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गलत स्वास्थ्य नीतियों का खामियाजा

Sun, 16 Nov 2014 07:05 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 16 Nov 2014 07:05 PM IST
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Effects of bad health policies

जब तक यह लेख आप तक पहुंचेगा, शायद आप भूल गए होंगे उन महिलाओं को, जो छत्तीसगढ़ में चिकित्सकों के हाथों बेमौत मारी गईं। भूल गए होंगे उन बच्चों के चेहरे, जिनकी तस्वीरें अखबारों में छपी थीं अपनी माताओं के शवों के इंतजार में बैठे हुए। वे मरने वाली महिलाएं बेनाम थीं, सो उनको भूलना आसान था। मगर इतनी जल्दी न भूलते, अगर वे संपन्न घरों की बेटियां होतीं और मुंबई या दिल्ली के किसी बड़े अस्पताल में इस तरह मारी जातीं। अपने देश का यही दस्तूर रहा है और यही रहेगा, जब तक हमारे शासकों को ध्यान न दिलाया जाए कि स्वास्थ्य सेवाओं में बुनियादी परिवर्तन की आवश्यकता है। बुनियादी इसलिए, क्योंकि हमारे राजनेताओं ने शुरू से ही यह तय कर लिया था कि शिक्षा-स्वास्थ्य के क्षेत्र में जनता के लिए एक अलग किस्म की सेवाएं होंगी, और खुद उनके लिए दूसरे किस्म की।

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असल में, उनकी आदतें हमने बिगाड़ी हैं। जब राजनेता और अधिकारी अपने इलाज के लिए विदेश जाया करते हैं, तब हम-आप उनका विरोध नहीं करते। किसी बहादुर पत्रकार ने यह मालूम करने तक की जहमत भी नहीं उठाई है कि सोनिया गांधी हर दूसरे महीने किस देश में जाती हैं इलाज करवाने, और इस इलाज के पैसे कहां से आते हैं। हम तब भी चुप रहे, जब भारत सरकार के अधिकारियों को विदेशों में इलाज करवाने की इजाजत दी पिछली मनमोहन सरकार ने। चुप रहे हम, जब हमारे शासकों ने इस बहाने से कि गरीबों का इलाज मुफ्त होगा, निजी अस्पतालों के निर्माण के लिए महानगरों में कौड़ियों के दाम नगरपालिकाओं की जमीनें दीं। हालांकि ऐसा नहीं है कि हर बार हमारे शासकों को अब इलाज करवाने के लिए विदेश जाने की जरूरत है। मुंबई और दिल्ली में मैंने ऐसे अनेक अस्पताल देखे हैं, जो बेहतरीन विदेशी अस्पतालों का मुकाबला कर सकते हैं। मगर इनमें वे गरीब महिलाएं नहीं जा सकती हैं, जो नसबंदी करवाने बिलासपुर के टूटे-पुराने देहाती अस्पताल में गईं, क्योंकि दलालों ने उन्हें छह सौ रुपये देने का लालच दिया। शर्म से डूब मरना चाहिए छत्तीसगढ़ सरकार को। जेलों में बंद कर देने चाहिए उन डॉक्टरों को, जिन्होंने रिकॉर्ड तोड़ने के लिए महिलाओं की नसबंदियां ऐसे शिविरों में कीं, जहां सफाई का बुनियादी इंतजाम नहीं था।
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कांग्रेस के बड़े नेता इस घटना का राजनीतिकरण कर रहे हैं। मगर देश में यदि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं इतनी बदतर हैं, तो दोष उनका है। इसलिए कि गलत स्वास्थ्य नीतियों की नींव कांग्रेस के राज में ही रखी गई। शुरू से निर्णय लिया गया होता कि विदेशों में इलाज कराने की इजाजत किसी भी राजनेता या अधिकारी को नहीं होगी, तो यकीनन स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होतीं।
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इस त्रासदी में से कुछ अच्छा निकल सकता है, तो सिर्फ यह कि प्रधानमंत्री कम से कम इतना करें कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, वहां स्वास्थ्य सेवाओं का एक नया ढांचा तैयार करें। लेकिन ऐसा करने के लिए उन्हें पहले पुराने ढांचे को गिराना होगा। इस स्तर पर परिवर्तन अगर नहीं लाया जाता है, तो कड़वा यथार्थ यही रहेगा कि इस तरह के हादसे होते रहेंगे, जिनमें इलाज की जगह मौत मिलती रहेगी देश के आम लोगों को।

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