{"_id":"5eae3ad58ebc3e9097269812","slug":"evaluate-your-tradition-in-times-of-coronavirus-crisis","type":"story","status":"publish","title_hn":"संकट की घड़ी में अपनी परंपरा का मूल्यांकन ","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
संकट की घड़ी में अपनी परंपरा का मूल्यांकन
Sun, 03 May 2020 09:00 AM IST
गौतम चटर्जी
गौतम चटर्जी
गौतम चटर्जी
Published by: गौतम चटर्जी
Updated Sun, 03 May 2020 09:00 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : PTI
अनिश्चय की स्थिति है। वर्तमान पृथ्वी पर भयभीत, अनिश्चित जीवन ही आज की पहली चिंता है। सामान्य स्थिति के सारे विश्वसनीय संकेत संप्रति स्थगित हैं, अंधेरे में हैं। लेकिन हर मौसम के आकाश में बादलों को हमेशा गुजरते हुए ही देखा गया है। आषाढ़ के आकाश पर बादल का कोई एक छोटा-सा टुकड़ा आ जाता है और पूरे आकाश में दूर तक फैल जाता है। लगता है, अनवरत बारिश कभी थमेगी ही नहीं। और बारिश थमती है। आकाश साफ होता है। जीवन सामान्य होता है।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
वैसे इस समय आकाश भी साफ है और नदी भी बिना किसी मानवीय योजना के स्वच्छ हो चुकी है। लेकिन जब तक जानलेवा वायरस कोरोना से प्रभावित पृथ्वी पर लोग बुरी तरह और पूरी तरह डरे हुए हैं, उस समय क्या यह भी हम नहीं देख रहे कि हम अपना परिचय कैसे दे रहे हैं? इस 21वीं शती में तीन हजार साल में सभ्य हुए विश्व नागरिक की तरह या तीन हजार साल पहले और इन तीन हजार वर्षों में किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति में आदिम असभ्यता की मजबूत प्रवृत्तियों के साथ? तो फिर क्यों न आधुनिक, विकसित, सभ्य और सुसंस्कृत मनुष्य के जीवन को भव्य आदिम जीवन कहा जाए?
यानी अंग्रेजी में ग्लोरिफाइड प्रिमिटिव लाइफ। इतिहास के विकास क्रम में हम भले ही मनुष्य की कई सभ्यताओं के बारे में नृतत्वशास्त्रीय अध्ययन करते रहें, किंतु दिलचस्प अभी यही दिखता है कि आदिम युग में डर लोगों को एकजुट रखता था और 21वीं शती में सभी राष्ट्राध्यक्षों को हाथ जोड़कर निवेदन करना पड़ता है कि महामारी का सामना करने के लिए और एक नया जीवन पाने के लिए मनुष्य एकजुट हों। हम अपने उस ज्ञान, संस्कार, सभ्यता और संस्कृति के साथ क्यों नहीं इकट्ठा होते, जिसे हमारे मस्तिष्क ने तीन हजार वर्षों में इकट्ठा किया है?
बिल्कुल साफ है कि पूरी पृथ्वी के विकास क्रम में मनुष्य मस्तिष्क या पदार्थ का विकास तो हुआ है, किंतु मनुष्य मन का समय के साथ कोई समवेत क्रम विकास अभी तक नहीं हुआ है। संपूर्ण जैविक विकास की यात्रा में मनुष्य अपनी आदिम वृत्तियों को लगातार संजोता आ रहा, उन्हें जीवाश्म नहीं बनने दे रहा। सारांश यही हुआ कि मनुष्य के सभ्य होने में मनुष्य निर्मित समय और इतिहास की कोई भूमिका नहीं है। उसके पास पुष्ट रूप से आदिम समय ही संरक्षित है, जिसकी पुष्टि वह समय-समय पर करता रहता है। इसी आक्रामकता में वह सुरक्षित महसूस करता है।
त्रासदी यही है कि एक अदृश्य विषाणु ने उसके इस सुरक्षा कवच को छीनकर फेंक दिया है। त्रासदी यह भी है कि जब कोई अदृश्य सत्ता मृत्यु की भाषा में हमसे संबोधित होती है, तो हम उस पर तुरंत विश्वास कर लेते हैं और यदि किसी अदृश्य सत्ता का संबोधन हमसे जीवन के स्तर पर है, तो हम उसके अस्तित्व के प्रति या तो संदेह करते हैं या फिर उसे अंधविश्वासों और कुरीतियों का मूर्खतापूर्ण गौरव सौंपते हैं। मनुष्य मन संदेह करता है। मनुष्य हृदय एक सतत शाश्वत शुभ को देखता है।
अशुभ देखना डरी हुई आदिम वृत्ति है, इसीलिए शुभता दृष्टि ने दुख को बुराई कहा है। जब तक मृत्यु भय है, तब तक कुछ भी शुभ नहीं। पश्चिम के लिए अब भी भारतीय पृथ्वी ज्ञान की धरती है, और एशिया प्रकाश और आनंद का ब्रह्मांड। जबकि आधुनिक भारतीय मानस में आदिम वृत्ति की गंध अब भी संक्रामक बनी हुई है। इसलिए आधुनिक मनुष्य जीवन को ग्लोरिफाइड प्रिमिटिव लाइफ यानी भव्य आदिम जीवन कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। फिर-फिर अपना मूल्यांकन जरूरी है।
निर्मल वर्मा ने यह गलत नहीं लिखा था कि संकट की घड़ी में अपनी परंपरा का मूल्यांकन करना एक तरह से खुद अपना मूल्यांकन करना है, अपनी अस्मिता की जड़ों को खोजना है। हम कौन हैं-यह एक दार्शनिक प्रश्न न रहकर खुद अपनी नियति से मुठभेड़ करने का तात्कालिक प्रश्न बन जाता है।
वैदिक ऋषि से प्रवचन सुनने के बाद जब श्रोत्रिय किसी शुभ की कामना को उच्चार देता था, तो ऋषि यह कहकर प्रतिवचन देते थे कि ऐसा ही हो। तो क्या हम भी वैश्विक त्रासदी की इस बेला में कोई शुभ देख सकते हैं? निश्चय ही हमारा आशाकांक्षी मन यह देखता है कि यह आसन्न संकट जल्दी ही टलेगा।
यदि कोई विपत्ति अप्रकट कारणों और अपने अदृश्य जगत से एकाएक प्रकट हुई है, तो वह समय के साथ निश्चय ही अदृश्य भी होगी, किंतु उसके बाद भी क्या हमारा सामाजिक जीवन और व्यवहार वैसा ही रहेगा, जैसा हम प्रतिकूल परिस्थितियों में आदिम मुद्रा में प्रकट करते आ रहे?
तीन हजार वर्षों में मनुष्य जीवन का एक कुरूप पक्ष उसके आदिम रह जाने में है, तो एक सुंदर और बड़ा रचनात्मक पक्ष यह भी है कि उसके पास प्रबुद्धता और लोकोत्तर ज्ञान की ऐसी संपदा भी है, जो अक्षुण्ण है, और जो लोकजीवन में सहज व्यवहार्य भी।
इस परिप्रेक्ष्य से हम यह देख सकते हैं कि जब हमें कोरोना मुक्त निर्भय समाज मिलेगा, तो उस प्रभावित सामाजिक जीवन में हम किस तरह के प्रभाव को स्वीकार कर रहे होंगे और उस जीवन को किस किस स्तर पर प्रभावित करने की कोशिश कर रहे होंगे, ताकि कोई और कोरोना हमें इतना असहाय न कर दे और किसी को भी हमारी आदिम गंध न मिले।