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हर एक गरीब जरूरी होता है

तवलीन सिंह Updated Fri, 14 Sep 2012 04:03 PM IST
every poor is important
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माना कि ज्यादातर भारतवासियों ने मैरी एंटोनिएट का नाम सुना भी नहीं होगा, लेकिन सोनिया जी ने तो जरूर सुना होगा उस फ्रांसीसी महारानी का नाम जिसने कभी कहा था, 'रोटी अगर नहीं है (गरीबों के पास) तो केक क्यों नहीं खा लेते।' सोनिया जी की पैदाइश और परवरिश इटली में हुई थी, जो फ्रांस से ज्यादा दूर नहीं है और जहां उन्हें बचपन में ही बताया गया होगा इस बदनाम महारानी के बारे में। इतिहास की शिक्षक ने उन्हें बताया होगा कि कैसे महारानी मैरी एंटोनिएट के इस एक बयान ने जनता में इतना आक्रोश पैदा किया कि इंकलाब पर उतर आई फ्रांस की भूखी जनता। ऐसा इंकलाब जिसने राजशाही ही समाप्त कर दी फ्रांस में।
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मैरी एंटोनिएट की याद क्यों आई है मुझे इस सप्ताह? इसलिए कि सोनिया जी की सरकार ने ऐलान कर दिया है कि उनकी एक नई योजना द्वारा भारत के हर गरीब परिवार को मिलेगा एक सेलफोन। देश में अभी गरीबी की रेखा या बीपीएल के जितने परिवार हैं, वे अब एक दूसरे से बातें कर सकेंगे और इस बातचीत के पहले 200 मिनट मुफ्त में मिलेंगे उन्हें। वाह, सोनिया बहन, क्या बात है आपकी रहमत की। लेकिन क्या आपने सोचा है कभी कि जिन घरों में बिजली का भी भरोसा नहीं, उनमें सेलफोन की बैटरी चार्ज कैसे होगी? क्या आपने सोचा इस नई समाज कल्याण योजना को तैयार करने से पहले, कि जिन घरों में बच्चे भूखे सोते हैं हर रात उनको सेलफोन मिलने से क्या फायदा हो सकता है? किससे बातें करेंगे वे लोग, जो अकसर अपने गांव के दायरे के बाहर मुश्किल से निकल पाते हैं?

मुंबई शहर में मेरी जानकारी के कुछ बीपीएल परिवार हैं, जिनका सारा जीवन गुजरा है फुटपाथ पर। सुनिए उनका हाल। इस बरसात के मौसम में भी उनके पास छत का सहारा नहीं है। कच्ची झुग्गी भी नहीं बना सकते हैं, क्योंकि झुग्गी बस्तियों में मकान मालिक मांगते हैं लाखों में पगड़ी। सो बारिश जब बहुत हो जाती है प्लास्टिक की चादरों के नीचे गुजारा करते हैं। कमाई के जरिये इस महानगर में काफी हैं। मर्द मजदूरी ढूंढ लेते हैं कहीं न कहीं। औरतें और बच्चे लाल बत्तियों पर गजरे बेचते हैं।

दिहाड़ी बन जाती है इस तरह कोई 100 रुपये, जिससे जैसे-तैसे गुजारा कर लेते हैं, लेकिन मुसीबत अगर आ जाए किसी किस्म की, तो उसका सामना नहीं कर पाते हैं। हाल ही में सुरेखा के बेटे को जब निमोनिया हुआ, तो मेरे पास आई दवा के लिए पैसा उधार लेने। और जब डॉक्टरों ने उसको सलाह दी बच्चे की खुराक को सुधारने की, तो तय हुआ कि उपमा-दूध का मैं इंतजाम कर दूंगी। लेकिन मजे की बात तो यह है कि सुरेखा के पास सेलफोन है। और क्योंकि उसके और उसके पति की कमाई 200 रुपये से ज्यादा है रोजाना, वह योजना भवन की नजरों में गरीब भी नहीं है।

'हर हाथ में फोन', जैसी योजनाएं तैयार करते हैं योजना भवन में बैठे विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री। अकसर ऐसी योजनाएं तैयार की जाती हैं राजनेताओं के आदेश पर, और राजनेताओं का एक ही मकसद होता है समाज कल्याण योजनाएं बनाते समयः अगला चुनाव। इस योजना का मकसद साफ हैः 2014 का करीब आता हुआ आम चुनाव। उत्तर प्रदेश और बिहार के विधानसभा चुनावों ने ऐसा सदमा पहुंचाया है गांधी परिवार और उनके वफादारों को कि कुछ बौखला से गए हैं सब के सब। शायद इस बौखलाहट में बन रही हैं, ऐसी अजीब योजनाएं, जिनसे भला अगर होगा किसी का, तो सिर्फ उनका जिनको सौंपा जाएगा, इस योजना को अमली जामा पहनाने का काम।

इस फोन योजना से सरकारी अधिकारियों, सरपंचों को लाभ होगा। और जिन व्यापारियों से फोन खरीदे जाएंगे उनको भी लाभ होगा इतना कि मुमकिन है शुकराने के तौर पर वे कुछ ऊपर भी पहुंचाएंगे। यह समझना मुश्किल है कि उनको किस तरह से फायदा होगा, जिनके पास न पीने के लिए साफ पानी है, न रहने के लिए मकान और न ही खाने के लिए दो वक्त की रोटी। जो 7,000 करोड़ रुपये इस सेलफोन योजना पर खरचे जाएंगे, अगर उन बुनियादी सुविधाओं पर खर्च किए जाएं, जिनका बीपीएल परिवारों के जीवन में सख्त अभाव है, तो कहीं ज्यादा बेहतर होता, लेकिन यह बात आखिर सोनिया जी से कहने की हिम्मत किसके पास है?

सोनिया जी तो हम जैसे पत्रकारों से भी नहीं मिलती हैं। वह मिलती हैं तो सिर्फ उन लोगों से, जो उनके सामने आते ही उनकी प्रशंसा करना शुरू कर देते हैं। ऐसे लोग सच बोलने की हिम्मत कैसे जुटाएंगे। उम्मीद अगर है छोटी-सी, तो वह सिर्फ प्रधानमंत्री से ही है, लेकिन इन दिनों वह भी कम ही बोलते हैं।

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