिन संवादों की भी जरूरत पड़े-न केवल समृद्ध देशों या ग्लोबल नॉर्थ में, जो इस गड़बड़ी के लिए बड़ी जिम्मेदारी वहन करते हैं, बल्कि भारत के भीतर भी। उदाहरण के लिए, अमेरिका ने आज तक किसी भी दूसरे देश की तुलना में अधिक कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन किया है। 1950 तक आधे से अधिक वैश्विक कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन यूरोप से हो रहा था। पिछले केवल 50 वर्षों में ही दक्षिण अमेरिका, एशिया और अफ्रीका में विकास ने इन क्षेत्रों के कुल योगदान में बढ़ोतरी की है।


लेकिन यह भी सच है कि भारत  ग्रीनहाउस गैसों का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है, बावजूद इसके कि यहां प्रति व्यक्ति उत्सर्जन तुलनात्मक रूप से कम है और गरीबों में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत अमीरों या यहां तक कि मध्यम वर्ग की प्रति व्यक्ति बिजली खपत के समान नहीं है। बिजली संकट के इस दौर में किसकी जरूरतों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए-शहर या गांव की, किसानों या उद्योगों की जरूरतों को? उन सभी की मांगें प्रतिस्पर्धी हैं। तापमान बढ़ते ही बिजली की खपत भी बढ़ रही है।

केरल में पहली बार दैनिक बिजली की खपत 10 करोड़ यूनिट का आंकड़ा पार कर गई है, क्योंकि अप्रैल में गर्मी का तापमान उच्च रहता है। 13 अप्रैल को केरल की दैनिक ऊर्जा खपत 10.3 करोड़ यूनिट थी, जिसने एक दिन पहले 9.84 करोड़ यूनिट के पिछले रिकॉर्ड को तोड़ दिया था। केरल राज्य विद्युत बोर्ड (केएसईबी) अगले सप्ताह बिजली की स्थिति की समीक्षा करने वाला है। यह भारत के मात्र एक राज्य का उदाहरण है, पर यह देश के समक्ष आनेवाली बड़ी चुनौतियों का आभास देता है, क्योंकि यह ऊर्जा परिवर्तन से जूझ रहा है। और 2070 तक नेट जीरो तक पहुंचने या कार्बन तटस्थ होने और ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी न करने के साथ यह आर्थिक विकास लक्ष्यों को संतुलित कर रहा है।

जैसे-जैसे देश के बड़े हिस्से में पारा चढ़ता जा रहा है, और अत्यधिक गर्मी के पूर्वानुमान लगाए गए हैं, बिजली को लेकर व्यापक चिंताएं हैं। पिछले साल, जब भारत चिलचिलाती लू की चपेट में था, तो देश में बिजली गुल हो गई थी। इसका कारण था-एसी का बढ़ता इस्तेमाल; कोविड के बाद अर्थव्यवस्था के खुलने से बिजली की मांग में वृद्धि; और यूक्रेन पर रूस के हमले के चलते कोयले की कमी, जिससे अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति बाधित हुई और कीमतें बढ़ीं।

बिजली न रहने की स्थिति में समृद्ध एवं संपन्न परिवारों के लोग तो जेनरेटरों, इनवर्टरों तथा बैकअप के जरिये काम चला लेते हैं, लेकिन उन लोगों का क्या, जिन्हें ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं? यह प्रश्न हमें समानता और जलवायु न्याय के सबसे पेचीदा सवाल के आगे खड़ा कर देता है। देश में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा बढ़ रहा है। भारत अभी स्थापित पनबिजली, पवन और सौर ऊर्जा के मामले में दुनिया का चौथा सबसे बड़ा देश है। लेकिन यह देश अब भी अपनी लगभग 70 प्रतिशत बिजली जरूरतों के लिए कोयले पर निर्भर है। सरकार ने अप्रैल से कोयले और तेल से चलने वाले जेनरेटरों को पूरी शक्ति से चलाने का आदेश दिया है। पूरी शक्ति से चलाने का मतलब देश की आर्थिक जरूरतों को पर्यावरणीय स्थिरता के साथ संतुलित करना होगा। भारत ने हरित ऊर्जा में अपनी ऊर्जा जरूरतों का रूपांतरण करना शुरू कर दिया है।

इसने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसी साझेदारी शुरू की है, जिसका उद्देश्य विकासशील देशों में सौर ऊर्जा का निर्माण करना है। इसने हरित हाइड्रोजन को बढ़ावा देने के लिए एक राष्ट्रीय योजना की भी घोषणा की है और औद्योगिक क्षेत्र के डीकार्बोनाइजेशन (कार्बन रहित करने की प्रक्रिया) में तेजी लाने के लिए राष्ट्रीय ऊर्जा अधिनियम में संशोधन किया है। यह भी स्पष्ट है कि भारत के सामने चुनौतियों की भयावहता को देखते हुए इसे उन विकसित देशों से धन और प्रौद्योगिकी की सहायता की आवश्यकता होगी, जिन्होंने इस समस्या के हल की दिशा में ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक काम किया है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय आरोप-प्रत्यारोप ही इसका एकमात्र उत्तर नहीं है।

हमें देश के भीतर समानता की अन्य बातचीत भी करनी है। गरीब लोगों को, जो प्रति व्यक्ति के आधार पर बहुत कम प्रदूषण फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं, इसका खामियाजा सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता है। और जब हम 'भारत' की बात करते हैं, तो हमें उन लोगों के बीच अंतर करना चाहिए, जिनमें से एक तरफ कई एयर कंडीशनर, कार वाले लोग हैं, जो दुनिया भर में उड़ान भरते हैं और दूसरी तरफ वैसे गरीब लोग हैं, जो जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसके लिए हमें स्मार्ट तरीके से सोचने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, बढ़ती अत्यधिक गर्मी के साथ क्या हम एयर कंडीशनर से अलग कुछ सोच सकते हैं?

कूल रूफ (ठंडी छत) के बारे में हमारे क्या विचार हैं? भारत और दक्षिण एशिया को अपनी पहली ताप कार्ययोजना देने वाले अहमदाबाद में इसे पहली बार आजमाया गया और वहां की कई अच्छी प्रथाओं को देश में दोहराया जा रहा है। उदाहरण के लिए, तेलंगाना 'कूल रूफ पॉलिसी 2023-2028' पेश करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। संक्षेप में कहें तो, एक 'ठंडी छत' इस तरह से बनी होती है, जो कम गर्मी बरकरार रखती है और पारंपरिक छतों की तुलना में अधिक धूप को प्रतिबिंबित करके ठंडी बनी रहती है।

और क्या हम एक बड़ी एसयूवी की आकांक्षा के बजाय जब भी संभव हो पैदल चल सकते हैं या साइकिल चला सकते हैं और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग कर सकते हैं? असल में जैसे-जैसे हमारी आय बढ़ी है, हम उपभोक्तावादी वस्तुओं का उपयोग ज्यादा करने लगे हैं और सुविधाभोगी बन गए हैं, जिसके चलते ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ता जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमारी आय बढ़ने के साथ हमारा उपभोग किस दिशा में बढ़ना चाहिए, इस पर विचार करने की जरूरत है।    

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