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हर ताले की डुप्लीकेट चाबी
सुबोध अग्निहोत्री
Updated Tue, 15 Jan 2013 10:46 PM IST
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यह तो अच्छा हुआ कि दिल्ली गैंगरेप के बाद बलात्कारियों को कठोर सजा देने पर विचार किया जा रहा है। आयोग के गठन के अलावा सुझावों का दौर भी शुरू हो गया है। इसी कड़ी में एक बेहद सख्त सुझाव आया है कि बलात्कारियों को रासायनिक प्रक्रिया से नपुंसक बना दिया जाए। लेकिन इसकी भला क्या गारंटी है कि यह सख्त सजा ही होगी? अभी तक तो नपुंसकता का इलाज है।
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रासायनिक क्रियाओं से इसे दुरुस्त किया जा सकता है। इस पर मेडिकल साइंस के बड़े-बड़े शोध भी हैं। पढे़-लिखे डॉक्टरों के अलावा गांवों-कस्बों में नीम हकीमों की पूरी फौज है, जो इसका इलाज करती है। हकीमों, बाबाओं और ओझाओं की तो इसमें ‘विशेष योग्यता' है। वे ऐसी रहस्यमयी जड़ी-बूटियों की खोज कर लाते हैं, जिसके बारे में मेडिकल साइंस को भी कम ही पता होगा।
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सख्त कानून बनने के बाद इन दुकानों का क्या होगा! क्या सचमुच उनका धंधा चौपट हो जाएगा? बल्कि ज्यादा आशंका तो यही है कि सख्त सजा के ऐलान के बाद वे अपना इलाज कहीं महंगा न कर लें। कानून की निगाहों से बचने के लिए कीमत तो ज्यादा अदा करनी ही पड़ती है।
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कठोर कानून के बावजूद गर्भ में बच्चियों को मारने का सिलसिला आखिर जारी है ही। लाख चेतावनियों के बावजूद धंधे चल ही रहे हैं और अस्पतालों, नर्सिंग होमों में चेतावनी बोर्ड मुंह चिढ़ाते नजर आ रहे हैं। सर्वशक्तिमान बाबाओं, ओझाओं और झोलाछापों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता, आम आदमी भले ही इनके इलाज से शहीद हो जाता हो। इलाज का तो हमारे यहां यह हाल है कि नसबंदी भी कई बार कारगर साबित नहीं होती।
सख्त कदम उठाने से पहले सरकार को इसलिए भी गंभीरता से सोच लेना चाहिए, क्योंकि अपने देश में ताला बनता है, तो उसकी डुप्लीकेट चाबी भी बन जाती है। नीम हकीमों की ही नहीं, अपने यहां डुप्लीकेट चाबी बनाने वालों की भी कोई कमी नहीं। हर गली में ऐसे लोग मिल जाएंगे।
इसलिए सरकार बहुत अच्छी तरह सोच-समझ ले। कहीं ऐसा न हो कि सख्त सजा के ऐलान के बाद रेल लाइनों के किनारे की दीवारों और शहरों, कस्बों व गांवों के गलियारों में हकीमों और बाबाओं के इश्तहार कुछ इस तरह नजर आएं- बलात्कार की सजा का तोड़ है हमारे पास, हमारे किए की कोई काट नहीं, महज पंद्रह दिनों में पहले जैसा आराम।