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कोरोना का असर: कामकाजी महिलाओं के पेशेवर जीवन छोड़ने की वजह

Thu, 17 Jun 2021 04:40 AM IST
ऋतु सारस्वत ऋतु सारस्वत
ऋतु सारस्वत Published by: ऋतु सारस्वत Updated Thu, 17 Jun 2021 04:40 AM IST
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Effect of Corona: Reasons for leaving professional life of working women
office during covid 19 - फोटो : istock

कोविड-19 के दौर में घर की जिम्मेदारियां और ऑफिस के काम का बोझ महिलाओं पर इतना बढ़ गया कि वैश्विक स्तर पर 23 प्रतिशत और भारत में 26 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं अपना काम तक छोड़ने का विचार बना रही हैं। इसका खुलासा हाल ही में जारी एक अंतरराष्ट्रीय फॉर्म डेलायट द्वारा 10 देशों की 5,000 महिलाओं का अध्ययन करके किया गया। कामकाजी महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे परिवार को प्राथमिकता दें और कई बार इस प्राथमिकता की कीमत उन्हें पेशेवर जीवन को छोड़कर चुकानी पड़ती है। समाज में सदियों से अंतर्निहित रूढ़िवाद कहता है कि पुरुष पैसा कमाएं और महिलाएं गृहस्थी संभालने और देखभाल का काम करें। परंतु सवाल उठता है कि विकसित से लेकर विकासशील देशों तक में क्यों यह सोच आज भी कायम है कि घरेलू जिम्मेदारियां सिर्फ महिलाओं की ही हैं। दरअसल इसे समझने के लिए हमें ‘थ्योरी ऑफ पावर’ को समझना होगा, जहां वित्तीय स्वतंत्रता एक ऐसी आवाज देती है, जिसे परिवार, समुदाय और देशव्यापी रूप से सुना जाता है। सत्ता और प्रभाव के इस सुख को पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था किसी भी स्थिति में बनाए रखना चाहती है। 


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दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं, जहां बच्चों को समाजीकरण के माध्यम से लिंगभेद जनित भूमिकाएं छोटी उम्र से ही सिखाई न जाती हों। यह ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें लोग सामाजिक मूल्यों, विश्वासों और दृष्टिकोणों द्वारा निर्धारित रूढ़िगत व्यवस्था को बनाए रखने के लिए एक विशेष तरीके से व्यवहार करना सिखाते हैं, जिसका नतीजा यह है कि लिंग जनित श्रम विभाजन का भेद किसी भी स्थिति में अपना स्वरूप नहीं बदल रहा है। जनरल ऑफ सोशियोलॉजिकल साइंस में प्रकाशित एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण (जो 1976 से 2014 की लंबी अवधि के दौरान किए गए) पर आधारित शोध ‘मॉनिटरिंग द फ्यूचर’ के अध्ययन में शोध अवधि के दौरान हर साल बारहवीं के बच्चों से पूछा गया कि जब वे विवाहित होंगे और उनका बच्चा प्राइमरी में होगा, तब वे घरेलू और बाहरी जिम्मेदारियों की व्यवस्था का कौन-सा स्वरूप देखते हैं, तो अधिकांश किशोरों का जवाब था कि पुरुष ऑफिस में काम करें और महिलाएं घर पर बच्चों की देखभाल और अन्य घरेलू काम करें। 

इसी तरह का एक अध्ययन 1983 से 2014 के बीच कॉलेज के छात्रों पर किया गया। उसमें भी यह खुलासा हुआ कि युवा पीढ़ी पुरुष और महिलाओं की समाज में भूमिकाओं को लेकर आज भी रूढ़िवादी है। जब यह स्थिति विकसित देशों की है, तो विकासशील देशों में सोच का दायरा कैसा होगा, यह सहज ही कल्पनीय है। दोनों ही अध्ययन इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं कि दुनिया भर में महिलाओं के वजूद, अधिकारों और निर्णय लेने की उनकी क्षमता को नकारने का चलन है और यह सब परिवारों की संस्कृति और मूल्यों को बचाने के नाम पर किया जाता है। तो क्या यह स्थिति बदस्तूर कायम रहेगी? अगर ऐसा होता है, तो लैंगिक समानता एक दिवास्वप्न बन कर रह जाएगी, इसलिए यह जरूरी है कि इस पर गंभीरता से विचार किया जाए, क्योंकि अगर किसी भी व्यक्ति, वर्ग, या समुदाय के हितों की निरंतर उपेक्षा की जाए, तो भविष्य में उसके परिणाम समाज के लिए अहितकर साबित होंगे।

गुड गाइज हाउ मैन कैन वी बेटर फॉर विमेन इन द वर्क प्लेस के लेखक स्मिथ और जॉनसन कहते हैं कि काम पर लैंगिक समानता की शुरुआत पुरुषों के घर में समान भागीदारी से ही संभव हो सकेगी। दक्षिण कोरिया में विवाह की दर तेजी से कम हो रही है, क्योंकि वहां एक संभावित पत्नी के लिए सबसे ज्यादा मायने रखता है कि आप पति और ससुराल वालों की देखभाल करने में सक्षम हैं या नहीं। कठोर पितृसत्तात्मक मानदंडों ने महिलाओं की प्रतिभा, शिक्षा और आत्मनिर्भरता को अस्वीकार कर दिया है, जिसके चलते द. कोरिया ही नहीं, चीन में भी शादी और बच्चे पैदा करने जैसी परंपरागत मान्यताओं को लड़कियां ठुकरा रही हैं। यह तय है कि अगर पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था अपने ‘मेल बॉक्स’ से बाहर नहीं आई, तो द. कोरिया और चीन के सामाजिक बदलाव की लहर से दूसरे देश भी अछूते नहीं रहेंगे। 




 

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