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चरमपंथ पर दोहरापन क्यों

Wed, 14 Jan 2015 07:49 PM IST
थॉमस एल फ्रीडमैन
थॉमस एल फ्रीडमैन Updated Wed, 14 Jan 2015 07:49 PM IST
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duality on insurgency

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की इस बात के लिए आलोचना हुई कि बीते रविवार को पेरिस में आयोजित आतंकवाद विरोधी विशाल रैली में न तो वह स्वयं उपस्थित हुए और न ही अपने किसी प्रतिनिधि को भेजा। यह आलोचना वाजिब थी।

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लेकिन यह अमेरिकी राजनीति की खासियत है कि हम इसी मुद्दे पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं, जबकि जरूरत ऐसे प्रयास की है, जिससे दुनिया को यह एहसास हो सके कि वाकई जेहादी खतरे का गंभीरता से मुकाबला किया जा रहा है। इसके लिए ऐसी किसी रैली की जरूरत नहीं है, जिसका नेतृत्व अमेरिकी राष्ट्रपति करें। बल्कि ऐसी किसी रैली में उनकी मौजूदगी जरूरी ही नहीं है। यह रैली अरबों और मुसलमानों द्वारा अरबों और मुसलमानों के लिए आयोजित हो, जिसमें दस लाख लोग अरब और मुस्लिम दुनिया में फैले जेहादियों के खिलाफ जुलूस में शामिल हों। इसे आयोजित करने के लिए पश्चिम से पहल न की जाए, और हां, यह पेरिस में हुई घटना के जवाब में न हो, बल्कि यह रैली हाल ही में पाकिस्तान, यमन, इराक, लीबिया, नाइजीरिया और सीरिया में जेहादियों द्वारा की गई मुस्लिमों की हत्या के विरोध में हो।
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प्रतिष्ठित अरब पत्रकार अब्दुल रहमान अल-रशद ने अपने ताजा कॉलम में लिखा है-'फ्रांस में हुए हालिया आतंकी हमले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन पेरिस के बजाय किसी मुस्लिम देश की राजधानी में होना चाहिए था, क्योंकि इस मामले में मुसलमान ही संकट में शामिल हैं और उन्हीं पर आरोप लगाया गया... चरमपंथ की कहानी मुस्लिम समाज से शुरू होती है और उन्हीं के समर्थन एवं चुप्पी की वजह से इसने आतंकवाद का रूप लिया और लोगों को नुकसान पहुंचा रहा है। इसका कोई मतलब नहीं कि पीड़ित फ्रांस के लोग सड़कों पर उतरे। आवश्यकता इस बात की है कि मुस्लिम समाज पेरिस के अपराध और इस्लामी चरमपंथ को सामान्य रूप से अस्वीकार करे।'
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सच तो यह है कि इस पूरी जेहादी अवधारणा को लेकर अरब-मुस्लिम जगत, यूरोप और अमेरिका में भारी दोहरापन है, हम जितना यकीन करते हैं, उससे भी ज्यादा। इस दोहरेपन की शुरुआत मुस्लिम समुदाय से हुई, जहां इस बात पर भारी मतभेद है कि आज कौन-सी चीज प्रामाणिक इस्लाम का गठन करती है। हम खुद को मूर्ख बनाते हैं, जब हम मुसलमानों से कहते हैं कि 'वास्तविक इस्लाम' यह है, क्योंकि मुसलमानों का कोई वेटिकन नहीं है। धार्मिक प्राधिकार का कोई एक स्रोत नहीं है, आज कई इस्लाम हैं-नैतिकतावादी वहाबी/ सलाफी/ जेहादी विकृति उनमें से एक है और हम जितना सोचते हैं, उससे कहीं ज्यादा समर्थन उसे प्राप्त है।

आज पूरे यूरोप में इस सवाल को लेकर दोहरापन है कि क्या किसी देश को नए मुस्लिम प्रवासियों से यह मांग करनी चाहिए कि वे उसके मूल्यों को स्वीकार करें। क्या जियोपॉलिटिकल इंटेलिजेस से संबंधित सलाहकार संस्था स्ट्रैटफॉर से संबद्ध जॉर्ज फ्रीडमैन का यह तर्क सही है कि यूरोप के लोगों ने बहुसंस्कृतिवाद को इसलिए अपनाया, क्योंकि वे वास्तव में अपने मुस्लिम आप्रवासियों को खुद में समाहित नहीं करना चाहते हैं। इसी तरह बहुत से मुस्लिम आप्रवासी भी उनमें समाहित नहीं होना चाहते, क्योंकि ऐसे मुस्लिम वहां रोजगार के लिए गए हैं, न कि नई पहचान हासिल करने के लिए। यदि ऐसा है, तो यह मुसीबत का कारण है।

सऊदी अरब के साथ वाशिंगटन के संबंधों में भी दोहरापन है। 1979 में जब जेहादियों ने इस्लाम के पवित्र धर्मस्थल मक्का की घेराबंदी कर ऐलान किया कि सऊदी अरब के शासक धर्मनिष्ठ नहीं रहे, तो उसके बाद वहाबी या सलाफी इस्लाम, जो इस धर्म का बेहद नैतिकतावादी, बहुलताविरोधी और स्त्रीविरोधी संस्करण है, के प्रति सऊदी अरब की प्रतिबद्धता दोगुनी हो गई। तेल के पैसे का उपयोग पूरे मुस्लिम जगत में वहाबी पंथ की मस्जिद, वेबसाइट और मदरसों के निर्माण में किया गया। इस सऊदी दक्षिण पंथ ने पूरे सुन्नी समुदाय को दक्षिणपंथी बना दिया। मुक्त, सौम्य एवं आकर्षक इस्लाम को, जिसने सदियों से मिस्र की उदारता को परिभाषित किया, अरब की वहाबी धारा ने सख्त बना दिया है।

लेकिन तेल के लोभ में अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने कभी इस बारे में सऊदी अरब का विरोध नहीं किया। जैसा कि मैंने कहा, व्यसनी कभी नशा बेचने वाले से सच नहीं कहता। सऊदी अरब की सरकार ने जेहादियों का विरोध किया। दुर्भाग्य से वहाबी इस्लाम के बजाय इस्लामिक स्टेट द्वारा चलाए जा रहे हिंसक जेहाद का विरोध एक छोटा कदम है। फ्रेंच आतंकी फ्रांस में जन्मे थे, पर वे वहां के महान लेखक वॉल्टेयर से नहीं, बल्कि इंटरनेट और स्थानीय मस्जिद के जरिये वहाबी-सलाफी विचारधारा से अभिभूत थे।


इसके अलावा शिया और सुन्नी के बीच के संघर्ष ने कई प्रमुख सुन्नी खैरात संस्थाओं, मस्जिदों और हुकूमतों को जेहादी समूहों का समर्थन करने के लिए प्रेरित किया, क्योंकि वे शियाओं के खिलाफ क्रूरता से लड़ते हैं। और भी दोहरापन है, पिछले 60 वर्षों से अरब तानाशाह और उनके सुन्नी धार्मिक मौलवियों के बीच एक मौन गठजोड़ था। शासक मौलवियों को धन देते थे और ये मौलवी उन्हें आशीर्वाद। दोनों ने प्रामाणिक, उत्साही और सुधारवादी इस्लाम के उभार को दबा दिया, जो वहाबी या सलाफी पंथ का स्थान ले सकता है, जबकि बहुत से मुसलमान ऐसा चाहते थे। अरब मुस्लिम जगत में प्रामाणिक सुधार की जरूरत है। संक्षेप में, जेहादियों की निंदा करना आसान है, लेकिन उससे निपटने के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाने की जरूरत होगी। अरब-मुस्लिम जगत और पश्चिम को अपना दोहरापन खत्म करना होगा।

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