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व्यवस्था: इलेक्टोरल बॉन्ड पर SC का फैसला अहम, पार्टियों का खर्च निरंकुश; क्या आयोग को आजादी देंगे सियासी दल?
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इलेक्टोरल बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
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amar ujala
विस्तार
दुनिया के बड़े लोकतांत्रिक देशों में शायद भारत अकेला देश है, जहां चुनावी चंदे की कोई सीमा तय नहीं है और पार्टी के खर्चे पर भी किसी तरह की कोई रोक-टोक नहीं है। चंदे और खर्चे की हदबंदी किए बिना चुनावों में नोटबंदी की कल्पना नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही चुनावी बॉन्ड पर रोक लगा दी हो, लेकिन चुनाव सुधार के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। सवाल उठता है कि क्या हम अमेरिका और यूरोप के देशों से सीख नहीं ले सकते हैं?ब्रिटेन में कोई भी दल चुनाव में एक सीट पर तीस हजार पाउंड (करीब तीस लाख रुपये) से ज्यादा खर्च नहीं कर सकता। इसी तरह, वहां कोई दानदाता (व्यक्ति हो या कंपनी) एक साल में साढ़े सात हजार पाउंड से ज्यादा का दान नहीं दे सकता। उससे ज्यादा दान देने पर उसकी पहचान को सार्वजनिक किया जाना जरूरी है। जर्मनी में अधिकतम चुनावी चंदे की सीमा दस हजार यूरो सालाना है। उससे ज्यादा चंदा देने पर पार्टी विशेष को पहचान बतानी पड़ती है। बहुत से अन्य देशों में छोटे दानदाताओं के नाम उजागर नहीं किए जाते, लेकिन बड़े दानदाताओं की पहचान जरूरी है।
कहा जाता है कि एक राजनेता कालेधन के जरिये ही विधानसभा या लोकसभा पहुंचता है। इस समय हमारे देश में एक उम्मीदवार लोकसभा चुनाव में 75 से 90 लाख रुपये और विधानसभा चुनाव में 40 लाख रुपये खर्च कर सकता है। वैसे तो कागजों में उम्मीदवार इससे आधी रकम ही चुनावी खर्च के रूप में दिखाते हैं, लेकिन हकीकत बच्चा-बच्चा जानता है। ऐसे में, चुनाव आयोग को चुनावी खर्च सीमा बढ़ानी चाहिए और उसे महंगाई दर से भी जोड़ा जाना चाहिए। ऐसा होने पर कालेधन पर रोक लगने की गारंटी तो नहीं है, लेकिन कुछ हद तक अंकुश तो लगाया ही जा सकता है।
दुनिया के बहुत से देशों में सार्वजनिक निधि से चुनाव करवाए जाते हैं। एक सुझाव दिया गया है कि चुनाव आयोग जनता के पैसों से चुनाव करवाए। क्राउड फंडिंग की तर्ज पर भारत के लोग या कंपनियां चुनाव फंड में योगदान करें। इससे जितना पैसा जमा हो, उतनी ही रकम भारत सरकार अपनी झोली से दे। फिर यह पैसा अलग-अलग दलों में बांटा जाए। पैसे का आवंटन पिछले लोकसभा चुनावों में मिले वोट और सीटों, उम्मीदवारों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों तथा वोटरों की संख्या के आधार पर किया जा सकता है। राष्ट्रीय दलों और क्षेत्रीय दलों के लिए अलग-अलग व्यवस्था की जा सकती है। इस योजना का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि चंदा देने वाला आम वोटर भी अपनी जिम्मेदारी समझेगा। उसे लगेगा कि सारी प्रक्रिया में वह खुद शामिल है और उसकी जेब का पैसा लगा है। इससे चुनाव में स्वच्छ छवि के लोग सामने आएंगे, नई पीढ़ी को मौका मिलेगा और इससे लोकतंत्र ही मजबूत होगा। यूरोप के हाॅलैंड, नॉर्वे, स्वीडन जैसे देशों में यह प्रयोग सफलतापूर्वक चल रहा है।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी का सुझाव है कि राष्ट्रीय चुनाव कोष बनाया जा सकता है, जिसमें कॉरपोरेट जगत चंदा दे सकता है। फिर यह पैसा चुनाव आयोग अलग-अलग दलों के बीच बांट सकता है। वैसे बड़े उद्योगपतियों ने पहले ही कॉरपोरेट फंड बना रखा है, जिसके जरिये अलग-अलग दलों को चंदा दिया जाता रहा है। पिछले साल ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में बताया गया कि भारी-भरकम चंदा देने वालों का सत्तारूढ़ दलों से जुड़ाव होता है और उन्हें मनचाहे लाभ मिलते हैं।
जानकारों का कहना है कि चुनावी चंदे की सारी जानकारी समय-समय पर चुनाव आयोग को सामने लानी चाहिए। ऐसा होने पर वोटर को पता लग जाएगा कि किस दल को कौन-कौन चंदा दे रहा है। इस जानकारी के आधार पर वोटर पार्टी विशेष के प्रति अपनी राय बनाकर मतदान कर सकता है।
जिस देश में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सत्तारूढ़ दल की पसंद-नापसंद पर निर्भर हो, वहां चुनाव आयोग कैसे चुनावी चंदे की पारदर्शी व्यवस्था कर सकता है? इसके लिए जरूरी है कि चुनाव आयोग का अपना अलग सचिवालय हो, आयोग अपने हिसाब से नियुक्तियां कर सके और नौकरी के अपने स्वतंत्र नियम बना सके और उसका बजट अलग से हो। क्या इतनी आजादी कोई सियासी दल चुनाव आयोग को देने को तैयार होगा?