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जनसंख्या: बुजुर्ग आबादी से परेशान यूरोप, भारत को भी कर लेनी चाहिए इस चुनौती से निपटने की तैयारी
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो :
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विस्तार
किसी भी देश में बुजुर्ग यानी 65 साल से अधिक आयु वाले लोगों की संख्या बढ़ने से बचत में कमी, श्रम शक्ति में गिरावट और निवेश दर में कमी देखी जाती है। इस परिप्रेक्ष्य में यूरोप में बुजुर्गों की आबादी इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि वहां के लोगों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिनमें आर्थिक व सामाजिक समस्याएं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से यूरोप जिन चुनौतियों का सामना आज कर रहा है, दूसरे देशों को उनका सामना 2064 में करना होगा।
विश्व स्वास्थ संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोप में वर्ष 2024 में 65 वर्ष से अधिक उम्र वाले बुजुर्गों की संख्या 15 साल के किशोरों से अधिक होगी। गौरतलब है कि 2022 में यूरोपीय संघ की 21.1 प्रतिशत आबादी की उम्र 65 वर्ष या उससे अधिक थी। डब्ल्यूएचओ की इस रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा नकारात्मक स्थिति से निपटने के लिए यूरोप के लोगों को अपनी जीवन-शैली और आदतों में बदलाव लाना होगा। लंबी जीवन प्रत्याशा की वजह से जहां यूरोप में बुजुर्गों की आबादी बढ़ रही है, वहीं बच्चों के जन्म दर में भारी कमी आ रही है।
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि यूरोप और वैसे देश जहां बुजुर्गों की आबादी अधिक है, बुजुर्गों को प्रति दिन अधिक समय खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना होगा। उन्हें हर सप्ताह कम से कम 150 मिनट की वर्जिश करनी होगी, तभी वे स्वस्थ रह पाएंगे और आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग ले पाएंगे। डब्ल्यूएचओ का यह भी कहना है कि शारीरिक रूप से सक्रिय रहने पर मृत्यु की आशंका 35 प्रतिशत तक कम हो सकती है। बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से यूरोपीय देशों में आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर बदलाव दिख रहे हैं। मिसाल के लिए, युवा आबादी में कमी आने से कार्यबल की शारीरिक क्षमता घटी है, जिससे उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा रही है, आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ रही हैं और स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च हो रहा है, जिससे अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है।
यूरोप के अलावा जापान भी बुजुर्गों की बढ़ती आबादी से परेशान है। डब्ल्यूएचओ की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, जापान में 100 या उससे अधिक उम्र के बुजुर्गों की संख्या 92 हजार से अधिक हो गई है। अमेरिका भी लंबी जीवन प्रत्याशा, कम जन्म दर, स्वास्थ्य देखभाल की बढ़ी लागत के कारण परेशान है, क्योंकि वहां सार्वजनिक स्वास्थ्य पर व्यय में इजाफा हो रहा है। इससे वहां श्रमिकों की संख्या में भारी कमी आई है। कामगारों के लिए अमेरिका की निर्भरता दूसरे देशों पर बढ़ी है। उद्योग-धंधों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। बच्चे, किशोर एवं युवाओं के बीच एकाकीपन और अवसाद के मामले देखे जा रहे हैं।
वर्ष 1980 में आबादी को नियंत्रित करने के लिए एक बच्चे की नीति अपनाने के कारण चीन में युवा आबादी घट गई है और बुजुर्गों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या विभाग के मुताबिक, अगली सदी में चीन की श्रमिक आबादी महज 54.8 करोड़ रह जाएगी। श्रमिक तबके में कमी आने से देश के बुनियादी ढांचे, जो विकास का वाहक होता है, पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
हालांकि, भारत इस समस्या से अछूता है। भारत में वर्ष 2011 में बुजुर्गों की 5.5 प्रतिशत की आबादी वर्ष 2050 तक बढ़कर 15.2 प्रतिशत हो जाएगी, जबकि वर्ष 2050 में बुजुर्गों की आबादी चीन में 32.6 प्रतिशत और अमेरिका में 23.2 प्रतिशत हो जाएगी।
भारत में वर्ष 2050 तक चार दक्षिणी राज्यों, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में कुल आबादी का पांचवां हिस्सा बुजुर्ग आबादी का हो जाएगा। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, असम, बिहार, हरियाणा आदि राज्यों में वर्ष 2050 में युवा आबादी की संख्या ज्यादा रहेगी, जिसके कारण इन राज्यों से दक्षिण के राज्यों में युवाओं का पलायन जारी रहेगा। ऐसे परिवर्तनों की वजह से दक्षिणी राज्यों के बुनियादी ढांचे पर भी दबाव बढ़ सकता है और सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर में बदलाव देखे जा सकते हैं।
समग्रता में भले ही इसका असर आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है, लेकिन इसका दूरगामी प्रभाव पड़ने से इन्कार नहीं किया जा सकता है। लिहाजा, यूरोपीय देशों, जापान, चीन और अमेरिका को बदले परिवेश में नई नीतियां बनाने और उन पर ठोस अमल करने की जरूरत है।