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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   emi Habit of Borrowing Crisis of Saving The Growing Trend of Living on Debt

उधारी की आदत बचत का संकट: कर्ज लेकर जीने की बढ़ती प्रवृत्ति

Fri, 17 Apr 2026 07:28 AM IST
Satish Singh सतीश सिंह
Updated Fri, 17 Apr 2026 07:28 AM IST
सार

ईएमआई और क्रेडिट कार्ड की लत के चलते भारतीय परिवारों की वित्तीय देनदारियां बढ़कर जीडीपी के 6.2 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई हैं, जो पिछले एक दशक का उच्चतम स्तर है।

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emi Habit of Borrowing Crisis of Saving The Growing Trend of Living on Debt
कर्ज लेने की बढ़ती आदत - फोटो : freepik.com

विस्तार

पिछले दशक से हमारी आर्थिक आदतें तेजी से बदल रही हैं। ऋण की किस्त, यानी ईएमआई, क्रेडिट कार्ड, होम लोन और क्रेडिट स्कोर में सुधार के लिए निरंतर संघर्ष अब हमारे जीवन का हिस्सा बन गया है, जिसका मुख्य कारण है हमारे भौतिकवादी जीवन की लालसा। भारतीय दार्शनिक चार्वाक के सिद्धांत की तरह, आज लोग यह चाह रहे हैं कि इन्सान को ‘यावज्जीवेत सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत’ दर्शन का पालन करना चाहिए। इसका अर्थ है कि जब तक जीवन है, तब तक खुश रहना चाहिए और अगर कर्ज लेकर भी घी पीना पड़े, तो पीना चाहिए, यानी सुख-समृद्धि के साथ जीवन बिताना चाहिए।
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भौतिकवादी जीवन जीने वाले लोगों की संख्या में इजाफा होने के कारण भारतीय परिवारों की वित्तीय देनदारियां बढ़कर जीडीपी के 6.2 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई हैं, जो पिछले एक दशक का उच्चतम स्तर है। भारतीय परिवारों के वित्तीय व्यवहार में महत्वपूर्ण बदलाव को उजागर करने वाली द न्यू इंडियन हाउसहोल्ड बैलेंस शीट के अनुसार, भारतीयों की उधारी अब उनकी बचत की रफ्तार को पीछे छोड़ रही है। गौरतलब है कि महामारी के बाद के दौर में घरेलू कर्ज में 44.6 प्रतिशत चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) की बढ़त हुई है। कुछ आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि कर्ज का बढ़ना जरूरी नहीं कि हमेशा नकारात्मक हो। यह आत्मविश्वास और आय में सुधार का संकेत भी हो सकता है। महामारी से पहले शुद्ध वित्तीय बचत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 7.7 फीसदी थी, जो वित्त वर्ष 2024 में गिरकर 5.2 प्रतिशत रह गई है। इसका अर्थ है कि 2024 में लोग हर 100 रुपये कमाने पर लगभग पांच रुपये ही बचा रहे थे। 
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वित्त वर्ष 2016 से 2025 के बीच, क्रेडिट कार्ड, पर्सनल लोन, वाहन, गृह, शिक्षा, मियादी जमा पर आधारित ऋण, शेयरों के बदले ऋण और उपभोक्ता ड्यूरेबल्स लोन जैसे विभिन्न श्रेणियों में सबसे अधिक वृद्धि क्रेडिट कार्ड, पर्सनल लोन और वाहन लोन में हुई है। विश्लेषण करने पर पता चलता है कि अब लोग छोटी बचत योजनाओं में निवेश करने से हिचकिचा रहे हैं। वे नकदी रखने से भी बच रहे हैं, जबकि म्यूचुअल फंड और शेयर बाजार में निवेश का रुझान बढ़ रहा है। पीएफ, पेंशन, पीपीएफ जैसे माध्यमों में भी लोग ज्यादा रुचि दिखा रहे हैं। वहीं, जीवन बीमा में निवेश का आकर्षण कम हो गया है, और बैंक में धन जमा करने में भी लोगों की रुचि घट रही है। जमा प्रवृत्ति में बदलाव के साथ भारत में लोगों की उधारी तेजी से बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2021 में 6.05 लाख करोड़ रुपये की तुलना में, वित्त वर्ष 2025 में घरेलू उधार बढ़कर 12.12 लाख करोड़ रुपये से ऊपर चला गया है। बढ़ती हुई उधारी का मुख्य कारण है कि 25 से 35 वर्ष के युवा अपनी आय से कई गुना अधिक कर्ज ले रहे हैं, जिससे उन पर ईएमआई का बोझ बढ़ रहा है। यह देखने में आया है कि कुल कर्जदारों में से 60 फीसदी लोग पुराने कर्ज की किस्त चुकाने के लिए नए लोन का सहारा लेते हैं। आंकड़ों के अनुसार, भारतीयों की देनदारियां संपत्ति बनाने की तुलना में दोगुनी गति से बढ़ रही हैं, जो वित्तीय तनाव का ही संकेत है।
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निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि लोगों की बचत में गिरावट के कारण, अचानक कोई भी परिवार संकट में आ सकता है। इसलिए, यह जरूरी है कि बचत और निवेश को प्राथमिकता दी जाए। जरूरी नहीं कि जब आप अधिक कमाते हैं, तभी निवेश करें। अपनी कमाई का कुछ तय हिस्सा हर महीने नियमित रूप से बचाना चाहिए। इस उद्देश्य के लिए एसआईपी शुरू किया जा सकता है। लंबी अवधि के लिए इक्विटी और डेट फंड के मिश्रण वाले म्यूचुअल फंड में निवेश करके एक स्थायी संपत्ति बनाई जा सकती है। साथ ही, अगर आप बहुत सारा लोन लिए हुए हैं, तो उच्च ब्याज वाले ऋण जैसे क्रेडिट कार्ड लोन और पर्सनल लोन की पहले चुकौती करनी चाहिए।
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