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महाकाव्य किया नर्मदा के हवाले

Mon, 08 Apr 2013 10:49 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Mon, 08 Apr 2013 10:49 PM IST
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epic turned over to narmada

भारतीय धर्मग्रंथ ही नहीं, हमारा इतिहास भी उन घटनाओं से पटा पड़ा है, जिसमें बताया गया है कि अभिमान से हम ज्यों ही जकड़ जाते हैं और प्रशंसा सुनकर मुग्ध होने लगते हैं, तभी हमारा वैचारिक अंत हो जाता है।

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इसी से जुड़ा एक प्रसंग अहिल्याबाई होल्कर का है। वह परम भगवद्भक्त, दानशील, परोपकारी तथा वीरांगना रानी थीं। वह गरीबों व असहायों की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहती थीं। इंदौर राज्य की जनता उनके कल्याणकारी कार्यों के प्रति सदैव उनके आगे नतमस्तक रहती थी।
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राज्य के एक विद्वान पंडित ने रानी अहिल्याबाई की स्तुति में एक महाकाव्य की रचना की। इस ग्रंथ में रानी के महान व्यक्तित्व का वर्णन किया गया था। पंडित उस ग्रंथ को लेकर राजदरबार में पहुंचा। उसने रानी के समक्ष कुछ पंक्तियां सुनाईं। उपस्थित लोग रानी की प्रशंसा में काव्य-पंक्तियां सुनकर वाह-वाह कह उठे।
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रानी अहिल्याबाई बोलीं, पंडित जी, मैं तो एक साधारण महिला हूं। प्रजा की सेवा करना मेरा धर्म है, कर्तव्य है। यदि आप मेरी जगह प्रभु की स्तुति में यह महाकाव्य रचते, तो यह अमर हो जाता। इससे रचने वाले तथा सुनने वाले, दोनों का कल्याण होता। इतना कहकर रानी ने प्रधानमंत्री को संकेत किया कि कवि महोदय को इस परिश्रम के लिए स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार के रूप में दी जाएं और साथ ही प्रशंसा में रचे गए महाकाव्य को नर्मदा नदी में प्रवाहित करा दिया जाए।

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