Hijab Row Iran: ईरान की साहसी लड़कियों को सलाम, पुलिसिया दमन भी डिगा नहीं पाया
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विस्तार
पिछले दिनों ईरान के बारे में यह खबर आई कि वहां लंबे समय से चल रहे हिजाब-विरोधी आंदोलन को देखते हुए नैतिकता पुलिस को ही भंग कर दिया गया है। इसे हिजाब-विरोधी आंदोलन की बड़ी जीत बताया गया। अगर यह खबर सच होती, तो लड़कियों-महिलाओं के लिए हिजाब की अनिवार्यता का नियम भी खत्म हो जाता और वे बगैर हिजाब के सड़कों-बाजारों में चलती-फिरतीं। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। अब भी ईरान में लड़कियां हिजाब के विरोध में सड़कों पर हैं। हिजाब न ओढ़ने पर स्कूल-कॉलेजों से लड़कियों को अब भी बाहर कर दिया जा रहा है। यानी न वहां स्थिति में कोई बदलाव आया है, न ही सरकार के तेवर में। फिर सरकार द्वारा नैतिकता पुलिस को हटा देने की झूठी खबर क्यों फैलाई गई? यह क्यों न माना जाए कि ईरान की जनता को धोखा देने के लिए और दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के लिए सुनियोजित तरीके से यह खबर फैलाई गई? इसके पीछे की मंशा शायद यह रही हो कि इससे ईरान की लड़कियों को दुनिया भर से मिल रहे जन समर्थन का सिलसिला रुक जाएगा और सरकार की बदनामी नहीं होगी।
लेकिन ईरान की साहसी लड़कियों की तारीफ करनी चाहिए, जिन्होंने हिजाब के खिलाफ अपनी लड़ाई छोड़ी नहीं है। कई जगह तो सिर्फ हिजाब नहीं, वे कट्टरपंथी, तानाशाही सरकार से गद्दी छोड़ने की मांग करते हुए भी सड़कों पर हैं। और इनके पक्ष में आवाज उठाने वाले सिर्फ दुनिया भर के समतावादी और मानवतावादी ही नहीं हैं, खुद ईरान में माहौल उत्साहित करने वाला है। सड़कों पर उतरी लड़कियों के पक्ष में घर में बंद महिलाओं का ही नहीं, कमोबेश कुछ पुरुषों का भी समर्थन है। ईरान की कट्टर, बर्बर और नारी-विरोधी सरकार के खिलाफ लंबे समय से चल रहा यह आंदोलन हैरान और प्रभावित करता है। अनेक आंदोलनकारी लड़कियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है, कुछ को तो अपनी जान भी गंवानी पड़ी है। इसके बावजूद यह लड़ाई न केवल जारी है, बल्कि इसके जल्दी खत्म होने की भी कोई उम्मीद नहीं है।
अपने हक के लिए लड़ाई सिर्फ ईरान में ही नहीं चल रही। तानाशाह शी जिनपिंग की 'शून्य कोविड नीति' के खिलाफ पिछले दिनों चीन के एकाधिक शहरों में लोगों ने जिस तरह सड़कों पर उतरकर विरोध किया, वह भी उतना ही हैरान करने वाला था। यह याद रखना चाहिए कि वर्ष 1989 में तिआन-मन चौक पर आंदोलनकारियों के खिलाफ बीजिंग ने जैसी खूनी कार्रवाई की थी, उसके बाद दशकों तक वहां सरकारी विरोध का जिक्र तक नहीं होता था, सड़कों पर उतरने की तो बात ही छोड़ दें। हालांकि अब भी यह समझ लेना भोलापन ही होगा कि वहां की जनता जिनपिंग के खिलाफ हो गई है। क्योंकि आंदोलनकारियों में जिनपिंग की सीधी आलोचना करने वाले या उनसे गद्दी छोड़ने की मांग करने वाले लोग कम ही थे। ज्यादातर लोग सादे कागज के साथ सड़कों पर उतरे थे। उन कागजों में कुछ लिखा हुआ नहीं था, लेकिन उनसे लोगों की नाराजगी और क्षोभ के बारे में तो पता चलता ही था।
चीन में जगह-जगह हुए वे विरोध प्रदर्शन अगर प्रतीकात्मक थे, तो भी उनका महत्व कम नहीं होता। खासकर तब, जब तीसरी बार राष्ट्रपति बने जिनपिंग कम्युनिस्ट चीन के इतिहास में सबसे ताकतवर नेता हैं। ऐसे में, लोगों ने सड़कों पर उतरकर बड़ा जोखिम लिया था। फिर उन विरोध प्रदर्शनों को इसलिए भी सफल मानना चाहिए कि चीन में कुछ जगह 'शून्य कोविड नीति' में छूट दी गई। यानी वहां लंबे समय से बंद पड़े बाजार और सड़क खोल दिए गए। यह उस विरोध प्रदर्शन की सफलता ही थी। कुछ विश्लेषकों का तो मानना है कि ये विरोध प्रदर्शन भविष्य में वहां बदलाव की नींव भी रख सकते हैं। हालांकि इस बारे में जल्दबाजी में कुछ कहा नहीं जा सकता। जो चीन तिआन-मन चौक समेत देश के अनेक शहरों में उमड़ी आंदोलनकारी भीड़ को कुचल सकता है, वह कुछ भी कर सकता है। वर्ष 1989 के उन विराट विरोध प्रदर्शनों की तुलना में लॉकडाउन के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन तो कुछ भी नहीं थे। इसके बावजूद ईरान से लेकर चीन तक बर्बर और शक्तिशाली शासकों के खिलाफ जनता के सड़कों पर उतरने की प्रशंसा की जानी चाहिए।
चूंकि मैं आशावादी हूं, इसलिए मेरा मानना है कि ईरान में हिजाब के खिलाफ लड़कियों का यह आंदोलन भविष्य में बदलाव की रूपरेखा तय कर सकता है। यह आंदोलन आने वाले दिनों में वहां महिलाओं को पुरुषवर्चस्ववादी व्यवस्था से आजादी दिला सकता है। ऐसा मानने का कारण यह है कि एक समय ईरान में महिलाओं को तमाम तरह की आजादी हासिल थी। दरअसल हम वर्तमान में जीते हैं, इसलिए हमें ऐसा लगता है कि दमन करने वाली ताकतों का कभी कुछ नहीं बिगड़ सकता। जबकि हकीकत ऐसा नहीं है। इतिहास का सबक ही यह है कि अतीत में समता और न्याय के लिए हुए आंदोलनों ने भविष्य को सुखद और न्यायपूर्ण बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है।
भले ही ईरान में इस्लामी कट्टरता को खत्म करना संभव न हो, जैसे कि चीन में कम्युनिज्म के नाम पर लोगों की तमाम किस्म की स्वतंत्रता को बाधित करने का सिलसिला शायद कभी खत्म न हो। लेकिन विषमता के खिलाफ उठी आवाजें व्यर्थ हो जाएंगी, यह मानने का भी कोई कारण नहीं है। अगर यह मान लिया जाए कि ताकतवरों के अत्याचारों पर अंकुश लगाना संभव नहीं है, फिर तो दुनिया में कहीं कोई आंदोलन ही न हो। जाहिर है, विश्व के अलग-अलग कोने में न्याय और समता के लिए उठने वाली आवाजें मानवता की बेहतरी के प्रति हमें आश्वस्त करती हैं। इससे यह साफ होता है कि मौजूदा स्थिति में अन्यायी व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई भले ही अपनी तार्किक परिणति तक न पहुंचे, लेकिन उस दिशा में अभियान जारी है, जो एक न एक दिन जरूर सफल होगा।
इस बात की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि ईरान और चीन में जान जोखिम में डालकर सड़कों पर उतरने वाले लोगों ने दुनिया भर के शोषित-पीड़ित लोगों में यह उम्मीद जगाई है कि चुप रहने के बजाय उन्हें भी सड़कों पर उतरना चाहिए। शोषितों के बीच ऐसी प्रेरणा जगना भी बहुत बड़ी बात है, जिससे यह संदेश जाता है कि समता और स्वतंत्रता के लिए लड़ाई करनी होगी, सड़कों पर उतरना होगा। समता और स्त्री स्वतंत्रता के लिए हो रहा आंदोलन सफल हो या न हो, ईरान की इन साहसी लड़कियों को याद रखा जाएगा।