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प्रकृति सियासत नहीं करती
थॉमस एल फ्रीडमैन
Updated Wed, 19 Aug 2015 09:14 PM IST
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यहां मैं सुन्नी, शिया, अरब, तुर्क, कुर्द और इस्राइलियों के संबंधों के भविष्य के बारे में अपने विचार रख रहा हूं- अगर वे लंबे समय से चल रहे अपने झगड़े को खत्म नहीं करते हैं, तो इससे पहले कि वे एक-दूसरे को खत्म करें, प्रकृति उन सबको खत्म कर देगी। यहां मैं कुछ ऐसी खबरों का जिक्र करना चाहता हूं, जो ईरान परमाणु समझौते पर बहस के दौरान आपसे छूट गई होंगी।
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बीते 31 जुलाई को यूएसए टुडे ने खबर प्रकाशित की कि फारस की खाड़ी से सटे ईरान के बांदर मशहर में गर्मी का सूचकांक 72.3 डिग्री सेल्सियस पर चला गया, क्योंकि गर्म हवा पश्चिम एशिया को तपा रही थी, जबकि यह पहले से ही इस धरती का सबसे गर्म स्थल है। मौसम विज्ञानी एंथनी सागलिएनी ने एक बयान में कहा, मेरी जानकारी में यह तापमान का सबसे अविश्वसनीय पर्यवेक्षण है, और यह दुनिया में अब तक के सर्वाधिक तापमान का रिकॉर्ड है। जब तापमान केवल 46.1 डिग्री सेल्सियस था, तो ओसांक अगाध रूप से 32.3 डिग्री सेल्सियस था। ओसांक के जरिये ही हवा में गर्मी और नमी को मापा जाता है, जिससे ताप सूचकांक बनता है या जो तापमान हम महसूस करते हैं।
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फिर हमने कुछ ऐसा देखा, जो पहले कभी देखने को नहीं मिला था-एयरकंडीशन की सुविधा देने में विफल रहने के कारण इराकी सरकार ने कुछ अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया। दो हफ्ते पहले वहां के प्रधानमंत्री हैदर अल-अबादी ने उप-राष्ट्रपति पद के सभी तीनों पदों और उप-प्रधानमंत्री कार्यालय को खत्म कर दिया और सड़कों पर हफ्तों से चल रहे आंदोलन के बाद व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी सुधार को प्रस्तावित किया। तथ्य यह है कि जिन हफ्तों में तापमान 48.8 डिग्री सेल्सियस पर था, सरकार प्रतिदिन मात्र कुछ घंटे ही एयरकंडीशन चलाने के लिए बिजली आपूर्ति कर पाती थी।
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जैसा कि टाइम पत्रिका के अन्ने बर्नार्ड ने एक अगस्त को लिखा, इराक में गर्मी के मुद्दे ने इस्लामिक स्टेट के साथ युद्ध को पीछे धकेल दिया। प्रधानमंत्री ने लोगों को धूप से बचाने के लिए चार दिनों के सप्ताहांत की घोषणा की और सरकारी अधिकारियों की सबसे जरूरी सुविधाओं में से एक-उनके एयरकंडीशनर के लिए चौबीसों घंटे बिजली की आपूर्ति-को खत्म करने का आदेश दिया।
पिछले दिनों बगदाद के केंद्र में हजारों लोगों (श्रमिक, कलाकार और बुद्धिजीवियों) ने प्रदर्शन किया। वे हाथों में तख्तियां लेकर बिजली की कमी और भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे थे। यह प्रदर्शन इस मायने में भी अनूठा था कि इसे किसी बड़े सियासी दल ने आयोजित नहीं किया था।
बीते वर्ष 19 फरवरी को द एसोसिएट प्रेस ने ईरान से खबर दी थी कि ईरान के नए राष्ट्रपति हसन रोहानी के नेतृत्व में कैबिनेट ने जो पहला फैसला लिया, वह 'वैश्विक शक्तियों के साथ देश के परमाणु विवाद का हल कैसे निकाला जाए, से संबंधित नहीं था, बल्कि देश की सबसे बड़ी झील को खत्म होने से कैसे बचाया जाए, से संबंधित था। धरती की सबसे बड़ी खारे पानी की झीलों में से एक उर्मिया झील पिछले एक दशक में 80 फीसदी (करीब 400 वर्ग मील) सिकुड़ गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसकी मुख्य वजह है, जलवायु परिवर्तन, आसपास के खेतों में सिंचाई का विस्तार और नदियों पर बांधों का निर्माण, जिसके कारण जल ग्रहण क्षेत्र भर जाता है।
वाशिंगटन स्थित जलवायु एवं सुरक्षा केंद्र के संचालक कैटलिन वेरेल और फ्रांसिस्को फेमिया इन प्रवृत्तियों पर नजर रखते हैं। उन्होंने बताया कि दक्षिण एशिया के विद्वान माइकल कुगल्मैन ने हाल ही में उल्लेख किया कि इस वर्ष पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाओं से ज्यादा लोग लू के कारण मरे हैं। बेशक 'आतंकवाद' और 'जलवायु संकट' के बीच प्रतियोगिता नहीं होनी चाहिए, लेकिन तथ्य यही है कि 'आतंकवाद से ज्यादा लू से जानें गई हैं'। उन्होंने आगे बताया कि 'अमेरिका के नेशनल ओसियानिक ऐंड एटमोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) ने वर्ष 2011 में अपने एक अध्ययन में इसका पक्का सुबूत पाया कि संभवतः जलवायु परिवर्तन के कारण भूमध्यसागर तटीय इलाके और पश्चिम एशिया में वर्ष 1971 से 2010 के दौरान सर्दियों में बहुत तेजी से गिरावट आई है। वर्ष 1902 के बाद से पिछले बीस वर्षों में इस क्षेत्र में सबसे शुष्क सर्दी महसूस की गई है।'
अंत में उन्होंने कहा कि 'ऐसी प्रतिकूल स्थितियों के कारण सरकारों और जनता के बीच रिश्ते तनावपूर्ण होते जा रहे हैं और इन जगहों के जलवायु अनुमानों को देखते हुए हालात और बदतर होने की आशंका है। जो सरकारें इन संकटों का सामना करने में जनता के प्रति उत्तरदायी हैं, उनके रिश्ते जनता के साथ मजबूत होंगे और जो सरकारें जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं होगी, उनके रिश्ते जनता के साथ कमजोर होंगे। और ज्यादातर हिस्सों में सरकारें पर्याप्त रूप से उत्तरदायी नहीं हैं।'
उदाहरण के लिए सीरिया को देखिएः क्रांति से पहले देश के आधुनिक इतिहास में वहां चार साल भयंकर सूखा पड़ा था, जिसके कारण दसियों लाख किसानों और चरवाहों की जमीन बर्बाद हो गई। शहरों में भी बशर अल-असद की सरकार उन लोगों की मदद करने में पूरी तरह से विफल रही। इस तरह से उन्होंने क्रांति के बीज बो दिए।
इस क्षेत्र के सभी लोग आग से खेल रहे हैं। वे इस बात पर लड़ रहे हैं कि खलीफा कौन है, पैगंबर मोहम्मद के असली वारिस सुन्नी हैं या शिया या ईश्वर ने वास्तव में पवित्र जमीन किसे सौंपी है, लेकिन प्रकृति चुप नहीं बैठी है। वह सियासत नहीं करती, बल्कि सिर्फ विज्ञान के अनुसार चलती है। अगर वे लोग गलत रास्ते पर बढ़ेंगे, तो वह सबको चुप करा देगी। उन्हें केवल एक ही 'वाद' बचा सकता है और वह है 'पर्यावरणवाद'। यह समझने की जरूरत है कि हवा और पानी, दोनों साझा हैं। उनकी पारिस्थितिकी साझा है और अगर वे उसके संरक्षण में आपस में सहयोग नहीं करेंगे (और हमें भी जलवायु परिवर्तनों से निपटना होगा), तो विशाल पर्यावरण संकट उनका इंतजार कर रहा है।