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आर्थिकी : आहत सब हैं... पर सहमत कोई नहीं, जेनेवा वार्ता से निर्णायक कदमों की उम्मीद

Fri, 08 Aug 2025 07:16 AM IST
शिव शुक्ला डॉ. विवेक एस अग्रवाल
डॉ. विवेक एस अग्रवाल Published by: शिव शुक्ला Updated Fri, 08 Aug 2025 07:16 AM IST
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सार
प्लास्टिक से होने वाले नुकसान को लेकर चिंता तो सब जताते हैं, पर ठोस कदम नहीं उठाया जाता है। इस बार उम्मीद है कि जेनेवा में चल रही प्लास्टिक प्रदूषण संबंधी वार्ता में कुछ निर्णायक कदम उठाए जाएंगे।
 
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Everyone is hurt about plastic pollution... but no one agrees, decisive steps are expected from Geneva talks
प्लास्टिक कचरा - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

प्लास्टिक से हो रहे प्रदूषण से हर वय, जाति या आयु वर्ग प्रभावित है। इससे होने वाले पर्यावरणीय नुकसानों के बारे में हर स्तर पर चिंता जताने के साथ उससे मुक्ति संबंधी उपायों पर बात भी की जाती है। लेकिन, जब व्यक्तिगत उपयोग का विषय आता है, तो दृष्टिकोण पूर्णतया बदल जाता है। शायद, यही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहे विभिन्न संवादों एवं संधियों के निर्णायक स्वरूप तक पहुंचने में बाधक बन रहा है। जेनेवा (4 से 10 अगस्त तक) में चल रहे सम्मेलन में दुनिया के लोग प्लास्टिक के विभिन्न अवयवों की उत्पत्ति से लेकर उसके निष्पादन तक, पर्यावरण हानि को रोकने के लिए एक निर्णायक संधि तक पहुंचने का प्रयास भी करेंगे। प्लास्टिक को सन 2022 में जब संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक समस्या मानते हुए निर्णायक संधि के लिए वार्ता प्रारंभ करने संबंधी प्रस्ताव पारित किया, तब से लेकर अब तक छोटे समूह में वार्ताओं के अतिरिक्त पांच चक्र प्लास्टिक से जुड़े सभी हितधारक वर्गों को सम्मिलित करते हुए आयोजित हुए। लेकिन, हर बार निर्णय अगले दौर की वार्ता के लिए लंबित छोड़ दिया जाता रहा है।



वर्तमान में 46 करोड़ टन प्लास्टिक के उत्पादन में से दो टन सीधे तौर पर प्रदूषण का कारक बन रहा है। मोटे अनुमान के अनुसार, 25 वर्षों में प्लास्टिक से हो रहा नुकसान उसके चार गुना उत्पादन वृद्धि के साथ 281 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो जाएगा। प्लास्टिक पर वैश्विक संधि के पूर्ववर्ती वार्ताओं में असहमति का मुख्य कारण इसके क्रियान्वयन की सीमाओं को लेकर रहा है, विकसित देशों का एक बहुत बड़ा वर्ग संधि को मात्र प्लास्टिक से उत्पन्न कचरे तक सीमित रखना चाहता है, जबकि दूसरा वर्ग बाध्यता को डिजाइन से लेकर निष्पादन तक जुड़े हुए समस्त अवयवों को शामिल करने की मांग कर रहा है। इस मांग के तहत प्लास्टिक उत्पादन के लिए उपयोग हो रहे हानिकारक रसायनों पर पाबंदी को भी शामिल करना है। दूसरी सबसे बड़ी असहमति प्लास्टिक के विकल्प खोजने और आमजन तक पहुंचाने के लिए आवश्यक आर्थिक सहायता जुटाने को लेकर है। प्लास्टिक के विकल्प खोजने के लिए न तो सभी देश सक्षम हैं और न ही सभी के उपभोग का समान तरीका है।


वैश्विक रूप से निर्णायक संधि नहीं होने के कारण समस्त राष्ट्रों द्वारा समान रूप से रणनीति को अमल में नहीं लाया जा रहा है। यदि कहीं प्रतिबंध है, तो उससे लगती हुई सीमा पर उत्पादन एवं उपयोग बेरोकटोक चल रहा है। संयुक्त राष्ट्र की इस संधि के माध्यम से प्लास्टिक के उत्पादन से लेकर उपयोग तक हर स्तर पर अंकुश लगाने का प्रयास अपेक्षित है। यदि पृष्ठभूमि को देखा जाए, तो आम सहमति नहीं बन पाई है, जैसे अमेरिका ने स्वयं को जलवायु परिवर्तन संबंधी पहल से अलग कर रखा है, उसी प्रकार तेल उत्पादक राष्ट्र समझ के बावजूद पॉलीमर उत्पादन पर रोक के लिए सहमत नहीं हैं। विकसित देश कहीं भी स्वयं के कृत्यों की भरपाई करने में रुचि नहीं प्रदर्शित करते और सक्षमता के चलते वार्ताओं का रुख अपनी ओर कर देते हैं। अपेक्षा है, जेनेवा में चल रही प्लास्टिक प्रदूषण संबंधी वार्ता निर्णायक साबित होगी, जिसके तहत प्लास्टिक उत्पादन में कमी, पुनःचक्रण के मानदंड, प्रदूषण रोकने संबंधी पुख्ता कदम, शोध संबंधी प्रावधानों के साथ-साथ अल्प आय श्रेणी के राष्ट्रों को विकसित राष्ट्रों द्वारा आर्थिक सहयोग देने पर भी सहमति बनेगी। इस संधि का होना सृष्टि के लिए भी नितांत आवश्यक है। अमेरिका के वर्तमान रुख को देखते हुए यह भी आशंका है कि कहीं फिर एक बार वार्ता अगले दौर के लिए स्थगित न हो जाए।

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