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राजनीति में ढोल
अरुणेंद्र नाथ वर्मा
Updated Wed, 10 Sep 2014 07:36 PM IST
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अपने प्रधानमंत्री ने जापान में दिखाया कि ढोल बजाने में उनका मुकाबला नहीं। लेकिन इस पर खुश होना तो दूर, उनके विरोधी नाराज हो गए। पर मोदी अकेले संगीतप्रेमी राजनेता तो हैं नहीं कि इतना नाराज हुआ जाए।
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मैंने कई राजनीतिक पार्टियों में गीत-संगीत की परंपरा के बारे में पूछा। बसपा के प्रवक्ता का कहना था कि बहनजी पहले तो संगीत के खिलाफ थीं, पर बाद में सर्वजन समाज अपनाने पर उन्होंने अपने विचार बदल दिए। आजकल वह रवींद्रनाथ का प्रिय गीत एकला चलो रे गा रही हैं। इसी तरह जद (यू) और राजद के दो प्रवक्ताओं ने बताया कि उपचुनावों का नतीजा आने के बाद से उनके नेतागण जुगलबंदी का अभ्यास कर रहे हैं। हालांकि उनमें से एक ने फुसफुसाकर मुझसे कहा, हमारे यहां बारहमासा गाने का भी चलन है। जैसे-जैसे मौसम बदलता है, वैसे-वैसे हमारे गीतों के स्वर भी बदलते हैं।
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आम आदमी पार्टी के कुमार विश्वास के तरन्नुम के प्रेमी तो बहुतेरे हैं। मैंने उनसे गाने-बजाने के बारे में पूछा, तो वह बोले, हमारे यहां तो पहले से ही अपनी डफली-अपने राग का रिवाज है। जब तक पार्टी तय करे कि मौसम के हिसाब से कौन-सा राग अनुकूल होगा, तब तक हम नेता अपने-अपने पसंदीदा राग सुना आते हैं।
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नेताजी से यह सवाल पूछने में डर लग रहा था, क्योंकि वह पहलवान भी हैं। उन्होंने सवाल सुनते ही तपाक से कहा, हम नाचते-गाते नहीं, मर्दोंवाले काम करते हैं। सैफई महोत्सव नहीं देखते क्या? हम मनोरंजन के लिए बॉलीवुड के कलाकारों को बुलाते हैं, खासकर तब, जब जनता का ध्यान हटाना हो।
अंत में मैं कांग्रेस के दरबार में पहुंचा। लेकिन वहां तो मंच पर ही दो पीढ़ियां लड़ रही थीं। मैंने एक नेता से इस बारे में पूछा, तो उनका कहना था कि सबसे पुरानी पार्टी होने के कारण गाने-बजाने वाले यहां सबसे अधिक हैं। लेकिन यहां अध्यक्ष-उपाध्यक्ष को छोड़ किसी के बारे में वाह-वाह करना खतरनाक है, इसलिए पेशेवर गवैये-बजैये दूसरी पार्टियों में जाने लगे हैं।