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भुवन सिंह की करुणा भावना

Fri, 16 Aug 2013 08:28 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Fri, 16 Aug 2013 08:28 PM IST
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Emotion of Bhuvan singh

उदयपुर के महाराणा के दरबारी भुवन सिंह चौहान भगवान श्रीनाथ जी के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर भगवत भजन में लग जाते और प्रार्थना किया करते, मेरे हाथों पाप कर्म न होने पाए। मैं प्रतिदिन किसी रोगी व गरीब की अपने हाथों से सेवा अवश्य करूं। भुवन सिंह की भक्ति और सेवा भावना से महाराणा बहुत प्रभावित थे।

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एक दिन महाराणा जंगल में शिकार के लिए गए। उन्होंने हिरणी देखा, जो उन्हें देखकर वृक्षों की ओट में जा छिपी। महाराणा का संकेत मिलते ही भुवन सिंह ने छिपी हिरणी पर तलवार चला दी। मरती हुई हिरणी के नेत्र से करुण धारा बहते देख भुवन सिंह द्रवित हो उठे। उन्होंने घर लौटकर भगवान श्रीनाथ जी के समक्ष हिरणी की हत्या के लिए पश्चाताप किया और किसी प्राणी की हत्या न करने का संकल्प लिया। महाराणा को जब यह पता लगा कि हिरणी की हत्या से भुवन सिंह को कष्ट पहुंचा है, तो वह उनकी करुणा भावना से और अधिक प्रभावित हुए।
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एक दिन महाराणा ने कहा, भुवन सिंह, तुम हमारे नहीं, भगवान श्रीनाथ जी के दरबारी हो। आज से तुम दरबार में न आना। तुम्हारी जागीर दोगुनी की जाती है। भुवन सिंह ने कहा, राजन, मुझे जागीर नहीं, किसी निरीह प्राणी की हत्या न करने का आपका संकल्प चाहिए। महाराणा ने वचन देकर उन्हें विदा किया।
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