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अर्थव्यवस्था: चीन का विकल्प बनने को तैयार है भारत; वैश्विक स्तर पर तेजी से मिल रहा है समर्थन
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भारत-चीन (फाइल)
- फोटो :
pixabay
विस्तार
चीन के आर्थिक हालात अब उसके वश में नहीं लग रहे हैं, जिससे अब उसका वैश्विक रुतबा भी डावांडोल होता दिखने लगा है। गौरतलब है कि पिछले दो-तीन दशकों में चीन से ज्यादा तीव्र आर्थिक प्रगति किसी अन्य मुल्क ने नहीं की है। 1990 के दौर में वैश्विक जीडीपी में चीन का हिस्सा मात्र दो फीसदी हुआ करता था, जो 2021 तक लगभग 20 फीसदी के स्तर पर पहुंच गया। लेकिन अब उसमें गिरावट का दौर शुरू हो गया है।
कुछ लोग इसका श्रेय कोरोना के बाद अमेरिका की तेजी से आर्थिक रिकवरी को देते हैं, तो बाकी विश्व की कुछ अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं, जिसमें भारत सबसे ऊपर है, के अलावा वियतनाम, इंडोनेशिया, मैक्सिको, पोलैंड की अर्थव्यवस्थाओं को भी देना उचित समझते हैं। हालांकि, अमेरिका को इसका श्रेय देना तर्कसंगत इसलिए लगता है, क्योंकि वर्ष 2022-23 में वैश्विक अर्थव्यवस्था में 80 खरब डॉलर का विस्तार हुआ है, जिसके चलते उसका वर्तमान स्तर तकरीबन 1050 खरब डॉलर के बराबर है और इस आर्थिक वृद्धि में अमेरिका का हिस्सा 45 फीसदी रहा है। यह अपने आप में एक बार फिर वैश्विक स्तर पर अमेरिकी बादशाहत को दर्शाता है। हालांकि भारत का वर्तमान वैश्विक जीडीपी में हिस्सा तकरीबन चार फीसदी के आसपास है, पर भारत के विशाल घरेलू बाजार के चलते उसकी लगातार बढ़ रही आर्थिक विकास दर के कारण सभी सहमत हैं कि आने वाले समय में भारत ही वैश्विक स्तर पर चीन की जगह लेगा।
इन सब के बीच, चीन को अभी से हारा हुआ नहीं समझा जा सकता। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि चीन के वर्तमान आर्थिक हालात के पीछे का मुख्य कारण अमेरिका से उसकी अनावश्यक व्यापारिक प्रतिस्पर्धा है। वर्ष 2021 तक चीन, अमेरिकी जीडीपी के 76 फीसदी हिस्से को कवर भी कर चुका था, परंतु अब उसमें काफी कमी आ गई है। वर्तमान में चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका के जीडीपी का 65 फीसदी ही है।
आने वाले समय में यह अंतर और भी बहुत तेजी से बढ़ेगा, क्योंकि अमेरिका के हालात उसके नियंत्रण में हैं, जबकि चीन में कई वजहों से अब स्थितियां बिल्कुल विपरीत हो चुकी हैं। इसका एक प्रमुख कारण है, चीनी सरकार व प्रशासन का सदैव वैश्विक स्तर पर बहुत अहंकारी रवैया। दूसरा, चीन के घरेलू बाजार में उपभोग क्षमता का लगातार कम होना, क्योंकि पिछली दो पीढ़ियां जनसंख्या नियंत्रण के चलते परिवार में एक बच्चे के साथ ही जीवन- यापन कर रही हैं। तीसरा मुख्य कारण चीनी अर्थव्यवस्था में वित्तीय ऋण का लगातार बढ़ता बोझ और चौथा मुख्य कारण है, बड़ी तेजी से चीनी बाजार का वैश्विक निवेशकों में अपना विश्वास खोना।
चीन में अभी वित्तीय ऋण जीडीपी का 300 फीसदी है। आगामी वर्ष में प्रस्तावित चार से पांच फीसदी की विकास दर को हासिल करने के चक्कर में इस ऋण की मात्रा आने वाले कुछ वर्षों में 500 फीसदी हो जाएगी। सबसे बड़ी गड़बड़ी चीन में यह रही है कि वित्तीय ऋण का सबसे अधिक हिस्सा वहां की रियल एस्टेट कंपनियों को लगातार मिलता रहा। चीन में वर्तमान समय में तकरीबन 100 से अधिक बड़ी रियल एस्टेट कंपनियां हैं। इनमें से प्रथम 50 कंपनियां तो वित्तीय ऋण के कारण आर्थिक संकट में हैं। प्रथम पांच कंपनियां तो बैंकों द्वारा दिवालिया घोषित हो चुकी हैं, जिन पर 266 अरब अमेरिकी डॉलर का कर्ज चढ़ा हुआ है। दरअसल, चीन में भी रियल एस्टेट की कृत्रिम आर्थिक प्रगति का बुलबुला कुछ वैसे ही फूटने के कगार पर है, जैसे अमेरिका में वर्ष 2008 में लेहमन ब्रदर्स के दिवालिया होने पर हुआ था।
पिछले दिनों चीनी सरकार तथा विश्व विख्यात चीनी बिजनेस टाइकून व अलीबाबा के संस्थापक जैक मा के साथ जिस तरह से चीनी सरकार का विवाद चर्चाओं में रहा, उसके चलते बड़े वैश्विक निवेशक अब चीन से दूरी बनाने लगे हैं। भारत अपनी लगातार बढ़ रही प्रति व्यक्ति उपभोग क्षमता के कारण उनकी पहली पसंद बन रहा है। हालांकि अभी चीन इस पक्ष पर विश्व के अन्य सभी अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं से बहुत आगे है, क्योंकि वहां पर औसतन वैश्विक निवेश जीडीपी का 25 से 30 फीसदी के बीच रहता है। चीन की इन आर्थिक समस्याओं के चलते सबसे अधिक फायदा प्रत्यक्ष तौर पर अमेरिका ने उठाया है। मगर आने वाले समय में उसका सबसे बड़ा हकदार भारत होगा और इस बात को वैश्विक स्तर पर बड़ी तेजी से समर्थन भी मिलता दिख रहा है।