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आर्थिकी: झटका तो है, पर लंबा नहीं खिंचेगा अमेरिका से टैरिफ युद्ध

Fri, 01 Aug 2025 07:27 AM IST
Narayana Krishnamurti नारायण मूर्ति
Updated Fri, 01 Aug 2025 07:27 AM IST
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सार
ट्रंप के टैरिफ ने भारत के विदेश व्यापार के सम्मुख चुनौती पेश की है, लेकिन आप जितना सोचते हैं, भारत उससे बेहतर ढंग से इस चुनौती से लड़ने के लिए तैयार है।
 
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Economy: There is a shock, but the tariff war with America will not last long
भारत-अमेरिका टैरिफ। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जहां तक भारत के विदेशी व्यापार की बात है, तो विशुद्ध तौर पर यह एक आयातक देश है। हम जितना निर्यात करते हैं, उससे कहीं अधिक वर्षों से खनिज ईंधन, तेल, मोती व कीमती पत्थर, धातुएं, विद्युत व इलेकट्रॉनिक उपकरण इत्यादि का आयात करते आए हैं। पेट्रोलियम उत्पाद, रत्न व आभूषण, ऑटोमोबाइल, फार्मास्युटिकल व मशीनरी जैसे क्षेत्र, जो हमारे निर्यात के लिहाज से अहम हैं, उनमें भी ज्यादातर इनपुट सामग्री का हम आयात ही करते हैं। सरल शब्दों में कहें, तो निर्यात भी हमारे द्वारा आयातित वस्तुओं पर ही निर्भर हैं, खासकर रिफाइनरी और फार्मास्युटिकल जैसे क्षेत्रों में। वैश्विक व्यापार के बदलते कानूनों के साथ तालमेल बैठाते और अपनी सीमाओं व आयात पर निर्भरता को समझते हुए ही भारत की व्यापार नीति विकसित हुई है।



राष्ट्रों ने जब यह समझा कि आर्थिक प्रगति नियमों पर आधारित विश्वव्यापी व्यापार के जरिये वैश्विक एकीकरण पर निर्भर करती है, तब करीब तीस साल पहले विश्व व्यापार संगठन की स्थापना हुई। इन नियमों ने काफी दबाव झेला, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि पिछले कुछेक वर्षों में वैश्विक वार्षिक प्रगति शानदार रही है। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की दो अप्रैल, 2025 को घोषित टैरिफ योजनाओं ने मौजूदा संतुलन को बिगाड़ दिया। भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि वह अमेरिका का शुद्ध निर्यातक है। ट्रंप की ताजा घोषणा के अनुसार, भारत को 25 फीसदी टैरिफ के साथ ही अतिरिक्त जुर्माना भी देना होगा, क्योंकि भारत रूस से तेल आयात करता है। अमेरिका और भारत के बीच बेशक समानांतर व्यापार बातचीत चल रही है, जिससे पता चला है कि ताजा टैरिफ स्थायी नहीं भी हो सकते हैं।


दो देशों के बीच व्यापार केवल अर्थशास्त्र पर नहीं, पारस्परिक व्यवस्थाओं पर भी निर्भर करता है, जिसमें देशों के बीच संबंध और आपसी धारणाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं। भारत और ब्रिटेन के बीच हुआ हालिया समझौता और रूस के साथ भारत के व्यापारिक रिश्ते इसकी ही पुष्टि करते हैं। भारत पर लगे टैरिफ को अगर कुछ समकक्ष देशों, जैसे वियतनाम या इंडोनेशिया, जिन पर क्रमश: बीस और उन्नीस फीसदी टैरिफ है, के संदर्भ में देखें, तो इसका प्रभाव महत्वपूर्ण है और इससे भारत का प्रतिस्पर्धात्मक लाभ कम होगा। उसका यह लाभ जापान जैसे उन बड़े देशों की तुलना में भी कम होगा, जिनके अमेरिका से कम टैरिफ वाले समझौते हैं। भारत एक ऐसा व्यापार समझौता चाहता है, जो उसे प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अमेरिकी बाजारों में तरजीही पहुंच प्रदान करे। ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने आयात पर अपनी निर्भरता और आंतरिक राजनीतिक मजबूरियों को कम करने के लिए टैरिफ लगाए हैं। इससे सिर्फ भारत ही नहीं, कई देश परेशान हैं, जिससे इस वर्ष वैश्विक व्यापार कम रहने की पूरी आशंका है।

हमें आगामी महीनों में व्यापार समझौते पर चल रही वार्ताओं के निष्कर्ष पर पहुंचने का इंतजार करना होगा, जिससे दो महान देशों के बीच एक दीर्घकालिक समझौते की नींव रखी जा सकेगी। ऑटो और सार्वजनिक खरीद क्षेत्रों में हाल ही में हुए भारत-ब्रिटेन समझौते ने यह दर्शाया है कि भारत उन उद्योगों में अपने संरक्षणवादी टैग को हटाने को तैयार है, जहां यह सीमांत उत्पादक को प्रभावित नहीं करता, जो उसके पहले के रुख से एक महत्वपूर्ण बदलाव है। भारत को अपने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को अलग-अलग वस्तुओं के आधार पर देखना होगा और अमेरिका तथा अन्य प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ के लिए अल्पकालिक आर्थिक झटके के लिए तैयार रहना होगा।

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